Mirza Ghalib

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    हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
    तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

    न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
    कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है

    ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से
    वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है

    चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
    हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

    जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
    कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

    वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
    सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है

    पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
    ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है

    रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
    तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

    हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
    वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
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    पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
    कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
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    मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
    तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे
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    इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
    वर्ना हम भी आदमी थे काम के
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    कोई उम्मीद बर नहीं आती
    कोई सूरत नज़र नहीं आती

    मौत का एक दिन मुअय्यन है
    नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

    आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
    अब किसी बात पर नहीं आती

    जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
    पर तबीअत इधर नहीं आती

    है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
    वर्ना क्या बात कर नहीं आती

    क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
    मेरी आवाज़ गर नहीं आती

    दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
    बू भी ऐ चारागर नहीं आती

    हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
    कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

    मरते हैं आरज़ू में मरने की
    मौत आती है पर नहीं आती

    काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
    शर्म तुम को मगर नहीं आती
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    जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
    कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है
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    इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
    कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
    Mirza Ghalib
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    हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
    दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
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    वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
    कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
    Mirza Ghalib
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    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
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