apni gali mein mujhko na kar dafn baad-e-qatl | अपनी गली में मुझको न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल

  - Mirza Ghalib

अपनी गली में मुझको न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले

  - Mirza Ghalib

More by Mirza Ghalib

As you were reading Shayari by Mirza Ghalib

    शब ख़ुमार-ए-शौक़-ए-साक़ी रुस्तख़ेज़-अंदाज़ा था
    ता-मुहीत-ए-बादा सूरत ख़ाना-ए-ख़म्याज़ा था

    यक क़दम वहशत से दर्स-ए-दफ़्तर-ए-इम्काँ खुला
    जादा अजज़ा-ए-दो-आलम दश्त का शीराज़ा था

    माना-ए-वहशत-ख़िरामी-हा-ए-लैला कौन है
    ख़ाना-ए-मजनून-ए-सहरा-गर्द बे-दरवाज़ा था

    पूछ मत रुस्वाई-ए-अंदाज़-ए-इस्तिग़ना-ए-हुस्न
    दस्त मरहून-ए-हिना रुख़्सार रहन-ए-ग़ाज़ा था

    नाला-ए-दिल ने दिए औराक़-ए-लख़्त-ए-दिल ब-बाद
    याद-गार-ए-नाला इक दीवान-ए-बे-शीराज़ा था

    हूँ चराग़ान-ए-हवस जूँ काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा
    दाग़ गर्म-ए-कोशिश-ए-ईजाद-ए-दाग़-ए-ताज़ा था

    बे-नवाई तर सदा-ए-नग़्मा-ए-शोहरत 'असद'
    बोरिया यक नीस्ताँ-आलम बुलंद आवाज़ा था
    Read Full
    Mirza Ghalib
    गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार
    लेकिन तिरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा
    Mirza Ghalib
    32 Likes
    लाग़र इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
    मेरा ज़िम्मा देख कर गर कोई बतला दे मुझे

    क्या तअ'ज्जुब है जो उस को देख कर आ जाए रहम
    वाँ तलक कोई किसी हीले से पहुँचा दे मुझे

    मुँह न दिखलावे न दिखला पर ब-अंदाज़-ए-इताब
    खोल कर पर्दा ज़रा आँखें ही दिखला दे मुझे

    याँ तलक मेरी गिरफ़्तारी से वो ख़ुश है कि मैं
    ज़ुल्फ़ गर बन जाऊँ तो शाने में उलझा दे मुझे
    Read Full
    Mirza Ghalib
    बिजली इक कौंध गयी आँखों के आगे तो क्या
    बात करते कि मैं लब तश्न-ए-तक़रीर भी था
    Mirza Ghalib
    19 Likes
    हुस्न ग़म्ज़े की कशाकश से छुटा मेरे बा'द
    बारे आराम से हैं अहल-ए-जफ़ा मेरे बा'द

    मंसब-ए-शेफ़्तगी के कोई क़ाबिल न रहा
    हुई माज़ूली-ए-अंदाज़-ओ-अदा मेरे बा'द

    शम्अ' बुझती है तो उस में से धुआँ उठता है
    शो'ला-ए-इश्क़ सियह-पोश हुआ मेरे बा'द

    ख़ूँ है दिल ख़ाक में अहवाल-ए-बुताँ पर या'नी
    उन के नाख़ुन हुए मुहताज-ए-हिना मेरे बा'द

    दर-ख़ुर-ए-अर्ज़ नहीं जौहर-ए-बेदाद को जा
    निगह-ए-नाज़ है सुरमे से ख़फ़ा मेरे बा'द

    है जुनूँ अहल-ए-जुनूँ के लिए आग़ोश-ए-विदा'अ
    चाक होता है गरेबाँ से जुदा मेरे बा'द

    कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़
    है मुकर्रर लब-ए-साक़ी पे सला मेरे बा'द

    ग़म से मरता हूँ कि इतना नहीं दुनिया में कोई
    कि करे ताज़ियत-ए-मेहर-ओ-वफ़ा मेरे बा'द

    आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'
    किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बा'द

    थी निगह मेरी निहाँ-ख़ाना-ए-दिल की नक़्क़ाब
    बे-ख़तर जीते हैं अरबाब-ए-रिया मेरे बा'द

    था मैं गुलदस्ता-ए-अहबाब की बंदिश की गियाह
    मुतफ़र्रिक़ हुए मेरे रुफ़क़ा मेरे बा'द
    Read Full
    Mirza Ghalib

Similar Writers

our suggestion based on Mirza Ghalib

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari