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Rahat Indori

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मेरे हुजरे में नहीं और कही पर रख दो
आसमान लाये हो ले आओ ज़मीन पर रख दो।

राहत इंदौरी, एक ऐसा शायर जो कि अपने शब्दों की जादूगरी से हमेशा महफिल को जीत लेता था। उनके अंदर जो शायरी को कहने की अदाकारी थी वो शायद ही किसी शायर में देखने को नहीं मिलती थी। उनकी आवाज इतनी बुलंद थी कि मंच पर आते ही लोगों को खामोश कर देती. वह शेर पढ़ते तो झूमकर पढ़ते, आसमान की तरफ देखते, ऐसा लगता कि वह अवाम ही नहीं खुदा से बातें कर रहे हैं. वह इतराते, मुस्कुराते, शर्माते, अलहदा अंदाज में उनकी आवाज तेज होती जो अगले मिसरे में धीमी हो जाती.कोई एक शब्द होता जिस पर जोर देते, उस शब्द के साथ एक खुस्की आती जिसमें कई तरह के बिंब निकलते जैसे विरोध के, बगावत के, चुनौती के, व्यंग्य के, मौज के, उसके बाद ही लग जाता कि अब कुछ ऐसा कहने वाले हैं जिसमें बड़ा संदेश होगा और आखिरी मिसरे तक आते-आते महफिल उनकी हो जाती.शायरी की दुनिया के इस चमकते सितारे ने कई तरह की शायरी की. ग़ज़ल, नज़्में पढ़ीं जो खूब मशहूर हुईं. वहीं, राहत इंदौरी ने कुछ ऐसा भी रचा, जिसमें चुनौती भी है और चुनौती बनकर टकराने का माद्दा भी.

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है

राहत का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ। वे उन दोनों की चौथी संतान हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नूतन स्कूल इंदौर में हुई। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। उन्होंने अपने ही शहर में एक साइन-चित्रकार के रूप में 10 साल से भी कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। चित्रकारी उनकी रुचि के क्षेत्रों में से एक थी और बहुत जल्द ही बहुत नाम अर्जित किया था। यह भी एक दौर था कि ग्राहकों को राहत द्वारा चित्रित बोर्डों को पाने के लिए महीनों का इंतजार करना भी स्वीकार था। यहाँ की दुकानों के लिए किया गया पेंट कई साइनबोर्ड्स पर इंदौर में आज भी देखा जा सकता है।
वे पढ़ाई के साथ साथ खेलकूद में भी माहीर थे। वे अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में फुटबॉल और हॉकी टीम के कप्तान भी रहे हैं। 19 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार अपनी शायरी सुनाई थी। उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया। तत्पश्चात 1985 में मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
राहत इंदोरी ने 27 मई, 1986 को सीमा रहत से शादी की। दंपति की एक बेटी शिबिल और दो बेटे थे- फैसल राहत और सतलज राहत। उन्होंने तब 1988 में उर्दू और हिंदी भाषा की कवि अंजुम रहबर से शादी की और 1993 में दोनों अलग हो गए।

राहत इंदौरी ने लगभर दो दर्जन फ़िल्मों में गीत लिखे। उनके प्रसिद्ध हिन्दी फ़िल्म गीत कुछ इस प्रकार हैं-

आज हमने दिल का हर किस्सा (फ़िल्म- सर)
तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है (फ़िल्म- खुद्दार)
खत लिखना हमें खत लिखना (फ़िल्म- खुद्दार)
रात क्या मांगे एक सितारा (फ़िल्म- खुद्दार)
दिल को हज़ार बार रोका (फ़िल्म- मर्डर)
एम बोले तो मैं मास्टर (फ़िल्म- मुन्नाभाई एमबीबीएस)
धुंआ धुंआ (फ़िल्म- मिशन कश्मीर)
ये रिश्ता क्या कहलाता है (फ़िल्म- मीनाक्षी)
चोरी-चोरी जब नज़रें मिलीं (फ़िल्म- करीब)

राहत इंदौरी ने 11 अगस्त, 2020 को अरबिंदो अस्पताल, इंदौर में 70 साल की उम्र में दो कार्डिएक अरेस्ट से पीड़ित होने के बाद अपनी अंतिम सांस ली। लेकिन जब कभी उर्दू की बात होगी, तहजीब की बात होगी, शेरो-शायरी और साहित्य की बात होगी, अपने लेखन से अपनी शायरी से लोगों के लिए लड़ने वालों की बात होगी, राहत इंदौरी को जरूर याद किया जाएगा.

मैं मर जाऊँ तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना

राहत इंदौरी: किताबें

1- रट

2- करो कादर या साही

3- मेरे बाड़े

4- धुप बहोत है

5- चांद पागल है

6- मौजूद

7- नराज
  • Sher
  • Ghazal

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