main ahmiyat bhi samajhta hoon qahqahon kii magar | मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर

  - Rahat Indori

मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर
मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का

  - Rahat Indori

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As you were reading Shayari by Rahat Indori

    अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे
    चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे

    तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
    ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

    लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज
    परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे

    ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू
    बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

    झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
    वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे

    अजीब रंग था मज्लिस का ख़ूब महफ़िल थी
    सफ़ेद पोश उठे काएँ काएँ करने लगे
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    Rahat Indori
    हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
    कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
    Rahat Indori
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    दो गज़ सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है
    ऐ मौत तूने मुझे ज़मींदार कर दिया
    Rahat Indori
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    चराग़ों को उछाला जा रहा है
    हवा पर रौब डाला जा रहा है
    Rahat Indori
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    न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
    हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा
    Rahat Indori
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