Qateel Shifai

Qateel Shifai

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📍 Lahore· Pakistan

Qateel Shifai shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qateel Shifai's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मर गए हम तो ये कत्बे पे लिखा जाएगा सो गए आप ज़माने को जगाने वाले — Qateel Shifai
काश ले जाते कभी माँग के आँखें मेरी ये मुसव्विर तेरी तस्वीर बनाने वाले — Qateel Shifai
तेज़ धूप में आई ऐसी लहर सर्दी की मोम का हर इक पुतला बच गया पिघलने से — Qateel Shifai
राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ — Qateel Shifai
आख़िरी हिचकी तेरे ज़ानूँ पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ — Qateel Shifai
जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ जाने क्यूँँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं — Qateel Shifai
अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ — Qateel Shifai
खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें — Qateel Shifai
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं — Qateel Shifai
हम उसे याद बहुत आएँगे जब उसे भी कोई ठुकराएगा — Qateel Shifai
वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँँ नहीं करता वो बद-गुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे — Qateel Shifai
तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तेरे आँचल का रंग — Qateel Shifai
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं — Qateel Shifai
मेरे ब'अद वफ़ा का धोका और किसी से मत करना गाली देगी दुनिया तुझ को सर मेरा झुक जाएगा — Qateel Shifai
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते — Qateel Shifai
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था — Qateel Shifai
सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने वो फ़साना जो कभी हम ने सुनाया भी नहीं — Qateel Shifai
यूँँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना — Qateel Shifai
जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में — Qateel Shifai

Ghazal

नामा-बर अपना हवाओं को बनाने वाले अब न आएँगे पलट कर कभी जाने वाले क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख़्वाबों के सिवा रेत पर चाँद की तस्वीर बनाने वाले मय-कदे बन्द हुए ढूँढ़ रहा हूँ तुझ को तू कहाँ है मुझे आँखों से पिलाने वाले काश ले जाते कभी माँग के आँखें मेरी ये मुसव्विर तेरी तस्वीर बनाने वाले तू इस अन्दाज़ में कुछ और हसीं लगता है मुझ से मुँह फेर के ग़ज़लें मेरी गाने वाले सब ने पहना था बड़े शौक़ से काग़ज़ का लिबास जिस क़दर लोग थे बारिश में नहाने वाले छत बना देते हैं अब रेत की दीवारों पर कितने ग़ाफ़िल हैं नए शहर बसाने वाले अद्ल की तुम न हमें आस दिलाओ कि यहाँ क़त्ल हो जाते हैं ज़ंजीर हिलाने वाले किस को होगी यहाँ तौफ़ीक़-ए-अना मेरे बा'द कुछ तो सोचें मुझे सूली पे चढ़ाने वाले मर गए हम तो ये कत्बे पे लिखा जाएगा सो गए आप ज़माने को जगाने वाले दर-ओ-दीवार पे हसरत सी बरसती है 'क़तील' जाने किस देस गए प्यार निभाने वाले — Qateel Shifai
सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो रात का पत्थर न पिघलेगा शुआ'ओं के बग़ैर सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए दिल में भी नग़्मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई ऐ मिरे यारो मेरे दर्द-आश्नाओ चुप रहो क्यूँँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ 'क़तील' अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो — Qateel Shifai
ये मो'जिज़ा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे कि संग तुझ पे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साए को बदन मिरा ही सही दोपहर न भाए मुझे ब-रंग-ए-ऊद मिलेगी उसे मिरी ख़ुश्बू वो जब भी चाहे बड़े शौक़ से जलाए मुझे मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ बरहना शहर में कोई नज़र न आए मुझे वही तो सब से ज़ियादा है नुक्ता-चीं मेरा जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे मैं अपने दिल से निकालूँ ख़याल किस किस का जो तू नहीं तो कोई और याद आए मुझे ज़माना दर्द के सहरा तक आज ले आया गुज़ार कर तिरी ज़ुल्फ़ों के साए साए मुझे वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मा'लूम दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँँ नहीं करता वो बद-गुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ 'क़तील' ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाए मुझे — Qateel Shifai
तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग — Qateel Shifai
खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें — Qateel Shifai
क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था हम डूब गए जागती रातों के भँवर में हाथ उस का हमारे लिए पतवार ही कब था आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार ही कब था मशहूर-ए-ज़माना हैं 'क़तील' उस की उड़ानें वो दाम-ए-मोहब्बत में गिरफ़्तार ही कब था — Qateel Shifai
अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझ को मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझ को मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मा'नी ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को मैं समुंदर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोता-ज़न भी कोई भी नाम मिरा ले के बुला ले मुझ को तू ने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी ख़ुद-परस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझ को बाँध कर संग-ए-वफ़ा कर दिया तू ने ग़र्क़ाब कौन ऐसा है जो अब ढूंढ़ निकाले मुझ को ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन दामन कर दिया तू ने अगर मेरे हवाले मुझ को मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे तू दबे-पांव कभी आ के चुरा ले मुझ को कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ जितना जी चाहे तिरा आज सता ले मुझ को वा'दा फिर वा'दा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील' शर्त ये है कोई बाँहों में संभाले मुझ को — Qateel Shifai
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता समझो वहाँ फलदार शजर कोई नहीं है वो सहन कि जिस में कोई पत्थर नहीं गिरता इतना तो हुआ फ़ाएदा बारिश की कमी का इस शहर में अब कोई फिसल कर नहीं गिरता इनआ'म के लालच में लिखे मद्ह किसी की इतना तो कभी कोई सुख़न-वर नहीं गिरता हैराँ है कई रोज़ से ठहरा हुआ पानी तालाब में अब क्यूँ कोई कंकर नहीं गिरता उस बंदा-ए-ख़ुद्दार पे नबियों का है साया जो भूक में भी लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता करना है जो सर मा'रका-ए-ज़ीस्त तो सुन ले बे-बाज़ू-ए-हैदर दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता क़ाएम है 'क़तील' अब ये मेरे सर के सुतूँ पर भौंचाल भी आए तो मेरा घर नहीं गिरता — Qateel Shifai
वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे मैं तुझ को भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे रहेगा साथ तिरा प्यार ज़िंदगी बन कर ये और बात मिरी ज़िंदगी वफ़ा न करे ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे सुना है उस को मोहब्बत दुआएँ देती है जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे अगर वफ़ा पे भरोसा रहे न दुनिया को तो कोई शख़्स मोहब्बत का हौसला न करे बुझा दिया है नसीबों ने मेरे प्यार का चाँद कोई दिया मिरी पलकों पे अब जला न करे ज़माना देख चुका है परख चुका है इसे 'क़तील' जान से जाए पर इल्तिजा न करे — Qateel Shifai
वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता क्यूँँ बख़्श दिया मुझ से गुनहगार को मौला मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ'यत नहीं करता घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता किस क़ौम के दिल में नहीं जज़्बात-ए-बराहीम किस मुल्क पे नमरूद हुकूमत नहीं करता देते हैं उजाले मिरे सज्दों की गवाही मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी मैं आज भी औरों को नसीहत नहीं करता इंसान ये समझें कि यहाँ दफ़्न ख़ुदा है मैं ऐसे मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता दुनिया में 'क़तील' उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई जो ज़ुल्म तो सहता है बग़ावत नहीं करता — Qateel Shifai

Nazm

रौशनी डूब गई चाँद ने मुँह ढाँप लिया अब कोई राह दिखाई नहीं देती मुझ को मेरे एहसास में कोहराम मचा है लेकिन कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती मुझ को रात के हाथ ने किरनों का गला घूँट दिया जैसे हो जाए ज़मीं-बोस शिवाला कोई ये घटा-टोप अँधेरा ये घना सन्नाटा अब कोई गीत है बाक़ी न उजाला कोई जिस ने छुप-छुप के जलाया मिरी उम्मीदों को वो सुलगती हुई ठंडक मिरे घर तक पहुँची देखते देखते सैलाब-ए-हवस फैल गया मौज-ए-पायाब उभर कर मिरे सर तक पहुँची मिरे तारीक घरौंदे को उदासी दे कर मुस्कुराते हैं दरीचों में इशारे क्या क्या उफ़ ये उम्मीद का मदफ़न ये मोहब्बत का मज़ार इस में देखे हैं तबाही के नज़ारे क्या क्या जिस ने आँखों में सितारे से कभी घोले थे आज एहसास पे काजल सा बिखेरा उस ने जिस ने ख़ुद आ के टटोला था मिरे सीने को ले लिया ग़ैर के पहलू में बसेरा उस ने वो तलव्वुन कि नहीं जिस का ठिकाना कोई उस के अंदाज़-ए-कुहन आज नए तौर के हैं वही बेबाक इशारे वही भड़के हुए गीत कल मिरे हाथ बिके आज किसी और के हैं वो महकता सा चहकता सा उबलता सीना उस की मीआ'द है दो रोज़ लिपटने के लिए ज़ुल्फ़ बिखरी हुई बिखरी तो नहीं रह सकती फैलता है कोई साया तो सिमटने के लिए जिस ने छुप-छुप के जलाया मिरी उम्मीदों को वो सुलगती हुई ठंडक मिरे घर तक पहुँची देखते देखते सैलाब-ए-हवस फैल गया मौज-ए-पायाब उभर कर मिरे सर तक पहुँची मिरे तारीक घरौंदे को उदासी दे कर मुस्कुराते हैं दरीचों में इशारे क्या क्या उफ़ ये उम्मीद का मदफ़न ये मोहब्बत का मज़ार इस में देखे हैं तबाही के नज़ारे क्या क्या जिस ने आँखों में सितारे से कभी घोले थे आज एहसास पे काजल सा बिखेरा उस ने जिस ने ख़ुद आ के टटोला था मिरे सीने को ले लिया ग़ैर के पहलू में बसेरा उस ने वो तलव्वुन कि नहीं जिस का ठिकाना कोई उस के अंदाज़-ए-कुहन आज नए तौर के हैं वही बेबाक इशारे वही भड़के हुए गीत कल मिरे हाथ बिके आज किसी और के हैं वो महकता सा चहकता सा उबलता सीना उस की मीआ'द है दो रोज़ लिपटने के लिए ज़ुल्फ़ बिखरी हुई बिखरी तो नहीं रह सकती फैलता है कोई साया तो सिमटने के लिए — Qateel Shifai