raabta laakh sahi qaafila-salaar ke saath | राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ

  - Qateel Shifai

राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ
हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ

ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे
दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ

किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँँ
ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ

लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है
इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ

दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर
जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ

दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील'
हज़रत 'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ

  - Qateel Shifai

Wahshat Shayari

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