Anis shah anis

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Anis shah anis shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Anis shah anis's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में — Anis shah anis
जो भी रौशन थे बुझा कर सब उमीदों के चराग़ सो गए आज भी हम ओढ़ के तन्हाई को — Anis shah anis
फिर से अरमान कोई क़त्ल हुआ है मेरा अश्क आए हैं मेरे ग़ुस्ल-ए-जनाज़ा करने — Anis shah anis
गला ही घोंट देता है वो अपनी तिश्नगी का मैं उस को ज़हर लगता हूँ सो पीता ही नहीं है — Anis shah anis
जब मेरे ऐब नज़र ही नहीं आते है मुझे ख़ूबियाँ तेरी मुझे ख़ाक नज़र आएँगी? — Anis shah anis
अना का बोझ लिए सर पे घूमता हूँ मैं इसे उतारना आसान क्यूँ नहीं होता — Anis shah anis

Ghazal

जवाँ है जिस्म रूह पर निढाल है कमाल है लहू में क्यूँ नहीं तेरे उबाल है कमाल है भरा हुआ है वादों से ये थाल है कमाल है मगर न इस में रोटी है न दाल है कमाल है ये दाने साफ़ दिख रहे हैं इन परिंदों को मगर जो दिख नहीं रहा इन्हें वो जाल है कमाल है ग़रीब का छुआ हुआ हराम है हुज़ूर को मगर ग़रीब का लहू हलाल है कमाल है जिसे हमारी इक ख़ुशी भी देखना मुहाल था हमारी मौत पर उसे मलाल है कमाल है तुम्हारी बद ज़ुबानी पर तो मुतमईन हैं सभी हमारी नेक बात पर बवाल है कमाल है हम अपने इक सवाल के जवाब के थे मुंतजिर सवाल के जवाब में सवाल है कमाल है सुना है ग़मजदा बहुत हैं वो हमारे हाल पर उन्हें हमारी फ़िक्र है ख़याल है कमाल है दरख़्तों ने लिबास-ए-बर्ग-ओ-गुल उतारे है 'अनीस' ख़िज़ाँ की रुत भी मौसम-ए-विसाल है कमाल है — Anis shah anis
सितम करो तुम या ज़ुल्म ढाओ सहूँगा सब बे-ज़बान हूँ मैं मुझे सभी कहते अन्नदाता किसान हूँ हाँ किसान हूँ मैं कभी है सूखा कभी है बारिश कभी है बिजली की ये कटौती कटे परों का मैं हूँ परिंदा कि उस की झूठी उड़ान हूँ मैं कभी उठाई जो बात हक़ की मिली है लाठी चली है गोली दिए हुकूमत ने ज़ख़्म दिल पर तो इस के रुख़ पर निशान हूँ मैं भँवर में भावों के मैं फँसा हूँ न छोर मेरी मुसीबतों का अगर मैं डूबा तो तुम भी डूबो तुम्हारा अब इम्तिहान हूँ मैं लगी है क़र्ज़ों से होड़ मेरी कभी हराया कभी मैं हारा गले लगा मौत सो गया हूँ सफ़र की गहरी थकान हूँ मैं ये कैमरे को मेरी तरफ़ भी ज़रा घुमाओ सवाल पूछो जवाब हूँ हर सवाल का मैं चुनाव तेरा रुझान हूँ मैं चलो उठो एक हो लड़ो अब नहीं है कोई अनीस अपना सियासी फ़िरक़ों में मुझ को बाँटा कि जैसे उन की दुकान हूँ मैं — Anis shah anis
करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है तेरा दीदार नामुमकिन तभी तो मांँ बनाई है बनाया भी है वालिद के लिए जन्नत का दरवाज़ा मगर पैरों तले मांँ के ये जन्नत भी बनाई है कभी रातों में जब भी जाग कर मैं रोने लगता था तभी उठकर मुझे मांँ ने कोई लोरी सुनाई है मैं इतना ख़ूब-सूरत तो नहीं पर मांँ को लगता हूँ हुआ बीमार तो कहती नज़र किस ने लगाई है मँगाई एक रोटी थी वो दो ले कर चली आई मेरी मांँ तो अभी तक भी न गिनती सीख पाई है लगा कमज़ोर जो भाई माँ उस के पास जा बैठी मैं सब सेे छोटा था लेकिन वो उस के हिस्से आई है बड़ी ही दूर रहता हूँ अनीस उस शहर-ए-मक्का से मुकम्मल हो गया अब हज मेरी मांँ मुस्कुराई है — Anis shah anis
वो मेरी ज़िंदगी से कुछ ऐसे ग़ुजर गया इक फूल शाख़ से गिरा गिर कर बिखर गया मैं सोचता था हर्फ़-ए-दुआ से असर गया रब की अता से दस्त-ए-तलब मेरा भर गया दौर-ए-ख़िज़ाँ में साथ ये तन्हाइयाँ रहीं आए समर तो पेड़ परिंदों से भर गया कब तक रहोगे मुब्तला ग़फ़लत की नींद में जागो कि अब तो सर से भी पानी गुज़र गया ऐसी घुटन कि साँस भी लेना हुआ मुहाल ये कौन इतना ज़हर हवाओं में भर गया हाकिम ने देखो छीन लिए ना तुम्हारे हाथ इनआम-ए-फ़न की चाह में दस्त-ए-हुनर गया आख़िर तेरी अना की बग़ावत में ऐ 'अनीस' दस्तार तो गई ही गई साथ सर गया — Anis shah anis
तेरी शोख़ी में क़ुदरत के ये सारे राज़ पलते हैं अदा तेरी जो बदले तो नज़ारे ख़ुद बदलते हैं ज़रा दिल में उठे जज़्बात का तूफ़ाँ सँभालो तुम ये मौजें सर पटकती हैं समुंदर भी मचलते हैं बहारें फिर से लौट आई हैं इस वीराँ गुलिस्ताँ में तेरे तेवर की लर्ज़िश से ये मौसम भी बदलते हैं बरस जाता है सावन भी बड़ी ही बे-क़रारी से मेरे महबूब की आँखों से जब आँसू निकलते हैं जो देखीं सिलवटें बिस्तर पे उन के ये लगा मुझ को मैं ही तन्हा नहीं वो भी तो अब करवट बदलते हैं सदा ही सीख देती हैं ये तेरी कोशिशें हम को मिलेंगी मंज़िलें उन को जो गिरकर भी सँभलते हैं हुआ हमराह जब से ये 'अनीस' इन राहों में तेरी ये दुनिया रश्क करती है दिवाने हाथ मलते हैं — Anis shah anis
हम सर-ए-बज़्म यूँँ गुफ़्तार नहीं कर सकते अपने रिश्ते को तो अख़बार नहीं कर सकते रोज़ा रक्खा है हमारी भी तो इन आँखों ने बिना दीदार के इफ़्तार नहीं कर सकते सिर्फ़ सीने को निशाना ही बनाते हरदम पीठ पर हम तो कभी वार नहीं कर सकते कोई सोया है तो हम उस को जगा सकते हैं जागता हो उसे बेदार नहीं कर सकते किस को कहते हैं अदब ख़ूब हमें आता है तेरे क़दमों में ये दस्तार नहीं कर सकते अपने भाई को हराने के लिए हरगिज़ ही उस के दुश्मन को तरफ़दार नहीं कर सकते क्या फ़राइज़ हैं अनीस अपने हमें है मालूम तेरे जल्वों का तलबगार नहीं कर सकते — Anis shah anis
ऐ यार तेरा साथ निभाने का शुक्रिया ज़ेर-ए-ज़मीन मुझ को सुलाने का शुक्रिया तू ने दिया फ़रेब मेरी आँखें खुल गईं ग़फ़लत में सो रहा था जगाने का शुक्रिया जो ठोकरें मिली तो सँभलना सिखा गईं पत्थर हमारी राह में आने का शुक्रिया ऐ नाख़ुदा करम कि सिखाया है तैरना मँझधार में यूँँ मुझ को डुबाने का शुक्रिया दिल का ग़ुबार साफ़ है आँखें भी नम नहीं जी भर के तेरा मुझ को रुलाने का शुक्रिया दुनिया से नेकियों का सिला भी बदी मिला दे दी है ख़ूब सीख ज़माने का शुक्रिया दिल ने अनीस तुझ को किया याद है बहुत मेरे ख़याल-ओ-ख़्वाब में आने का शुक्रिया — Anis shah anis
तेरी दोस्ती भी कमाल है तेरी दुश्मनी भी मिसाल है मुझे क़त्ल करता है शौक़ से मेरी मौत पर भी मलाल है तेरा मुझ पे है ये करम कि तू भी निभा रहा है रिवायतें मुझे दे रहा है मुआवज़ा मेरे तिफ़्ल का जो ख़याल है तेरे पास रंग-ए-बहार है मैं तो फूल दौर-ए-ख़िज़ाँ का हूँ मेरे पास रंग न नूर है तेरे पास हुस्न-ओ-जमाल है मेरी ज़िंदगी में मआ'नी हैं ये उरूज और ज़वाल के तू जो साथ था वो उरूज था तुझे खो दिया ये ज़वाल है तेरे हाथ मेरी ये आबरू तेरे हाथ है मेरी डोर भी तू कहे अगर तो हराम है तू कहे अगर तो हलाल है सुन अनीस तू ही था राहबर तेरे हाथ में ही कमान थी मेरा कारवाँ तो ये लुट गया तेरी रहबरी पे सवाल है — Anis shah anis
तेरी बातों में सच्चाई नहीं है कि मुझ में कुछ भी अच्छाई नहीं है तुझे नज़रें झुका कर देखता हूँ तेरे क़द में जो ऊँचाई नहीं है यक़ीं कैसे दिलाएगा तू ख़ुद को तेरा दिल मेरा शैदाई नहीं है दिया इल्ज़ाम तू ने आईने पर तेरे रुख़ पर ही रा'नाई नहीं है बहुत चाहा कि तुझ में डूब जाऊँ करूँँ क्या तुझ में गहराई नहीं है चुराता है निगाहें मुझ सेे तू यूँँ कि मुझ सेे ज्यूँ शनासाई नहीं है क़ुसूर इस में चराग़ों का नहीं कुछ तेरी आँखों में बीनाई नहीं है अगर बदनाम तू रिश्ता करेगा तो क्या तेरी ये रुस्वाई नहीं है समझता है बहुत नादान सब को मगर तुझ में ही दानाई नहीं है अनीस अब कौन देगा राह तुझ को अगर तुझ में तवानाई नहीं है — Anis shah anis