जो तू कहे सच वो ही फ़क़त है तो ये ग़लत है
सहीह तेरा मेरा ग़लत है तो ये ग़लत है
है सारे आलम का तू सिकंदर भले ही लेकिन
हमारे दिल तक ये सल्तनत है तो ये ग़लत है
अदब न अज़्मत न कोई ताज़ीम है बड़ों की
अगर ये तालीम-ओ-तर्बियत है तो ये ग़लत है
लिबास-ए-शर्म-ओ-हया न तन पर रिदा न सर पर
अगर ये दौर-ए-जदीदियत है तो ये ग़लत है
अनीस तुम से नहीं हूँ मैं मुत्तफ़िक़ मगर तुम
समझते हो ये मुख़ालिफ़त है तो ये ग़लत है
— Anis shah anis















