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Jaun Elia

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शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई
लेकिन यक़ीन सब को दिलाता रहा हूँ मैं।

उर्दू के गुलशन में कई जादुई खुशबू वाले फूल महके. इसी गुलशन के एक महकते फूल का नाम जॉन एलिया है। मौजूदा दौर के इस मकबूल शायर का‌ जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के शहर अमरोहा में हुआ था। जॉन साहब के पिता का नाम अल्लामा शरीफ हसन एलिया था जो जाने-माने विद्वान, शायर और विचारक थे। उनके बड़े भाई रईस अमरोही जाने-माने शायर, पत्रकार और डॉक्टर थे। जॉन साहब के दूसरे भाई सय्यद मुहम्मद तकी़ भी विचारक और फ़लसफी़ रहे हैं।
एक उर्दू पत्रिका थी, इंशा. इसी को निकालने के दौरान जाहिदा हिना से मुलाकात हुई. इश्क हुआ. शादी हुई. तीन बच्चे हुए लेकिन रिश्ता ज्यादा दिन चल नहीं पाया. फिर हुआ 1984 में तलाक. तलाक के बाद तबीयत से ही सारे जहां से खफा जॉन एलिया डिप्रेशन में रहने लगे उर्दू शायरी का यह चमकता सितारा शराब का शिकार हो गया और खुद को बर्बाद करने के नए-नए तन खोजने लगा:

एक ही तो हवस रही है हमें
अपनी हालत तबाह की जाए।

जॉन एलिया साहब ने 8 साल की उम्र में ही पहला शेर कह लिया था। जवानी का दौर आते-आते वह एक ख्याली प्रेमिका सोफिया के सपने देखने लगे और उसी में जीने लगे। बचपन में मदरसे से जहां उन्होंने उर्दू, अरबी, फारसी का इल्म हासिल किया, आगे पढ़ाई के दौरान अंग्रेजी भी वह धड़क के से बोलने लगे और संस्कृत भी चलती फिरती सीख ली।

जॉन एलिया साहब को अपने ख्यालात और जज्बात का इजहार शेरों में करने के लिए कभी ज्यादा देर सोचना नहीं पड़ा। वह हर बात को उसी बेसाख़्तगी से कह जाते थे जैसे रोज़मर्रा की गुफ्तगू कर रहे हो। जरा देखिए, मोहब्बत में जॉन एलिया अपने महबूब से कितनी बेसाख़्तगी और खूबसूरत अंदाज में मुखा़तब होते हैं:

शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती
आप, वह, जी, मगर ये सब क्या है
तुम मिरा नाम क्यों नहीं लेती।

परिवार के ज्यादातर लोगों के पाकिस्तान चले जाने की वजह से जॉन 1956 में कराची में जाकर बस गए। अपने आखिरी वक्त आने तक वह अपनी जन्मभूमि अमरोहा को प्यार से याद करते रहे।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जॉन वह अकेला शायर है जिन्होंने उर्दू शायरी को नए अंदाज में पेश किया। जॉन की शायरी में एक अलग मिश्रण है। जिससे पाठकों को शायरी के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। उनकी शायरी क्लासिक आशिक-माशूक की शायरी ना होकर जमीन पर रहते औरत मर्द के प्रेम नफरत पर लिखी गई शायरी है। जॉन एलिया का दर्द भी आज के आदमी का है जो बादलों को संदेश वाहक बनाने के बदले माशूक से सीधा मुखातिब होता है। उनका कलाम समाज के जरिए स्थापित मूल्यों के खिलाफ गुस्से और अपनी जीत के आगे न झुकने की शायरी है। आखिर में उनका यही स्वभाव उनकी पहचान और उनके टूटने की वजह भी बन गया। वह खुद कहते हैं:

इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने।

फलसफा, इस्लामी तारीख़, इस्लामी सूफी रिवायत, इस्लामी साइंस पर जॉन का इल्म किसी इंसाइकोलोरपीडिया की तरह था इस इल्म का निचोड़ उनकी शायरी में भी झलकता है। मेहबूब के साथ उनका बेबाक अंदाज़ में वार्तालाप बेहद निराला है। ये बेबाकी कभी कभार आक्रमकता तक बदल जाती है।

एक शख्स कर रहा है अभी तक वफा का जिक्र
काश उस ज़बां-दराज़ का मुंह नोच ले कोई।

जॉन एलिया ने अपनी जिंदगी बेहद बेपरवाई से गुजा़री वह खुद कहते हैं:

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम?

इस शायर, विद्वान और अत्यधिक संवेदनशील इंसान ने 8 नवंबर 2002 को अपने सभी प्यारों से दूर एक दोस्त के घर लंबी बीमारी के बाद इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया।

जॉन एलिया साहब की कविताओं का संकलन इस प्रकार है:

शायद (1991)
यानी (2003)
गुमान (2004)
लेकिन (2006)
गोया (2008)
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

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