Bhuwan Singh

Bhuwan Singh

@bhuwansingh

Bhuwan Singh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bhuwan Singh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बोलो तो अभी ख़त्म करूँँ अपनी कहानी इस के लिए इक रस्सी फिर इक पंखा लगेगा — Bhuwan Singh
कोई सज़ा सुना ही न पाए मेरे लिए कानून ऐसा कोई बनाए मेरे लिए — Bhuwan Singh

Ghazal

दो जहानों में भटक सकती हैं घर की बातें आइने से न करो दीदा-ए-तर की बातें हम को अब कोई तवक़्क़ो न रही कमरे से हम ने सुन रक्खी हैं साहब पस-ए-दर की बातें आप की बात को हम ने रखा अपने तक ही आप उधर ले गए थे सारी इधर की बातें क्यूँ परिंदों से ज़ियादा दुखी था वो बूढ़ा क्यूँ कोई सुन न सका कटते शजर की बातें उम्र भर उस को दिखाता रहा मंज़िल का ख़्वाब पर कभी हों न सकी उस से सफ़र की बातें सोचो ये अहल-ए-ज़मीं मान ले काफ़िर को ख़ुदा सोचो दरवेश करे दौलत-ओ-ज़र की बातें दिन को मैं रात बना सकता हूँ दो मिसरों में तुम नहीं जानते हो मेरे हुनर की बातें — Bhuwan Singh
तस्वीर बनाता हूँ तो क़ीमत नहीं मिलती मैं एक मुसव्विर हूँ सो इज़्ज़त नहीं मिलती सोने के लिए ज़िंदगी ने दे दिया बिस्तर ख़्वाबों के लिए अब भी इजाज़त नहीं मिलती बरसात में कच्चे घरों को देख के सोचा क्या होता है फिर उस का जिसे छत नहीं मिलती वो दिखने में बेहतर है जिसे देखता हूँ मैं ख़्वाबों से मेरे तेरी तो सूरत नहीं मिलती मैं कैसे तेरे हुस्न का दीदार करूँँगा ख़ुदस ही तो मुझ को कभी फ़ुर्सत नहीं मिलती मुझ को बता तू कैसे मेरे साथ रहेगा जब तेरी मेरी एक भी आदत नहीं मिलती लेता हूँ सहारा मैं दवा और दुआ का पर तुझ सेे मिले ज़ख़्म से राहत नहीं मिलती क़िस्मत में मेरी वो नहीं है जानता हूँ मैं ख़ैरात में भी मुझ को मोहब्बत नहीं मिलती था एक कहानी में 'भुवन' नाम का किरदार आख़िर में तो यार उस को भी औरत नहीं मिलती — Bhuwan Singh
सब सोचते थे पहले कि क़िस्मत का हाथ है मैं ने कहा भी सब सेे कि मेहनत का हाथ है मैं शेर-ओ-शायरी की बदौलत यहाँ पे हूँ सब कहते है कि इस में उस औरत का हाथ है हाथों में आप के है लकीरें तबाही की या'नी हर एक हाथ मुसीबत का हाथ है कैसे मेरी ज़मीन रक़ीबों में बँट गई क्या इस में आप ही की हुकूमत का हाथ है ज़ख़्मों को मैं सबूत बना कर कहाँ फिरूँ हर सम्त उस के साथ अदालत का हाथ है दोनों के बीच फ़ासले आने थे आ गए और इस में तो फ़क़त मेरी ग़ुर्बत का हाथ है लैला से पहले जैसा भी था क़ैस क़ैस था मजनूँ बनाने में तो मोहब्बत का हाथ है — Bhuwan Singh
जो हुस्न-ओ-मोहब्बत का तलबगार नहीं है दुनिया में कोई ऐसा समझदार नहीं है दुख है मैं मिलाता हूँ मेरे यार को सब सेे उस पर कि मेरा यार वफ़ादार नहीं है जो इश्क़ में है उस को सज़ाऍं ही मिलेंगी जो क़त्ल करेगा वो गुनहगार नहीं है मैं आइने में उस को नहीं देख सकूँगा वो जो मिरा क़ातिल है गिरफ़्तार नहीं है हम वक़्त से भी तेज़ नहीं भाग सकेंगे इस ज़िंदगी की इतनी भी रफ़्तार नहीं है वो कार-ए-वफ़ा से ही मगर सच में मरेगा वो बा-वफ़ा है कोई अदाकार नहीं है ये ज़ख़्म-ए-तमन्ना है मेरी जान का दुश्मन कोई भी दवा इस पे असरदार नहीं है हैरत है यहाँ मेरा ख़सारा नहीं होता इस शहर में क्यूँ हुस्न का बाज़ार नहीं है वो तर्क-ए-त'अल्लुक़ के मवाक़े नहीं देता वो रिश्ता निभाने को भी तैयार नहीं है अब उस के लिए इश्क़ बचा ही नहीं तुझ में तू यार 'भुवन' इस लिए बीमार नहीं है — Bhuwan Singh
मैं पहले ग़ज़ल से ही इक चेहरा बनाता था मुझ को भी ये लगता था मैं अच्छा बनाता था मुझ को तो मोहब्बत ने गुमराह किया है दोस्त मैं मंज़िलों तक वरना ख़ुद रस्ता बनाता था दिल की सुना करता था मैं पहले बहुत पहले इस दिल ने जो भी चाहा जो सोचा बनाता था मैं सोचता हूँ हम को रब ने यहाँ भेजा क्यूँ क्या चोट ही खाने को बस लड़का बनाता था आ जाता था कोई भी मैं इस लिए डर में था सो घर से भी पहले मैं दरवाज़ा बनाता था मेरी इसी आदत ने बर्बाद किया मुझ को मैं गै़रों से मिलता था और अपना बनाता था औरों को मुयस्सर था दीदार-ए-बदन उस का लेकिन मेरे ही आगे वो पर्दा बनाता था — Bhuwan Singh

Nazm

"इक शख़्स" थोड़ा बेचैन है और आँखों में भी पानी है देखो इस शख़्स को भी कोई परेशानी है जो पसंद आता था अब उस सेे ही डर जाता है जानते हो ये किसी नाम से घबराता है इक इसी नाम ने बर्बाद किया था उस को आज बस इस लिए ही याद किया था उस को नींद फिर कैसे लगे जाए भी क्यूँ सोने वो याद जो कर लिया तो लग गया है रोने वो रात भर रोएगा अब सुर्ख़ पड़े नैन से वो माँ तो समझेगी कि सोया है बड़े चैन से वो माँ की ख़ातिर ही तो मुॅंह छुप गया था चादर से जाने पर किस लिए अब उठ गया है बिस्तर से या'नी अब ऐसा कोई काम करेगा लड़का अपने घर वालों को बदनाम करेगा लड़का काम जो करना है उस काम से घबराया है शाम को इस लिए मय-ख़ाने से हो आया है ज़िक्र कर आया था इस काम का मय-ख़ाने में कोई शय खोज रहा इस लिए तह-ख़ाने में किसी आवाज़ बिना होगा तमाशा ऐसा शोर करता नहीं हथियार तलाशा ऐसा ख़ुश तो है हाथ में रस्सी लिए मन अब उस का काँपने लग गया है पर ये बदन अब उस का मुस्कुरा कर मगर कहता है कि सुन बात मिरी अलविदा हँस के ही कर आख़िरी है रात मिरी या'नी अब ज़िंदगी का आख़िरी दम आ गया है आगे बस मौत ही है ऐसा क़दम आ गया है कँपकँपाते लबों से नाम वही जाप रहा आँखें छत देख रही हाथ गला नाप रहा नाम अब उस के गले में ही अटक जाएगा देखते देखते वो छत से लटक जाएगा क्यूँ भला इतना है अफ़सुर्दा वो भी मेरी तरह होना क्यूँ चाहता है मुर्दा वो भी मेरी तरह मुझ सा क्यूँ दिख रहा है मुझ को हर इक मायने में मुझ को ये शख़्स ही क्यूँ दिख रहा है आइने में — Bhuwan Singh
"हसरत-ए-वस्ल" ये तेरा और मेरा मिलना सब को खल जाए तू मिलना ऐसे कि हर कोई मुझ सेे जल जाए तू मुझ को रख ले अगर मिलने आऊॅं तेरे घर फिर आब-ओ-दाना मेरा तेरे घर से चल जाए तुझी से मिलने के ख़ातिर सॅंवर रही हूँ मैं ये पहली बार है तो थोड़ा डर रही हूँ मैं दुपट्टा बाँधने वाली ने रक्खा है पल्लू ये देख तेरे लिए क्या क्या कर रही हूँ मैं मेरी पसंद की इक बात तुझ सेे कहनी थी सो तेरे शहर में तेरी पसंद पहनी है मैं चाहती हूँ ये पल मुझ को याद रह जाए तो हाथ थाम के कह दूँ जो बात कहनी है तू मेरे दिल पे तेरे इश्क़ का नक़ाब लगा मैं लुट भी जाने को राज़ी हूँ तू हिसाब लगा पसंद है मुझे बस तेरे हाथ से सब कुछ मैं चाहती हूँ तू इन बालों में गुलाब लगा — Bhuwan Singh