है बुलंद उसका ही नाम बेवफ़ाओं में
इसलिए गिना जाता है उसे बलाओं में
अंधा होना लाज़िम था मैं था ही मोहब्बत में
रोज़ लेता था उसका नाम अप्सराओं में
ज़ख़्म आज भी मेरे ठीक हो नहीं पाए
ज़हर ही मिलाता था वो मिरी दवाओं में
रोज़ उसके ही ख़ातिर क्यूँँॅं करूँँ दुआएँ मैं
जब कसर नहीं छोड़ी उसने बद-दुआओं में
उसकी याद से इतना दूर आ गया हूॅं मैं
अब तो बस ख़ुदा दिखता है सभी दिशाओं में
मेरे खेत की ख़ुशबू मुझ तलक नहीं आती
कुछ तो बात है यारो शहर की हवाओं में
जाने किसके कहने पर काट लेंगे अपनी नस
सोचो कितना डर होगा आशिक़ों की माओं में
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