जितना सोचता हूँ उसको उतनी खलती रहती है
इक ही बात मेरे ज़ेहन में यूँँ चलती रहती है
इक मैं हूँ कि जिसका दुनिया में बस इक ही यार है
इक वो है जो अपने यार ही बदलती रहती है
As you were reading Shayari by Bhuwan Singh
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