वो आई और बस मिरी ख़ुशियाँ कुचल गई
शायद मैं ख़ुश था उसको यही बात खल गई
बस उसके होने भर से ज़माने में नूर था
वो जो चला गया तो ये दुनिया बदल गई
इक रिश्ता मुझ सेे था तो मुझे फ़ासले मिले
इक रिश्ता ग़ैर से था वो जिस
में फिसल गई
तुम इसको मेरा शौक़ नहीं ज़िंदगी कहो
ये शेर-ओ-शायरी में तो 'उम्रें निकल गई
आशिक़ ग़रीब था तो समझ जाओ क्या हुआ
वो मर गया सड़क पे वो अपने महल गई
ये इतना करके भी तुझे विर्से में क्या मिला
जब तूने घर जलाया वसीयत भी जल गई
शायद किसी ने याद किया है तुझे 'भुवन'
ये हिचकियाँ बता रही है बात चल गई
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