दो जहानों में भटक सकती हैं घर की बातें
आइने से न करो दीदा-ए-तर की बातें
हम को अब कोई तवक़्क़ो न रही कमरे से
हम ने सुन रक्खी हैं साहब पस-ए-दर की बातें
आप की बात को हम ने रखा अपने तक ही
आप उधर ले गए थे सारी इधर की बातें
क्यूँ परिंदों से ज़ियादा दुखी था वो बूढ़ा
क्यूँ कोई सुन न सका कटते शजर की बातें
उम्र भर उस को दिखाता रहा मंज़िल का ख़्वाब
पर कभी हों न सकी उस से सफ़र की बातें
सोचो ये अहल-ए-ज़मीं मान ले काफ़िर को ख़ुदा
सोचो दरवेश करे दौलत-ओ-ज़र की बातें
दिन को मैं रात बना सकता हूँ दो मिसरों में
तुम नहीं जानते हो मेरे हुनर की बातें
— Bhuwan Singh















