दो जहानों में भटक सकती हैं घर की बातें
आइने से न करो दीदा-ए-तर की बातें
हम को अब कोई तवक़्क़ो न रही कमरे से
हमने सुन रक्खी हैं साहब पस-ए-दर की बातें
आप की बात को हमने रखा अपने तक ही
आप उधर ले गए थे सारी इधर की बातें
क्यूँ परिंदों से ज़ियादा दुखी था वो बूढ़ा
क्यूँ कोई सुन न सका कटते शजर की बातें
'उम्र भर उसको दिखाता रहा मंज़िल का ख़्वाब
पर कभी हों न सकी उस से सफ़र की बातें
सोचो ये अहल-ए-ज़मीं मान ले काफ़िर को ख़ुदा
सोचो दरवेश करे दौलत-ओ-ज़र की बातें
दिन को मैं रात बना सकता हूँ दो मिसरों में
तुम नहीं जानते हो मेरे हुनर की बातें
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