Shariq Kaifi

Shariq Kaifi

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Shariq Kaifi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shariq Kaifi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उस धोके ने तोड़ दिया है इतना मुझ को अब कुछ भी समझा लेती है दुनिया मुझ को — Shariq Kaifi
फिर तुम्हारे बराबर खड़ा शख़्स कुछ इस तरह से हँसा जैसे तुम ने बताया हो उस को है ये भी दीवाना मेरा — Shariq Kaifi
कौन कह सकता है उस को देख कर ये वही है जो हमारा था कभी — Shariq Kaifi
ये भी इक तरकीब है दुश्मन से लड़ने की गले लगा लो जिस पर वार नहीं कर सकते — Shariq Kaifi
आधा मालिक हो जाता है पहला दावेदार किसी का — Shariq Kaifi
मुमकिन ही नहीं जीतना कोशिश से कोई दिल कुछ बस में नहीं बाल बनाने के अलावा — Shariq Kaifi
सब आसान हुआ जाता है मुश्किल वक़्त तो अब आया है — Shariq Kaifi
कब तलक झाँकिए उन आँखों में जिन में कुछ भी न हो हया के सिवा — Shariq Kaifi
जाने से कोई फ़र्क़ ही उस के नहीं पड़ा क्या क्या समझ रहा था बिछड़ने के डर को मैं — Shariq Kaifi
एक दिन हम अचानक बड़े हो गए खेल में दौड़कर उस को छूते हुए — Shariq Kaifi
कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा किस को इतनी आसानी से हासिल था मैं — Shariq Kaifi
पिछली बेंच का बच्चा है दिल इस को हाथ उठाने देना — Shariq Kaifi
तुम से बढ़कर कौन दुनिया में मेरे नज़दीक है इक तुम्हीं तो हो कि जिस का दिल दुखा सकता हूँ मैं — Shariq Kaifi
जाइए अब घर पे जा के रोइए आप के बस का तमाशा भी नहीं — Shariq Kaifi
आओ गले मिल कर ये देखें अब हम में कितनी दूरी है — Shariq Kaifi
मिले तो कुछ बात भी करोगे कि बस उसे देखते रहोगे — Shariq Kaifi
झूट पर उस के भरोसा कर लिया धूप इतनी थी कि साया कर लिया — Shariq Kaifi
शाम से छत पर घुम रहा हूँ एक दिए के आगे-पीछे — Shariq Kaifi
शिकारी से बचने में कैसा कमाल निशाने पे रहना बड़ी बात है — Shariq Kaifi

Ghazal

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है सोते में भी जैसे कोई सिसकी लेता है घर में तो इस माहौल का मैं आदी हूँ लेकिन बाज़ारों की वीरानी से दम घुटता है मुद्दत से मैं सोच रहा था अब समझा हूँ जेब और आँख के ख़ाली-पन में क्या रिश्ता है इतने लोग मुझे रुख़्सत करने आए हैं घर वापस जाना भी तमाशा सा लगता है लोग तो अपनी जानिब से कुछ जोड़ ही लेंगे इतनी अधूरी बातें हैं वो क्यूँँ करता है अपनी क्या इन रस्तों के बारे में सोचूँ उन का सफ़र तो मेरी उम्र से भी लम्बा है उस की आँखों से ओझल मत होना 'शारिक़' पीछा करने वाला बहुत तन्हा होता है — Shariq Kaifi
तरह तरह से मिरा दिल बढ़ाया जाता है मगर कहे से कहीं मुस्कुराया जाता है अभी मैं सोच रहा था कि कुछ कहूँ तुझ से कि देखता हूँ तिरा घर सजाया जाता है गुनाहगारों में बैठे तो इंकिशाफ़ हुआ ख़ुदा से अब भी बहुत ख़ौफ़ खाया जाता है नए नए वो अदाकार जानते ही न थे कि पर्दा गिरते ही सब भूल जाया जाता है तवक़्क़ुआत का यूँँ भी ख़याल रखता हूँ बड़े यक़ीं से मुझे आज़माया जाता है तमाम उम्र मिलाई जुनूँ की ताल से ताल ये गीत सब से कहाँ गुनगुनाया जाता है अब इस तरह की मोहब्बत कभी न हो शायद कि दरमियाँ में कहीं जिस्म आया जाता है समझ में आए न आए ये कुछ हुआ है ज़रूर यक़ीं जो तुझ पे मिरा डगमगाया जाता है — Shariq Kaifi
होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या मैं आज न जागा तो सवेरा न हुआ क्या सब भीगी रुतें नींद के उस पार हैं शायद लगती है ज़रा आँख तो आती है हवा क्या हम खोज में जिस की हैं परेशान अज़ल से बीमार की आँखों ने वो दर ढूँड लिया क्या मक़्तूल को बाँहों में लिए बैठा रहूँ क्यूँँ इस जुर्म से लेना है उसे और मज़ा किया दीवार क़फ़स की हो कि घर की मुझे क्या फ़र्क़ तफ़रीह के सामाँ हों मुयस्सर तो सज़ा क्या ऐसा तो कभी रक़्स में बे-ख़ुद न हवा मैं मय-ख़ाने के माहौल में होता है नशा क्या ये धूप की तेज़ी ये सराबों की सजावट सहरा ने जुनूँ को मिरे पहचान लिया क्या — Shariq Kaifi
गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है — Shariq Kaifi
कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है उस ने भी अब गहरी गहरी साँसें लेना सीख लिया है पीछे हटना तो चाहा था पर ऐसे भी नहीं चाहा था अपनी तरफ़ बढ़ने के लिए भी उस की तरफ़ चलना पड़ता है जब तक हो और जैसे भी हो दूर रहो उस की नज़रों से इतना पुराना है कि ये रिश्ता फिर से नया भी हो सकता है जैसे सब तूफ़ान मिरी साँसों से बंधे हों मुझ में छुपे हों दिल में किसी डर के आते ही ज़ोर हवा का बढ़ जाता है मैं तो फ़सुर्दा हूँ ही लेकिन अश्क रक़ीब की आँख में भी हैं एक महाज़ पे हारे हैं हम ये रिश्ता क्या कम रिश्ता है रंग में हैं सारे घर वाले खनक रहे हैं चाय के प्याले दुनिया जाग चुकी है लेकिन अपना सवेरा नहीं हुआ है — Shariq Kaifi
हाथ आता तो नहीं कुछ प तक़ाज़ा कर आएँ और इक बार गली का तिरी फेरा कर आएँ नींद के वास्ते वैसे भी ज़रूरी है थकन प्यास भड़काएँ किसी साए का पीछा कर आएँ लुत्फ़ देती है मसीहाई पर इतना भी नहीं जोश में अपने ही बीमार को अच्छा कर आएँ लोग महफ़िल में बुलाते हुए कतराते थे अब नहीं धड़का ये ख़ुद से कि कहाँ क्या कर आएँ काश मिल जाए कहीं फिर वही आईना-सिफ़त नक़्श बे-रब्त बहुत हैं इन्हें चेहरा कर आएँ कितनी आसानी से हम उस को भुला सकते हैं बस किसी तरह उसे दूसरों जैसा कर आएँ ये भी मुमकिन है कि हम हार से बचने के लिए अपने दुश्मन के किसी वार में हिस्सा कर आएँ बात माज़ी को अलग रख के भी हो सकती है अब जो हालात हैं उन पर कभी चर्चा कर आएँ ये बता कर कि ये रौनक़ तो ज़रा देर की है साहिब-ए-बज़्म के हैजान को ठंडा कर आएँ क्या वजूद उस का अगर कोई तवज्जोह ही न दे हम कि जब चाहें उसे भीड़ का हिस्सा कर आएँ — Shariq Kaifi