Munawwar Rana

Munawwar Rana

@munawwar-rana

Lucknow· India

Munawwar Rana shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Munawwar Rana's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है — Munawwar Rana
तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको तमाम खेल मुहब्बत में इंतिज़ार का है — Munawwar Rana
मैं ने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया — Munawwar Rana
बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर माँ सब से कह रही है कि बेटा मज़े में है — Munawwar Rana
कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है — Munawwar Rana
मोहब्बत एक पाकीज़ा अमल है इस लिए शायद सिमट कर शर्म सारी एक बोसे में चली आई — Munawwar Rana
किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा — Munawwar Rana
चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है — Munawwar Rana
इतनी तवक़्क़ुआत ज़माने को हम सेे है उतनी तो उम्र भी नहीं लाए लिखा के हम — Munawwar Rana
जहाँ से जी न लगे तुम वहीं बिछड़ जाना मगर ख़ुदा के लिए बे-वफ़ाई न करना — Munawwar Rana
मैं इसी मिट्टी से उट्ठा था बगूले की तरह और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई — Munawwar Rana
वो चाहे मजनूँ हो, फ़रहाद हो कि राँझा हो हर एक शख़्स मेरा हम सबक़ निकलता है — Munawwar Rana
ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है — Munawwar Rana
तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी — Munawwar Rana
जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है — Munawwar Rana
हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है — Munawwar Rana
ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा — Munawwar Rana
सगी बहनों का जो रिश्ता रिश्ता है उर्दू और हिन्दी में कहीं दुनिया की दो ज़िंदा ज़बानों में नहीं मिलता — Munawwar Rana
अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है — Munawwar Rana
लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है — Munawwar Rana

Ghazal

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं हमारे जिस्म के अंदर की झील सूख गई इसी लिए तो अब आँसू भी कम निकलते हैं ये कर्बला की ज़मीं है इसे सलाम करो यहाँ ज़मीन से पत्थर भी नम निकलते हैं यही है ज़िद तो हथेली पे अपनी जान लिए अमीर-ए-शहरस कह दो कि हम निकलते हैं कहाँ हर एक को मिलते हैं चाहने वाले नसीब वालों के गेसू में ख़म निकलते हैं जहाँ से हम को गुज़रने में शर्म आती है उसी गली से कई मोहतरम निकलते हैं तुम्हीं बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम निकलते हैं तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं — Munawwar Rana
पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है ज़ंजीर की सूरत मुझे घर बाँधे हुए है हर चेहरे में आता है नज़र एक ही चेहरा लगता है कोई मेरी नज़र बाँधे हुए है बिछड़ेंगे तो मर जाएँगे हम दोनों बिछड़ कर इक डोर में हम को यही डर बाँधे हुए है परवाज़ की ताक़त भी नहीं बाक़ी है लेकिन सय्याद अभी तक मिरे पर बाँधे हुए है हम हैं कि कभी ज़ब्त का दामन नहीं छोड़ा दिल है कि धड़कने पे कमर बाँधे हुए है आँखें तो उसे घर से निकलने नहीं देतीं आँसू है कि सामान-ए-सफ़र बाँधे हुए है फेंकी न 'मुनव्वर' ने बुज़ुर्गों की निशानी दस्तार पुरानी है मगर बाँधे हुए है — Munawwar Rana
मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ — Munawwar Rana
अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई — Munawwar Rana
किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ — Munawwar Rana
ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं ख़ुश्बू का ये झोंका अभी आया है उधर से किस ने कहा सहरा में अज़ानें नहीं होतीं क्या मरते हुए लोग ये इंसान नहीं हैं क्या हँसते हुए फूलों में जानें नहीं होतीं अब कोई ग़ज़ल-चेहरा दिखाई नहीं देता अब शहर में अबरू की कमानें नहीं होतीं इन पर किसी मौसम का असर क्यूँँ नहीं होता रद्द क्यूँँ तिरी यादों की उड़ानें नहीं होतीं ये शे'र है छुप कर कभी हमला नहीं करता मैदानी इलाक़ों में मचानें नहीं होतीं कुछ बात थी जो लब नहीं खुलते थे हमारे तुम समझे थे गूँगों के ज़बानें नहीं होतीं — Munawwar Rana
ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा — Munawwar Rana
काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले इक ज़रा देर को कमरे में अँधेरा कर ले अब मुझे पार उतर जाने दे ऐसा कर ले वर्ना जो आए समझ में तिरी दरिया कर ले ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता दे देगा ये तूफ़ान मुझे तुझ को पाने का अगर दिल ये इरादा कर ले आज का काम तुझे आज ही करना होगा कल जो करना है तो फिर आज तक़ाज़ा कर ले अब बड़े लोगों से अच्छाई की उम्मीद न कर कैसे मुमकिन है करैला कोई मीठा कर ले गर कभी रोना ही पड़ जाए तो इतना रोना आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले मुद्दतों बा'द वो आएगा हमारे घर में फिर से ऐ दिल किसी उम्मीद को ज़िंदा कर ले हम-सफ़र लैला भी होगी मैं तभी जाऊँगा मुझ पे जितने भी सितम करने हों सहरा कर ले — Munawwar Rana