Ahmad Faraz

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Ahmad Faraz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Faraz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे — Ahmad Faraz
जाने किस हाल में हम हैं कि हमें देख के लोग एक पल के लिए रुकते हैं गुज़र जाते हैं — Ahmad Faraz
आवाज़ दे के छुप गई हर बार ज़िंदगी हम ऐसे सादा-दिल थे कि हर बार आ गए — Ahmad Faraz
उस ने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे मैं ने तो उस के पाँव में सारा कलाम रख दिया — Ahmad Faraz
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें — Ahmad Faraz
मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है — Ahmad Faraz
कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है — Ahmad Faraz
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ — Ahmad Faraz
मुझे कहता है झूठी हैं तेरी बेकार सी बातें फ़राज़ मगर लगता है वो मेरी उन्हीं बातों पे मरता है — Ahmad Faraz
वो जिस घमंड से बिछड़ा गिला तो इस का है कि सारी बात मोहब्बत में रख-रखाव की थी — Ahmad Faraz
हम तेरे शौक़ में यूँँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं जैसे बच्चे किसी त्यौहार में गुम हो जाएँ — Ahmad Faraz
हम दोहरी अज़िय्यत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर पाँव भी हैं शल शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता — Ahmad Faraz
तू अपनी शीशागरी का हुनर न कर ज़ाया' मैं आइना हूँ मुझे टूटने की आदत है — Ahmad Faraz
उसे 'फ़राज़' अगर दुख न था बिछड़ने का तो क्यूँँ वो दूर तलक देखता रहा मुझ को — Ahmad Faraz
दिल को तेरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता — Ahmad Faraz
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँँ नहीं देते — Ahmad Faraz
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं — Ahmad Faraz
हम तिरे शौक़ में यूँँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं जैसे बच्चे किसी त्यौहार में गुम हो जाएँ — Ahmad Faraz
न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं — Ahmad Faraz
माना के मोहब्बत का छुपाना है मोहब्बत चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ — Ahmad Faraz

Ghazal

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं बे-दर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ बदला न मेरे बा'द भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ — Ahmad Faraz
बरसों के बा'द देखा इक शख़्स दिलरुबा सा अब ज़ेहन में नहीं है पर नाम था भला सा अबरू खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा अल्फ़ाज़ थे कि जुगनू आवाज़ के सफ़र में बन जाए जंगलों में जिस तरह रास्ता सा ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की नींदों में खुल गया हो जैसे कि रतजगा सा पहले भी लोग आए कितने ही ज़िंदगी में वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा कुछ ये कि मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोए कुछ ज़हर में खुला था अहबाब का दिलासा फिर यूँँ हुआ कि सावन आँखों में आ बसे थे फिर यूँँ हुआ कि जैसे दिल भी था आबला सा अब सच कहें तो यारों हम को ख़बर नहीं थी बन जाएगा क़यामत इक वाक़िआ' ज़रा सा तेवर थे बे-रुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा हम दश्त थे कि दरिया हम ज़हर थे कि अमृत ना-हक़ था ज़ोम हम को जब वो नहीं था प्यासा हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तिफ़ाक़न अपना भी हाल है अब लोगों फ़राज़ का सा — Ahmad Faraz
इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की आज पहली बार उस से मैं ने बे-वफ़ाई की वर्ना अब तलक यूँँ था ख़्वाहिशों की बारिश में या तो टूट कर रोया या ग़ज़ल-सराई की तज दिया था कल जिन को हम ने तेरी चाहत में आज उन से मजबूरन ताज़ा आशनाई की हो चला था जब मुझ को इख़्तिलाफ़ अपने से तू ने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हम-नवाई की तर्क कर चुके क़ासिद कू-ए-ना-मुरादाँ को कौन अब ख़बर लावे शहर-ए-आश्नाई की तंज़ ओ ता'ना ओ तोहमत सब हुनर हैं नासेह के आप से कोई पूछे हम ने क्या बुराई की फिर क़फ़स में शोर उट्ठा क़ैदियों का और सय्याद देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की दुख हुआ जब उस दर पर कल 'फ़राज़' को देखा लाख ऐब थे उस में ख़ू न थी गदाई की — Ahmad Faraz
वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम बात भी करते नहीं ग़म-ख़्वार के साथ हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ 'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ लोग में'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़' सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ — Ahmad Faraz
अजब जुनून-ए-मसाफ़त में घर से निकला था ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है यही धुआँ मिरे दीवार-ओ-दर से निकला था मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया कि दिल का ज़हर मिरी चश्म-ए-तर से निकला था ये अब जो सर हैं ख़मीदा कुलाह की ख़ातिर ये ऐब भी तो हम अहल-ए-हुनर से निकला था वो क़ैस अब जिसे मजनूँ पुकारते हैं 'फ़राज़' तेरी तरह कोई दीवाना घर से निकला था — Ahmad Faraz
हम तो ख़ुश थे कि चलो दिल का जुनूँ कुछ कम है अब जो आराम बहुत है तो सुकूँ कुछ कम है रंग-ए-गिर्या ने दिखाई नहीं अगली सी बहार अब के लगता है कि आमेज़िश-ए-ख़ूँ कुछ कम है अब तेरा हिज्र मुसलसल है तो ये भेद खुला ग़म-ए-दिल से ग़म-ए-दुनिया का फ़ुसूँ कुछ कम है उस ने दुख सारे ज़माने का मुझे बख़्श दिया फिर भी लालच का तक़ाज़ा है कहूँ कुछ कम है राह-ए-दुनिया से नहीं दिल की गुज़रगाह से आ फ़ासला गरचे ज़ियादा है प यूँँ कुछ कम है तू ने देखा ही नहीं मुझ को भले वक़्तों में ये ख़राबी कि मैं जिस हाल में हूँ कुछ कम है आग ही आग मेरे क़र्या-ए-तन में है 'फ़राज़' फिर भी लगता है अभी सोज़-ए-दरूँ कुछ कम है — Ahmad Faraz
हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता कौन दरिया को उलटता कौन गौहर देखता वो तो दुनिया को मिरी दीवानगी ख़ुश आ गई तेरे हाथों में वगर्ना पहला पत्थर देखता आँख में आँसू जड़े थे पर सदा तुझ को न दी इस तवक़्क़ो पर कि शायद तू पलट कर देखता मेरी क़िस्मत की लकीरें मेरे हाथों में न थीं तेरे माथे पर कोई मेरा मुक़द्दर देखता ज़िंदगी फैली हुई थी शाम-ए-हिज्राँ की तरह किस को इतना हौसला था कौन जी कर देखता डूबने वाला था और साहिल पे चेहरों का हुजूम पल की मोहलत थी मैं किस को आँख भर कर देखता तू भी दिल को एक ख़ूँ की बूँद समझा है 'फ़राज़' आँख अगर होती तो क़तरे में समुंदर देखता — Ahmad Faraz
किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम — Ahmad Faraz
न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो किसे बज़्म-ए-शौक़ में लाएँ हम दिल-ए-बे-क़रार कोई तो हो किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए'तिबार कोई तो हो कहीं तार-ए-दामन-ए-गुल मिले तो ये मान लें कि चमन खिले कि निशान फ़स्ल-ए-बहार का सर-ए-शाख़-सार कोई तो हो ये उदास उदास से बाम ओ दर ये उजाड़ उजाड़ सी रह-गुज़र चलो हम नहीं न सही मगर सर-ए-कू-ए-यार कोई तो हो ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो सर-ए-मक़्तल-ए-शब-ए-आरज़ू रहे कुछ तो इश्क़ की आबरू जो नहीं अदू तो 'फ़राज़' तू कि नसीब-ए-दार कोई तो हो — Ahmad Faraz
उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँँ है यूँँ तो कहने को सभी कहते हैं यूँँ है यूँँ है जैसे कोई दर-ए-दिल पर हो सितादा कब से एक साया न दरूँ है न बरूँ है यूँँ है तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँँ है तुम मोहब्बत में कहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ ले आए इश्क़ का नाम ख़िरद है न जुनूँ है यूँँ है अब तुम आए हो मिरी जान तमाशा करने अब तो दरिया में तलातुम न सुकूँ है यूँँ है नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है रोज़ आ जाता है समझाता है यूँँ है यूँँ है शाइ'री ताज़ा ज़मानों की है में'मार 'फ़राज़' ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँँ है — Ahmad Faraz
मुंतज़िर कब से तहय्युर है तिरी तक़रीर का बात कर तुझ पर गुमाँ होने लगा तस्वीर का रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गई ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ता'बीर का कैसे पाया था तुझे फिर किस तरह खोया तुझे मुझ सा मुंकिर भी तो क़ाएल हो गया तक़दीर का जिस तरह बादल का साया प्यास भड़काता रहे मैं ने ये आलम भी देखा है तिरी तस्वीर का जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर आज तक हर नक़्श फ़रियादी मिरी तहरीर का इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग जू-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है 'फ़राज़' सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का — Ahmad Faraz
ख़ामोश हो क्यूँँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँँ नहीं देते बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँँ नहीं देते वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँँ नहीं देते इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँँ नहीं देते मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँँ नहीं देते क्या बीत गई अब के 'फ़राज़' अहल-ए-चमन पर यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँँ नहीं देते — Ahmad Faraz

Nazm

"दोस्ती का हाथ" गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं तुम्हारे बाम की शमएँ भी ताबनाक नहीं मिरे फ़लक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं तुम्हारे आइना-ख़ाने भी ज़ंग-आलूदा मिरे सुराही ओ साग़र भी गर्द गर्द से हैं न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँ न मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या है बसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों को समझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती है न क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आई न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब न शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारी हमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैं तुम्हें भी ज़ोम महा-भारता लड़ी तुम ने हमें भी फ़ख़्र कि हम कर्बला के आदी हैं सितम तो ये है कि दोनों के मर्ग़-ज़ारों से हवा-ए-फ़ित्ना ओ बू-ए-फ़साद आती है अलम तो ये है कि दोनों को वहम है कि बहार अदू के ख़ूँ में नहाने के बा'द आती है तो अब ये हाल हुआ इस दरिंदगी के सबब तुम्हारे पाँव सलामत रहे न हाथ मिरे न जीत जीत तुम्हारी न हार हार मिरी न कोई साथ तुम्हारे न कोई साथ मिरे हमारे शहरों की मजबूर ओ बे-नवा मख़्लूक़ दबी हुई है दुखों के हज़ार ढेरों में अब उन की तीरा-नसीबी चराग़ चाहती है जो लोग निस्फ़ सदी तक रहे अँधेरों में चराग़ जिन से मोहब्बत की रौशनी फैले चराग़ जिन से दिलों के दयार रौशन हों चराग़ जिन से ज़िया अम्न-ओ-आश्ती की मिले चराग़ जिन से दिए बे-शुमार रौशन हूँ तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तो अब के न साज़-ओ-नग़्मा की महफ़िल न शाइ'री के लिए अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए — Ahmad Faraz
"हिच-हाईकर" मैं कि दो रोज़ का मेहमान तिरे शहर में था अब चला हूँ तो कोई फ़ैसला कर भी न सका ज़िंदगी की ये घड़ी टूटता पुल हो जैसे कि ठहर भी न सकूँ और गुज़र भी न सकूँ मेहरबाँ हैं तिरी आँखें मगर ऐ मूनिस-ए-जाँ इन से हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो नहीं भर सकता ऐसी बे-नाम मसाफ़त हो तो मंज़िल कैसी कोई बस्ती हो बसेरा ही नहीं कर सकता एक मुद्दत हुई लैला-ए-वतन से बिछड़े अब भी रिसते हैं मगर ज़ख़्म पुराने मेरे जब से सरसर मिरे गुलशन में चली है तब से बर्ग-ए-आवारा की मानिंद ठिकाने मेरे आज इस शहर कल उस शहर का रस्ता लेना हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है ये सफ़र इतना मुसलसल है कि थक हार के भी बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है तू भी ऐसा ही दिल-आराम शजर है जिस ने मुझ को इस दश्त-ए-क़यामत से बचाए रखा एक आशुफ़्ता-सर ओ आबला-पा की ख़ातिर कभी ज़ुल्फ़ों कभी पलकों को बिछाए रखा दुख तो हर वक़्त तआक़ुब में रहा करते हैं यूँँ पनाहों में कहाँ तक कोई रह सकता है कब तलक रेत की दीवार सँभाले कोई वो थकन है कि मेरा जिस्म भी ढह सकता है अजनबी लोग नए लोग पराई गलियाँ ज़िंदगी ऐसे क़राइन में कटेगी कैसे तेरी चाहत भी मुक़द्दस तेरी क़ुर्बत भी बहिश्त देस प्रदेश की तफ़रीक़ घटेगी कैसे ना-गुज़ीर आज हुआ जैसे बिछड़ना अपना कल किसी रोज़ मुलाक़ात भी इम्कान में है मैं ये पैराहन-ए-जाँ कैसे बदल सकता हूँ कि तिरा हाथ मेरे दिल के गरेबान में है — Ahmad Faraz
"मुझ सेे पहले" मुझ सेे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा खो चुका है जो किसी और की रा'नाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़ मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ — Ahmad Faraz
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी — Ahmad Faraz