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Ahmad Faraz

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बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ।

आधुनिक उर्दू के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में गिने जाने वाले अहमद फ़राज़ का जन्म पाकिस्तान के नौशेरा शहर के कोहाट में 12 जनवरी 1931 को हुआ था। इनके बचपन का नाम सैयद अहमद शाह था। इनके पिता का नाम सैयद मुहम्मद शाह बार्क तथा भाई का नाम सैयद मसूद कौसर था। जन्म के कुछ समय बाद ही वो अपने परिवार के साथ पेशावर चले गए। उन्होंने मात्र 8 साल की उम्र मैं ही पहला शेर कह दिया था:

सबके वास्ते लाए हैं कपड़े सेल से।
लाए हैं मेरे लिए कैदी का कम्बल जेल से।

उन्होंने पेशावर यूनिवर्सिटी से फ़ारसी और उर्दू की पढ़ाई की और बाद में वहीं लेक्चरर लग गए। जब सैनिक हाकिमों ने उनको सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर गरिफ़्तार किया, तो वह छह साल देश के बाहर रहे। अहमद फ़राज़ ने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की और फिर अध्यापन से भी जुड़े। उनकी प्रसिद्धि के साथ-साथ उनके पद में भी वृद्धि होती रही। वे 1976 में पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स के डायरेक्टर जनरल और फिर उसी एकेडमी के चेयरमैन भी बने। 2004 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ पुरस्कार से अलंकृत किया। लेकिन 2006 में उन्होंने यह पुरस्कार इसलिए वापस कर दिया कि वे सरकार की नीति से सहमत और संतुष्ट नहीं थे।

अहमद ‘फ़राज़’ ग़ज़ल के ऐसे शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को जनता में लोकप्रिय बनाने का क़ाबिले-तारीफ़ काम किया।
उनकी शायरी से एक रुहानी, एक आधुनिक और एक बाग़ी शायर की तस्वीर बनती है। उन्होंने इश्क़, मुहब्बत और महबूब से जुड़े हुए ऐसे बारीक़ एहसास और भावनावों को शायरी की ज़ुबान दी है जो उससे पहले तक अनछुए थे।फ़राज़ के यहाँ महबूबा और जमाने के ग़म एक साथ उभरते हैं बल्कि कहीं-कहीं तो वह अपने निजी ग़म को भी सार्वजनिक बना देते हैं यही उनका कमाल है:

कुछ इस तरह से गुजरी जिंदगी के जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंजिल
कोई हमारा तरह उम्र भर सफर में रहा

हिन्द-पाक के मुशायरों में जितनी मुहब्बत और दिलचस्पी के साथ फ़राज़ को सुना गया है उतना शायद ही किसी और शायर को सुना गया हो। अगर ये कहा जाए तो गलत न होगा कि इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फ़िराक का नाम आता है जिन्हें शोहरत की बुलन्दियाँ नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया। और इस बात का एहसास खुद अहमद फ़राज़ को भी था:

और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया।

फ़राज़ की कई ग़ज़लों को जाने माने गायकों ने अपनी आवाज़ दी उनमें से सबसे ज़्यादा मशहूर हुई, मेहंदी हसन साहब कि आवाज़ में ग़ज़ल:

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।

अहमद फ़राज़ की मृत्यु 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद में एक निजी अस्पताल में किडनी की विफलता के कारण हुई।
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