ye aisa qarz hai jo main ada kar hi nahin saka | ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता

  - Munawwar Rana

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है

  - Munawwar Rana

Jalwa Shayari

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    नज़र न आए मुझे हुस्न के सिवा कुछ भी
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    गिले शिकवे ज़रूरी हैं अगर सच्ची मुहब्बत है
    जहाँ पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है
    Munawwar Rana
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    डरा-धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
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    Munawwar Rana
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    जुदा रहता हूँ मैं तुझ से तो दिल बे-ताब रहता है
    चमन से दूर रह के फूल कब शादाब रहता है

    अँधेरे और उजाले की कहानी सिर्फ़ इतनी है
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    मुक़द्दर में लिखा कर लाए हैं हम बोरिया लेकिन
    तसव्वुर में हमेशा रेशम-ओ-कम-ख़्वाब रहता है

    हज़ारों बस्तियाँ आ जाएँगी तूफ़ान की ज़द में
    मिरी आँखों में अब आँसू नहीं सैलाब रहता है

    भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे
    कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है

    ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए
    ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है

    हमारी हर परेशानी इन्ही लोगों के दम से है
    हमारे साथ ये जो हल्क़ा-ए-अहबाब रहता है

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    दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है
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    Munawwar Rana
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    मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे

    मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत
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    एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया
    इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे

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    कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे

    मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है
    मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे
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    Munawwar Rana
    अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
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    Munawwar Rana
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