Neeraj Neer

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Neeraj Neer shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Neeraj Neer's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ठीक है मैं फेर लेता हूँ नज़र को तुम भी झुमके से कहो गर्दन न चू में नीरज नीर — Neeraj Neer
ज़ोर चलता है औरत पे सो मर्द ख़ुश बीवी पे ख़त्म मर्दानगी की समझ — Neeraj Neer
ये करिश्मा हुआ चूमने से उसे तीरगी पर खुली रौशनी की समझ — Neeraj Neer
यूँँ कहें नुमाइशों के दिन क़रीब आ गए महज़ फ़रवरी हो किस तरह महीना इश्क़ का — Neeraj Neer
तिरे होने का वहम ज़िंदा है मुझ में मुझे लगता है दुनिया मेरी तरफ़ है — Neeraj Neer
वो जो मिल कर भी मिल नहीं पाती रेल की पटरियाँ थे हम दोनों — Neeraj Neer
ज़िन्दगी का ज़ाएका अब हम से पूछो उस के लब चू में हैं सो मीठा लगेगा — Neeraj Neer
सर्द रात है हवा भी सोच मत पहन मुझे सुब्ह देख लेंगे किस कलर की शाल लेनी है — Neeraj Neer
अब नमक कैसे नमक होगा मिरी जाँ होंठ से लग कर तिरे शक्कर बना है — Neeraj Neer
आज फिर बेटे को माँ जाहिल लगी है सोचिए क्या सीखा हम ने डिग्रियों से — Neeraj Neer
आइने में देख सकती हो अभी रंग मेरा तुम पे अच्छा लग रहा — Neeraj Neer
जाँ हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं देखो शे'र मुकम्मल अच्छा लगता है — Neeraj Neer
मैं भी शामिल लूटने वालों में था मुझ को भी बस तन मिला है मन नहीं — Neeraj Neer
मसअला फिर वही बे-घर हुए लोगों का है हम सभी दिल से निकाले कहाँ तक जाएँगे — Neeraj Neer
जिस्म के पार जाना पड़ा था कभी इश्क़ कर के हुई बंदगी की समझ — Neeraj Neer
पेड़ को काटने वाले क्या जाने दुख हम गले लग नहीं सकते दीवार से — Neeraj Neer
खेल ही तो है जहाँ मैं उस का हूँ ज़िन्दगी ये ट्वीट बदलेगी कभी — Neeraj Neer
काश मैं पूछूँ कभी मीठे में क्या है वो बिना सोचे कहे लो होंठ मेरे — Neeraj Neer

Ghazal

ज़ेहन को क़ब्ज़े में कर उलझन न चू में इश्क़ या'नी तिफ़्ल सा दामन न चू में वस्ल का मतलब नहीं बस चूमना है आग से कह दो अभी ईंधन न चू में जिस्म वालों को हिदायत है मगर फिर भूल कर भी वो मिरा ये मन न चू में सोचता हूँ क्या करेगी हिज्र में वो याद आने पर कहीं दर्पन न चू में ठीक है मैं फेर लेता हूँ नज़र को तुम भी झुमके से कहो गर्दन न चू में हो सके तो जान रोको घुँघरू को रक़्स करते पाँव की छन-छन न चू में मैं तो उस का नाम लिखकर चूमता हूँ बाँवली वो हाथ के कंगन न चू में चूमने की रस्म बाकी है अभी भी डर है पहले देह को उबटन न चू में दिल निशाने पर रखा इस बार उस ने कैसे कह दूँ तीर को धड़कन न चू में 'नीर' ख़्वाहिश है मिरी ज़िंदा लगूँ मैं मारे वहशत के फ़कत बस तन न चू में — Neeraj Neer
जाँ से प्यारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे मुझ को मारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे सामने बैठा है जो वो 'नीर' कोई और है वो तुम्हारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे आप बेहद ख़ूब-सूरत हैं मगर समझें ज़रा दिल सँवारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे उन पे लानत है जिन्होंने लाश पर नज़्में कहीं सर उतारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे और शकुनी के जहाँ में ज़िन्दगी बस इक जुआ दाँव हारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे इस का मतलब है कि हम दिल से निकाले जा चुके घर बुहारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे 'नीर' कपड़ो का उतरना लाज़िमी है कोठे पर मन उतारा जा चुका है तालियाँ बजती रहे — Neeraj Neer
ज़ेहन को क़ब्ज़े में कर उलझन न चू में इश्क़ या'नी तिफ़्ल सा दामन न चू में *तिफ़्ल- बच्चा वस्ल का मतलब नहीं बस चूमना है आग से कह दो अभी ईंधन न चू में जिस्म वालों को हिदायत है मगर फिर भूल कर भी वो मिरा ये मन न चू में सोचता हूँ क्या करेगी हिज्र में वो याद आने पर कहीं दर्पन न चू में ठीक है मैं फेर लेता हूँ नज़र को तुम भी झुमके से कहो गर्दन न चू में हो सके तो जान रोको घुँघरू को रक़्स करते पाँव की छन-छन न चू में मैं तो उस का नाम लिखकर चूमता हूँ बाँवली वो हाथ के कंगन न चू में चूमने की रस्म बाकी है अभी भी डर है पहले देह को उबटन न चू में दिल निशाने पर रखा इस बार उस ने कैसे कह दूँ तीर को धड़कन न चू में 'नीर' ख़्वाहिश है मिरी ज़िंदा लगूँ मैं मारे वहशत के फ़कत बस तन न चू में -नीरज नीर — Neeraj Neer
अजी यक़ीं मानिए था पहले पर आज कुछ भी नहीं, कहीं भी कि इस जहाँ में तिरी कमी का इलाज कुछ भी नहीं, कहीं भी सितम कि दुख मेरा लिखने से भी गया नहीं सो मैं चीखता हूँ हरी भरी फ़स्ल है प इस में अनाज कुछ भी नहीं, कहीं भी मलाल है मैं ने उस को ये हक़ दिया था दिल तोड़े, दिल दुखाए बिछड़ने वालों बिछड़ने का अब रिवाज कुछ भी नहीं, कहीं भी अगर वो कहती तुम्हारी हूँ मैं, मैं जंग दुनिया से जीत जाता सुना है दो लोग पास हो जब समाज कुछ भी नहीं, कहीं भी उजाले आँखों के ख़त्म या'नी, है तीरगी के गिरफ़्त में हम पर' कौन समझे अगर नहीं तू सिराज कुछ भी नहीं,कहीं भी कमाल देखें कि धड़कनों को पता है बस एक नाम तेरा ऐ 'नीर' क्या सच में दूजा और' कोई साज़ कुछ भी नहीं, कहीं भी — Neeraj Neer