Saahir

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@Rohit_vs_saahir2

Saahir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saahir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

और तो कुछ कर नहीं सकते तुम्हारी याद आने पर, साथ की तस्वीरें हैं कुछ बस उन्हीं को देख लेते हैं — Saahir
छू नहीं सकते हैं शहज़ादी को हम जैसे कभी इस लिए हम जैसे करते हैं गुज़ारा, देख कर — Saahir
पैदा हुए हैं बस, हम जैसे ख़ाली लोग और किया क्या है इस मिट्टी के ख़ातिर — Saahir
मैं अलकनन्दा सा होता और वो मंदाकनी सी फिर कहीं पर साथ मिलते और गंगा होते जाते — Saahir
तेज़ गिरती धूप देखी तब खुला मुझ पे सिर्फ़ बारिश ही नहीं हैं आसमाँ का दुख — Saahir
मैं तुम्हारा फ़ाएदा लूँगा निकल जाऊँगा दोस्त आदमी हूँ और ये ही आदमी की जात है — Saahir
इश्क़ में नाकाम हो कर शा'इरी करती रही और ग़म उदासी की दुकाँ बनती गईं नस्लें हमारी — Saahir
कौन सा दर्जा मिलेगा दोस्त मुझ को तुम बताओ तो मैं न तेरी आख़िरी थी और न ही पहली मुहब्बत हूँ — Saahir
काट लेते हैं उँगली तअज्जुब से दाँतों तले हम जब नई कलियों को फूल बनते हुए देखते हैं — Saahir
जैसे बादल किए जाते हैं चाँद के संग अठखेलियाँ उस सरकते हुए पल्लू में वो यूँँ चेहरा छिपाती रही — Saahir
हम तेरी ख़ामोशी के सताए हुए तू कहे कुछ तो हम को भी आराम हो — Saahir
कोई है ही नहीं मेरे जैसा बात गर बे-वफ़ाई पे आए — Saahir
घर में दोनों का सब कुछ आधा आधा था एक था कुछ तो वो बाहर का दरवाज़ा था — Saahir
ये समझ में आ गया बेरोज़गारी के दिनों में पैसा है अपनी जगह और दोस्ती अपनी जगह पर — Saahir
माएँ देख कर मैं कह सकता हूँ ये दावे से झूठ है कि घर को औरत ख़राब करती है — Saahir
कच्चा सा घर और उस पर जोरों की बरसात है ये तो कोई ख़ानदानी दुश्मनी की बात है — Saahir
उस की अच्छी बुरी आदतें सारी मालूम हैं मुझ को साहिर चाँदनी संग मैं दाग़ भी मेरे महताब में देखता हूँ — Saahir
हमीं ने दिल को पत्थर बोला है साहिर हमीं ने पत्थरों पर दिल बनाया है — Saahir

Ghazal

आशिक़ी में जीत जाने का सहारा भी हो सकता है उस की आँखों की नमी कोई दिखावा भी हो सकता है उस की ख़्वाहिश पूरी करने को सितारों टूट जाओ अब आसमानों में चमकना तो दुबारा भी हो सकता है या'नी सब कुछ तुमपे निर्भर है कि तुम कैसे हो उस के साथ उस का लहजा पल में ही मीठे से ख़ारा भी हो सकता है मुझ को उस का तो पता है उस को मैं ही सब सेे प्यारा हूँ, मेरा क्या है मुझ को कोई और प्यारा भी हो सकता है। छोड़ने का फ़ैसला क्यूँँ कर लिया तुम ने अकेले ही, दोस्त ऐसे फ़ैसलों में इश्तिशारा भी हो सकता है। कर रहे हो आशिक़ी तुम फ़ायदे का सोच कर साहिर, दो मुँही तलवार है इस में ख़सारा भी हो सकता है। — Saahir
जो भी मिलती है हमें वो है सही अपनी जगह पर मौत है अपनी जगह तो, ज़िंदगी अपनी जगह पर पहले मैं भी सोचा करता था कि दोनों मुख़्तलिफ़ हैं आशिक़ी अपनी जगह पर, ख़ुद-कुशी अपनी जगह पर शा'इरी को धंधा मत समझो समझने वालों, मुझ को नौकरी अपनी जगह है, शा'इरी अपनी जगह पर उस की आँखें काम दो दो साथ में करती हैं, उस का देखना अपनी जगह पर, दिल-लगी अपनी जगह पर फ़र्क़ होता है क़ज़ा और ख़ुद-कुशी में, आँसू के साथ ख़ुद-कुशी ने सब को बदनामी भी दी अपनी जगह पर तुम मोहब्बत में मेरे पीछे न उतरो तो ही बेहतर मैं करा लेता हूँ कुछ नुक़सान भी अपनी जगह पर ध्यान रखना तुम कहाँ, क्या ठीक है बच्चे, जहाँ में बोलना अपनी जगह पर, ख़ामुशी अपनी जगह पर उलझे हैं हम लोग इक चक्कर में कितने जन्मों से यूँँ ज़िंदगी ये मौत से मिलती रही अपनी जगह पर मैं मोहब्बत से यूँँ भी दूरी बना कर रखता हूँ क्योंकि छोड़ती है दर्द काफ़ी ये ख़ुशी अपनी जगह पर सोचता हूँ मैं कभी क्या ठीक है ये जो है 'साहिर' औरतें अपनी जगह पर, आदमी अपनी जगह पर — Saahir
हम तुम्हारी जालसाज़ी पर नहीं रोए हम को रोना था सहेली पर नहीं रोए हम ने कंधा चाहा था उस ने हथेली दी एक ज़िद थी हम हथेली पर नहीं रोए एक पत्थर रह गया था मेरे सीने में आप की हर चीज टूटी पर नहीं रोए जो चुने है इश्क़ उन को इक हिदायत है कोई अपनी पाएमाली पर नहीं रोए मय पिलाने पर आ जाने थे मेरे आँसू दोस्त ने काफ़ी पिलाई पर नहीं रोए आग से कह पानी बनने की न सोचे वो जलने दे अब मोमबत्ती पर नहीं रोए मैं उसे ख़ुश देख कर रोऊँगा सो कल वो देख मुझ को मुस्कुराई पर नहीं रोए भूखे सोए पानी पी कर मुफ़लिसी काटी पर किसी की भी हवेली पर नहीं रोए तेरे रोने पर भी रोने वाले हम ने बा'द तेरे अपनी मौत देखी पर नहीं रोए — Saahir
मसअला होता है ये भी ख़ुद-कुशी का ख़त्म ग़म होता नहीं है हर किसी का धीरे धीरे इश्क़ चढ़ना तीसरी का है बताता जाना तय है दूसरी का रस्सियाँ हैं और पंखें भी हैं घर में है नहीं सामान पर ये ख़ुद-कुशी का नाम राधे श्याम लेती क्यूँ है दुनिया प्यार झूठा तो नहीं था रुक्मणी का दोस्त से जब मांगे पैसे मैं ने तब वो दे रहा था झांसा मुझ को मुफ़लिसी का लड़कियों को जानना भी सहल होता इश्क़ में होता अ गर डर उस छड़ी का सोचता हूँ बैठके दफ़्तर में हर दिन मैं कोई नौकर नहीं हूँ दफ़्तरी का नौकरी को गाली देता है वो लड़का हाँ वो जो मारा हुआ है नौकरी का मैं दवा तो ढूंढ लूँगा इश्क़ तेरी रास्ता मिल जाए पहले वापसी का तुम को कुछ मालूम है तो फिर बताओ कोई चारासाज़ है क्या दिल-लगी का आरज़ू है एक अनजाने शहर में हाथ पकड़े घूमूँ मैं इक अजनबी का ताज को तुम इश्क़ की मानो निशानी मानता हूँ जादू मैं कारीगरी का जो हसीना हम को हँसकर देखती है उस हसीना को पता है तिश्नगी का एक बेटा मंदिरों में बैठता है काम करता एक बेटा मौलवी का मुझ में से बदबू नहीं आएगी लेकिन काम करता हूँ मैं यारों गंदगी का — Saahir
मुझ को ही वक़्त जो देता था, था कभी इश्क़ में मैं भी था मुब्तिला, था कभी शे'र तस्वीरों से कहता था, था कभी एक चेहरे को शब भर लिखा, था कभी उस तरफ़ क्यूँ नहीं जाते हो आजकल वो तो घर जाने का रास्ता, था कभी यार जुगनू, मोहब्बत रहें तितलियाँ इश्क़ में एक ये क़ायदा, था कभी इश्क़ नुक़सान है कहने वाले बता इश्क़ नुक़सान या फ़ायदा, था कभी आँख में रहने वाले बता सकते थे आँख में घर किसी का बना था, कभी देख के ख़ुद को रोता हूँ मैं आजकल आइना मुझ को अच्छा लगा, था कभी क़ैस का सुनके ये सोचता हूँ मैं अब हाल वैसा मेरा क्या हुआ, था कभी पानी में तैरता है ये जो ख़ुद-ब-ख़ुद पानी में ज़िस्म ये डूबता, था कभी — Saahir
चुप कराता है संसार का दुख रोता हूँ जब मैं बेकार का दुख छत को सर पे उठा रक्खा है पर कौन पूछे है दीवार का दुख बा'द छह दिन के इतवार आना ढोना छह दिन है इतवार का दुख आइए बैठिए तब कहीं फिर पूछिये आप बीमार का दुख है असल में जुदाई का डर जो लग रहा है तुम्हें प्यार का दुख मियान में आँसू देखे लगा तब क़ैद है इस में तलवार का दुख फ़ायदे की जगह घाटा होना है नहीं ये ही व्यापार का दुख उभरा उभरा ये काग़ज़ बताए उतरा है इक क़लमकार का दुख इक तवायफ़ ने हँसकर के देखा छिप गया फिर से बाजार का दुख चाहता हूँ कि मैं रोऊँ तुझ में चाहिए मुझ को अब यार का दुख चुप करा के मुझे रोने वाली का निकल आया घरबार का दुख चुन सही शख़्स को वरना होगा उम्र भर एक इज़हार का दुख रूठ जाना मनाना नहीं बस ये नहीं होता तक़रार का दुख तुम को हाँ हो ख़ुदा करना ऐसा तुम नहीं जानो इनकार का दुख — Saahir
मोहब्बत का मआ'नी जब खुला आहिस्ता आहिस्ता कमी का मुझ को अंदाज़ा हुआ आहिस्ता आहिस्ता दिखाई देती है वो हर तरफ़ मुझ को मुसलसल तौर मुसलसल आती है उस की सदा आहिस्ता आहिस्ता इकठ्ठे रहते थे पहले पहल दुनिया में अहल-ए-बैत किया ज़र और ज़मीनों ने जुदा आहिस्ता आहिस्ता इसी डर खिड़कियों दरवाज़ों को खोला नहीं मैं ने कि मरने लगता है घर का दिया आहिस्ता आहिस्ता कि इक तो पूरी शब बाक़ी है ऊपर से तेरी आवाज़ सो तू अपनी कहानी को सुना आहिस्ता आहिस्ता कई दिल तोड़ने वाली भी मुझ सेे इश्क़ करती हैं वो मुझ सेे सीख जाती हैं वफ़ा आहिस्ता आहिस्ता ज़ियादा देर तक टिकता नहीं है झूठ पर कुछ भी यक़ीनन सच का लगता है पता आहिस्ता आहिस्ता रखें उनवान क्या कछुए से वाबस्ता कहानी का किसी ने ज़ोर से इतना कहा "आहिस्ता आहिस्ता" अज़िय्यत चाहिए मुझ को यही मेरी गुज़ारिश है गला जल्लादों मेरा काटना आहिस्ता आहिस्ता ज़रा देरी हुई लेकिन मिली मंज़िल उसे 'साहिर' मुसाफ़िर जो मुसलसल था चला आहिस्ता आहिस्ता — Saahir
ज़िंदगी काटी है उस ने मोजिज़े में ये मोहब्बत पड़ गई जिस के गले में कोई टकराई थी मुझ सेे रास्ते में मैं गिरा भी इश्क़ में तो हादसे में आओ बैठो बात करनी है मोहब्बत छोड़ कर क्यूँ जा रही हो रास्ते में दिल दुखा के भी वो ख़ुश है ऐ ख़ुदा क्या आ गई है खोट तेरे फ़ैसले में मैं जिसे मतलब बदन से है मुझे भी इश्क़ करते देख लोगे मशवरे में लड़की मुझ सेे इश्क़ मत करना कभी भी अच्छे घर की लगती हो तुम देखने में मर के मुफ़्लिस को कई लाखों मिले हैं और कितना अच्छा हो इक हादसे में लग रहा है डर अभी भी आदमी से उस को जो बेची गई थी छुटपने में एक औरत है मेरे घर में कि जिस की उम्र बीती सारी सब दिल जीतने में दूरियाँ मीलों की देखी मैं ने मौला गाँव में भी कुछ घरों के फ़ासले में है मिली जिस में सज़ा-ए-मौत साहिर मैं कभी था ही नहीं इस मसअले में — Saahir
बोझ जब से बढ़ गया है ज़िंदगी का सिलसिला थम सा गया है मयकशी का जो चुरा कर शा'इरी ख़ुद की हैं कहते वो बताएँ मुझ को मानी शा'इरी का देख कर तनख़्वाह मैं ये सोचता हूँ भाव कितना रह गया है आदमी का इश्क़ मुझ को रास आता ही नहीं पर मैं छिपाता हूँ हुनर आवारगी का हम असीरों को मोहब्बत तीरगी से हम नहीं चाहेंगे कमरा रौशनी का रोटियों की पूजा करता हूँ मैं तब से देखा है जब से वो मंज़र भुखमरी का देख कर मुझ को लगेगा तुम को ऐसा होता है कोई नशा भी बेबसी का डाइरी मेरी कई करती असर है ये उदासी इक असर है डाइरी का सादगी ने तेरी है जादू चलाया भाव रहता है ज़ियादा सादगी का काम आना है नहीं मतलब अगर तो फिर बताओ मुझ को मतलब दोस्ती का तेज़ भागा वस्ल में तो फिर हुआ यूँँ हिज्र में धीमे चला कांटा घड़ी का घाव भरते इश्क़ के देखे हैं मैं ने पर नहीं था जादू वो चारागरी का मुझ को सहरा मिल गया लैला को ढूँढों क़ैस बनना है मुझे भी इस सदी का काम मिलता है सभी को ज़िंदगी में काम मुझ को मिल चुका दीवानगी का आपने जो समझा है अपनी समझ से ज़ाविया ये तो नहीं था शा'इरी का वो तवायफ़ मान के क़ाबिल है 'साहिर' वो भला तो कर रही है ना किसी का — Saahir