Saahir
Saahir
Ghazal

ज़िंदगी काटी है उस ने मोजिज़े में

ये मोहब्बत पड़ गई जिस के गले में

कोई टकराई थी मुझ से रास्ते में
मैं गिरा भी इश्क़ में तो हादसे में

आओ बैठो बात करनी है मोहब्बत
छोड़ कर क्यूँ जा रही हो रास्ते में

दिल दुखा के भी वो ख़ुश है ऐ ख़ुदा क्या
आ गई है खोट तेरे फ़ैसले में

मैं जिसे मतलब बदन से है मुझे भी
इश्क़ करते देख लोगे मशवरे में

लड़की मुझ से इश्क़ मत करना कभी भी
अच्छे घर की लगती हो तुम देखने में

मर के मुफ़्लिस को कई लाखों मिले हैं
और कितना अच्छा हो इक हादसे में

लग रहा है डर अभी भी आदमी से
उस को जो बेची गई थी छुटपने में

एक औरत है मेरे घर में कि जिस की
उम्र बीती सारी सब दिल जीतने में

दूरियाँ मीलों की देखी मैं ने मौला
गाँव में भी कुछ घरों के फ़ासले में

है मिली जिस
में सज़ा-ए-मौत साहिर
मैं कभी था ही नहीं इस मसअले में

— Saahir

More by Saahir

Other ghazal from the same pen

See all from Saahir →

Kamar Shayari

Shers of kamar.

All Kamar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling