Ibn E Insha

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Ibn E Insha shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ibn E Insha's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत — Ibn E Insha
'मीर' से बैअत की है तो 'इंशा' मीर की बैअत भी है ज़रूर शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो — Ibn E Insha
वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए कौन अब इश्क़ के बाज़ार में खोलेगा दुकाँ — Ibn E Insha
दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा — Ibn E Insha
आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई लब पर उस के नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद हुआ — Ibn E Insha
इस शहर में किस से मिलें हम सेे तो छूटीं महफ़िलें हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा — Ibn E Insha
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए — Ibn E Insha
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले — Ibn E Insha
दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँँकर हो — Ibn E Insha
वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो — Ibn E Insha
उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या — Ibn E Insha
हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में — Ibn E Insha
एक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होती — Ibn E Insha
बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र-ओ-सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है — Ibn E Insha
कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो ऐ लोगों ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगों ख़ामोश रहो — Ibn E Insha
'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या — Ibn E Insha
गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं इस बग़िया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो — Ibn E Insha
हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले — Ibn E Insha
अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का — Ibn E Insha
हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती — Ibn E Insha

Ghazal

इस शहर के लोगों पे ख़त्म सही ख़ु-तलअ'ती-ओ-गुल-पैरहनी मिरे दिल की तो प्यास कभी न बुझी मिरे जी की तो बात कभी न बनी अभी कल ही की बात है जान-ए-जहाँ यहाँ फ़ील के फ़ील थे शोर-कुनाँ अब नारा-ए-इश्क़ न ज़र्ब-ए-फ़ुग़ाँ गए कौन नगर वो वफ़ा के धनी कोई और भी मोरिद-ए-लुत्फ़ हुआ मिली अहल-ए-हवस को हवस की सज़ा तिरे शहर में थे हमीं अहल-ए-वफ़ा मिली एक हमीं को जला-वतनी ये तो सच है कि हम तुझे पा न सके तिरी याद भी जी से भुला न सके तिरा दाग़ है दिल में चराग़-ए-सिफ़त तिरे नाम की ज़ेब-ए-गुलू-कफ़नी तुम सख़्ती-ए-राह का ग़म न करो हर दौर की राह में हम-सफ़रो जहाँ दश्त-ए-ख़िज़ाँ वहीं वादी-ए-गुल जहाँ धूप कड़ी वहाँ छाँव घनी इस इश्क़ के दर्द की कौन दवा मगर एक वज़ीफ़ा है एक दुआ पढ़ो 'मीर'-ओ-'कबीर' के बैत कबित सुनो शे'र-ए-'नज़ीर' फ़क़ीर-ओ-ग़नी — Ibn E Insha
और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का — Ibn E Insha
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ हम से अजब तिरा दर्द का नाता देख हमें मत भूल मियाँ अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तिरा उसूल मियाँ हम क्यूँँ छोड़ें उन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ यूँँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँँही तो नहीं जोग लिया बस्ती बस्ती काँटे देखे जंगल जंगल फूल मियाँ ये तो कहो कभी इश्क़ किया है जग में हुए हो रुस्वा भी? इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें बाक़ी बात फ़ुज़ूल मियाँ नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना दीदा ओ दिल को फ़र्श करें सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुज़ूल मियाँ सुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर एक ज़रा से क़िस्से को अब देते क्यूँँ हो तूल मियाँ खेलने दें उन्हें इश्क़ की बाज़ी खेलेंगे तो सीखेंगे 'क़ैस' की या 'फ़रहाद' की ख़ातिर खोलें क्या स्कूल मियाँ अब तो हमें मंज़ूर है ये भी शहर से निकलीं रुस्वा हूँ तुझ को देखा बातें कर लीं मेहनत हुई वसूल मियाँ 'इंशा' जी क्या उज़्र है तुम को नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ नज़्र करो रूप-नगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियाँ — Ibn E Insha
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए हम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में ख़ुश-अंजाम हुए नज्द में क़ैस यहाँ पर 'इंशा' ख़ार हुए नाकाम हुए किस का चमकता चेहरा लाएँ किस सूरज से माँगे धूप घूर अँधेरा छा जाता है ख़ल्वत-ए-दिल में शाम हुए एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए 'इंशा'-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए — Ibn E Insha
पीत करना तो हम से निभाना सजन हम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन तुम ही मजबूर हो हम ही मुख़्तार हैं ख़ैर माना सजन ये भी माना सजन अब जो होने के क़िस्से सभी हो चुके तुम हमें खो चुके हम तुम्हें खो चुके आगे दिल की न बातों में आना सजन कि ये दिल है सदा का दिवाना सजन ये भी सच है न कुछ बात जी की बनी सूनी रातों में देखा किए चाँदनी पर ये सौदा है हम को पुराना सजन और जीने का अपने बहाना सजन शहर के लोग अच्छे हैं हमदर्द हैं पर हमारी सुनो हम जहाँ-गर्द हैं दाग़-ए-दिल मत किसी को दिखाना सजन ये ज़माना नहीं वो ज़माना सजन उस को मुद्दत हुई सब्र करते हुए आज कू-ए-वफ़ा से गुज़रते हुए पूछ कर उस गदा का ठिकाना सजन अपने 'इंशा' को भी देख आना सजन — Ibn E Insha
किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे मल्लाहो तुम परदेसी को बीच भँवर में मारोगे मुँह देखे की मीठी बातें सुनते इतनी उम्र हुई आँख से ओझल होते होते जी से हमें बिसारोगे आज तो हम को पागल कह लो पत्थर फेंको तंज़ करो इश्क़ की बाज़ी खेल नहीं है खेलोगे तो हारोगे अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें कल तुम इन को याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगे उन से हम से प्यार का रिश्ता ऐ दिल छोड़ो भूल चुको वक़्त ने सब कुछ मेट दिया है अब क्या नक़्श उभारोगे 'इंशा' को किसी सोच में डूबे दर पर बैठे देर हुई कब तक उस के बख़्त के बदले अपने बाल सँवारोगे — Ibn E Insha
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ एक सितारा बैठे बैठे ताबिश में ख़ुर्शीद हुआ आज तो जानी रस्ता तकते शाम का चाँद पदीद हुआ तू ने तो इनकार किया था दिल कब ना-उम्मीद हुआ आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई लब पर उस के नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद हुआ हाँ उस ने झलकी दिखलाई एक ही पल को दरीचे में जानो इक बिजली लहराई आलम एक शहीद हुआ तू ने हम से कलाम भी छोड़ा अर्ज़-ए-वफ़ा के सुनते ही पहले कौन क़रीब था हम से अब तो और बईद हुआ दुनिया के सब कारज छोड़े नाम पे तेरे 'इंशा' ने और उसे क्या थोड़े ग़म थे तेरा इश्क़ मज़ीद हुआ — Ibn E Insha
जल्वा-नुमाई बे-परवाई हाँ यही रीत जहाँ की है कब कोई लड़की मन का दरीचा खोल के बाहर झाँकी है आज मगर इक नार को देखा जाने ये नार कहाँ की है मिस्र की मूरत चीन की गुड़िया देवी हिन्दोस्ताँ की है मुख पर रूप से धूप का आलम बाल अँधेरी शब की मिसाल आँख नशीली बात रसीली चाल बला की बाँकी है 'इंशा'-जी उसे रोक के पूछें तुम को तो मुफ़्त मिला है हुस्न किस लिए फिर बाज़ार-ए-वफ़ा में तुम ने ये जिंस गिराँ की है एक ज़रा सा गोशा दे दो अपने पास जहाँ से दूर इस बस्ती में हम लोगों को हाजत एक मकाँ की है अहल-ए-ख़िरद तादीब की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे जब कभी हम ने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है मुल्कों मुल्कों शहरों शहरों जोगी बन कर घूमा कौन क़र्या-ब-क़र्या सहरा-ब-सहरा ख़ाक ये किस ने फाँकी है हम से जिस के तौर हों बाबा देखोगे दो एक ही और कहने को तो शहर-ए-कराची बस्ती दिल-ज़दगाँ की है — Ibn E Insha
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद सखियों से कब सखियाँ अपने जी के भेद छुपाती हैं हम से नहीं तो उस से कह दे करता कहाँ कलाम है चाँद जिस जिस से उसे रब्त रहा है और भी लोग हज़ारों हैं एक तुझी को बे-मेहरी का देता क्यूँँ इल्ज़ाम है चाँद वो जो तेरा दाग़ ग़ुलामी माथे पर लिए फिरता है उस का नाम तो 'इंशा' ठहरा नाहक़ को बदनाम है चाँद हम से भी दो बातें कर ले कैसी भीगी शाम है चाँद सब कुछ सुन ले आप न बोले तेरा ख़ूब निज़ाम है चाँद हम इस लम्बे-चौड़े घर में शब को तन्हा होते हैं देख किसी दिन आ मिल हम से हम को तुझ से काम है चाँद अपने दिल के मश्रिक-ओ-मग़रिब उस के रुख़ से मुनव्वर हैं बे-शक तेरा रूप भी कामिल बे-शक तू भी तमाम है चाँद तुझ को तो हर शाम फ़लक पर घटता-बढ़ता देखते हैं उस को देख के ईद करेंगे अपना और इस्लाम है चाँद — Ibn E Insha
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो 'इंशा'-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो अश्कों से अपने दिल को हिकायत दामन पर इरक़ाम करो इश्क़ में जब यही काम है यार वले के ख़ुदा का नाम करो कब से खड़े हैं बर में ख़िराज-ए-इश्क़ के लिए सर-ए-राहगुज़ार एक नज़र से सादा-रुख़ो हम सादा-दिलों को ग़ुलाम करो दिल की मताअ' तो लूट रहे हो हुस्न की दी है ज़कात कभी रोज़-ए-हिसाब क़रीब है लोगों कुछ तो सवाब का काम करो 'मीर' से बैअ'त की है तो 'इंशा' मीर की बैअ'त भी है ज़रूर शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो — Ibn E Insha
हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने अभी फ़स्ल गुलों की नहीं गुज़री क्यूँँ दामन-ए-चाक सिया तुम ने इस शहर के लोग बड़े ही सख़ी बड़ा मान करें दरवेशों का पर तुम से तो इतने बरहम हैं क्या आन के माँग लिया तुम ने किन राहों से हो कर आई हो किस गुल का संदेसा लाई हो हम बाग़ में ख़ुश ख़ुश बैठे थे क्या कर दिया आ के सबा तुम ने वो जो क़ैस ग़रीब थे उन का जुनूँ सभी कहते हैं हम से रहा है फ़ुज़ूँ हमें देख के हँस तो दिया तुम ने कभी देखे हैं अहल-ए-वफ़ा तुम ने ग़म-ए-इश्क़ में कारी दवा न दुआ ये है रोग कठिन ये है दर्द बुरा हम करते जो अपने से हो सकता कभी हम से भी कुछ न कहा तुम ने अब रह-रव-ए-माँदास कुछ न कहो हाँ शाद रहो आबाद रहो बड़ी देर से याद किया तुम ने बड़ी दर्द से दी है सदा तुम ने इक बात कहेंगे 'इंशा'-जी तुम्हें रेख़्ता कहते उम्र हुई तुम एक जहाँ का इल्म पढ़े कोई 'मीर' सा शे'र कहा तुम ने — Ibn E Insha

Nazm

हाँ देखा कल हम ने उस को देखने का जिसे अरमाँ था वो जो अपने शहर से आगे क़र्या-ए-बाग़-ओ-बहाराँ था सोच रहा हूँ जंग से पहले, झुलसी सी इस बस्ती में कैसा कैसा घर का मालिक, कैसा कैसा मेहमाँ था सब गलियों में तरनजन थे और हर तरनजन में सखियाँ थीं सब के जी में आने वाली कल का शौक़-ए-फ़रावाँ था मेलों ठेलों बाजों गांजों बारातों की धू में थीं आज कोई देखे तो समझे, ये तो सदा बयाबाँ था चारों जानिब ठंडे चूल्हे, उजड़े उजड़े आँगन हैं वर्ना हर घर में थे कमरे, हर कमरे में सामाँ था उजली और पुर-नूर शबीहें रोज़ नमाज़ को आती थीं मस्जिद के इन ताक़ों में भी क्या क्या दिया फ़रोज़ाँ था उजड़ी मंडी, लाग़र कुत्ते, टूटे खम्बे ख़ाली खेत क्या इस नहर के पुल के आगे ऐसा शहर-ए-ख़मोशाँ था आज कि इक रोटी की ख़ातिर कार्ड दिखाता फिरता है पूरे कम्प को रोटी दे दे ऐसा ऐसा दहक़ाँ था ताब नहीं हर एक से पूछें बाबा तुझ पर क्या गुज़री एक को रोक के पूछा हम ने, सीना उस का बरयाँ था बोला लोग तो आएँ जाएँ बस्ती को फिर बसना है मेरे तिनकों की ख़ातिर आया सारा तूफ़ाँ था आग के अंदर और तपिश है, आग के बाहर और ही आँच शायद कोई दिवाना होगा बे-शक चाक-गिरेबाँ था — Ibn E Insha
छोटी सी बिल्लू छोटा सा बस्ता ठूँसा है जिस में काग़ज़ का दस्ता लकड़ी का घोड़ा रुई का भालू चूरन की शीशी आलू कचालू बिल्लू का बस्ता जिन की पिटारी जब इस को देखो पहले से भारी लट्टू भी इस में रस्सी भी इस में डंडा भी इस में गिल्ली भी इस में ऐ प्यारी बिल्लू ये तो बताओ क्या काम करने स्कूल जाओ उर्दू न जानो इंग्लिश न जानो कहती हो ख़ुद को बिल्क़ीस बानो उम्र की इतनी कच्ची नहीं हो छे साल की हो बच्ची नहीं हो बाहर निकालो लकड़ी का घोड़ा ये लट्टू रस्सी ये गिल्ली डंडा गुड़िया के जूते जंपर जुराबें बस्ते में रक्खो अपनी किताबें मुँह न बनाओ स्कूल जाओ ऐ प्यारी बिल्लू ऐ प्यारी बिल्लू — Ibn E Insha
चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका घास शबनम में शराबोर है शब है आधी बाम सूना है, कहाँ ढूँडें किसी का चेहरा (लोग समझेंगे कि बे-रब्त हैं बातें अपनी) शे'र उगते हैं दुखी ज़ेहन से कोंपल कोंपल कौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलें दूर पहुँचे हैं सरकते हुए ऊदे बादल चाँद तन्हा है (अगर उस की बलाएँ ले लें?) दोस्तो जी का अजब हाल है, लेना बढ़ना चाँदनी रात है कातिक का महीना होगा मीर-ए-मग़्फ़ूर के अश'आर न पैहम पढ़ना जीने वालों को अभी और भी जीना होगा चाँद ठिठका है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर कब से कौन सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगों धुँद उड़ने लगी बुनने लगी क्या क्या चेहरे अच्छी लगती हैं दिवानों की सी बातें लोगों भीगती रात में दुबका हुआ झींगर बोला कसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुश्बू लपकी कोई काकुल कोई दामन, कोई आँचल होगा एक दुनिया थी मगर हम से समेटी न गई ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोले बैठा रहता है सर-ए-बाम-ए-शबिस्ताँ शब को हम तो इस शहर में तन्हा हैं, हमीं से बोले कौन इस हुस्न को देखेगा ये इस से पूछो सोने लगती है सर-ए-शाम ये सारी दुनिया इन के हुजरों में न दर है न दरीचा कोई इन की क़िस्मत में शब-ए-माह को रोना कैसा इन के सीने में न हसरत न तमन्ना कोई किस से इस दर्द-ए-जुदाई की शिकायत कहिए याँ तो सीने में नियस्तां का नियस्तां होगा किस से इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिए सुनने वाला भी जो हैराँ नहीं, हैराँ होगा ऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनी सूनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजल ख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनी ये शब-ए-माह भी कट जाएगी बे-कल बे-कल जी में आती है कि कमरे में बुला लें इस को चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका रात उस को भी निगल जाएगी बोलो बोलो बाम पर और न आएगा किसी का चेहरा — Ibn E Insha
मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं दाँत थे मैं ने दूध पिला कर सात बरस में पाले आ कर उन को ले गए चूहे लंबी मोंछों वाले गुड़ का उन को माट मिला था मीठा और मज़ेदार लाख ख़ुशामद कर के मुझ से ले लिए दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बिल्ली थी इक मामी मौसी चुपके चुपके आई पंजों पर थी देग की खुरचन होंटों पर बालाई बोली गुड़ के माट पे मैं ने चूहे देखे चार हिस्सा आधों-आध रहेगा दे दो दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बा'द में बूढ़ा मोती आया रोनी शक्ल बनाए बोला बीबी इस बिल्ली का कुछ तो करें उपाए दूध न छोड़े गोश्त न छोड़े हैं बुढ्ढा लाचार इस को करूँँ शिकार जो मुझ को दे दो दाँत उधार अच्छी मुन्नी तुम ने अपने इतने दाँत गँवाए कुछ चूहों ने कुछ बिल्ली ने कुछ मोती ने पाए बाक़ी जो दो-चार रहे हैं वो हम को दिलवाओ इक दावत में आज मिलेंगे तिक्के और पोलाव मुर्ग़ी के पाए का सालन बैगन का आचार दोगी या किसी और से माँगूँ हाँ दिए उधार बाबा हाँ हाँ दिए उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं — Ibn E Insha
ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता — Ibn E Insha
इंशा'-जी ये कौन आया किस देस का बासी है होंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी है ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है तरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रे ऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारे रमना दिल-ए-'इंशा' का अब तेरा ठिकाना हो अब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला-ब-जाँ होना हैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होना ऐ शख़्स जो तू आ कर यूँँ दिल में समाया है तू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है? नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैं बातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैं मक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है — Ibn E Insha
पिछले पहर के सन्नाटे में किस की सिसकी किस का नाला कमरे की ख़ामोश फ़ज़ा में दर आया है ज़ोर हवा का टूट चुका है खुले दरीचे की जाली से नन्ही नन्ही बूँदें छन कर सब कोनों में फैल गई हैं और मिरे अश्कों से उन के हाथ का तकिया भीग गया है कितनी ज़ालिम कितनी गहरी तारीकी है खुला दरीचा थर-थर-थर-थर काँप रहा है भीगी मिट्टी सौंधी ख़ुश्बू छोड़ रही है ऊदे बादल काले अंबर की झीलों में डूब गए हैं किस के रुख़्सारों की लर्ज़िश देख रहा हूँ किस की ज़ुल्फ़ों की शिकनों से खेल रहा हूँ चुपके चुपके लेटे लेटे सोच रहा हूँ पिछले पहर का सन्नाटा है किस की सिसकी किस का नाला कमरे की ख़ामोश फ़ज़ा में दर आया है घने दरख़्तों में पुर्वा की सीटी गूँजी दो दिक्शों में क़ैदी रूहें चीख़ रही हैं कोनों में दुबके हुए झींगर चिल्लाते हैं मेहराबों से भूतों के सर टकराते हैं क़िलए के इक बुर्ज के अंदर एक परी (शीलाट की रानी) ख़ंदक़ के अन-देखे पानी की गहराई अंदेशे के बालिश्तों से माप रही है माज़ी की डेवढ़ी की चिलमन खुले दरीचे की जाली से छन छन आएँ रूप की जोत हिना की लाली कल की यादें सौंधी ख़ुश्बू ठंडी बूँदें कल के बासी आँसू जिन से फ़र्दा के बालीं का पर्दा भीग रहा है सहर-ज़दा महबूस हसीना सपनों के शीलाट की रानी आईनों में हुस्न-ए-शिकस्ता देख रही है कितने चेहरे टूटे टूटे पहचाने अन-पहचाने से आगे पीछे आगे पीछे भाग रहे हैं क़िलए के आसेब की सूरत किस की सिसकी किस का नाला कमरे की ख़ामोश फ़ज़ा में दर आया है बिछड़े लोगों पियारे लोगों चाहें भी तो नाम तुम्हारे जान सकेंगे? कैसे मानें तुम को हमारे जी लेने की मर लेने की ख़ुशी हुई अफ़्सोस हुआ है तुम क्या जानो किस के हाथ का तकिया किस के गर्म अश्कों से भीग रहा है खुले दरीचे की जाली से चिमटी आँखों इक लम्हे के कौंदे में तुम किन किन अजनबी चीज़ों को पहचान सकोगी जीवन-खेल में हारे लोगों बिछड़े लोगों पियारे लोगों बरखा की लंबी रातों में कमरे की ख़ामोश फ़ज़ा में पिछले पहर के सन्नाटे में रोते रोते जागने वाले हम लोगों को सो लेने दो और सवेरा हो लेने दो — Ibn E Insha
देख तो गोरी किसे पुकारे बस्ती बस्ती द्वारे द्वारे बर में झोली हाथ में कासा घूम रहा है पीत का प्यासा दिल में आग दबी है डरना आँखों में अश्कों का झरना लब पर दर्द का बारा-मासा घूम रहा है पीत का प्यासा काँटों से छलनी हैं पाँव धूप मिली चेहरे पर छाँव आस मिली आँखों में निरासा घूम रहा है पीत का प्यासा बात हमारी मान के गोरी सब दुनिया से चोरी चोरी घूँघट का पट खोल ज़रा सा घूम रहा है पीत का प्यासा सूरत है 'इंशा'-जी की सी बाल परेशाँ आँखें नीची नाम भी कुछ 'इंशा'-जी का सा घूम रहा है पीत का प्यासा सोच नहीं साजन को बुला ले आगे बढ़ सीने से लगा ले तुझ-बिन दे इसे कौन दिलासा घूम रहा है पीत का प्यासा — Ibn E Insha
लब पर नाम किसी का भी हो, दिल में तेरा नक़्शा है ऐ तस्वीर बनाने वाली जब से तुझ को देखा है बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है नीले पर्बत ऊदी धरती, चारों कूट में तू ही तू तुझ से अपने जी की ख़ल्वत तुझ से मन का मेला है आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है ले जानी अब अपने मन के पैराहन की गिर्हें खोल ले जानी अब आधी शब है, चार तरफ़ सन्नाटा है तूफ़ानों की बात नहीं है, तूफ़ाँ आते जाते हैं तू इक नर्म हवा का झोंका, दिल के बाग़ में ठहरा है या तू आज हमें अपना ले, या तू आज हमारा बन देख कि वक़्त गुज़रता जाए कौन अबद तक जीता है फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है — Ibn E Insha
शहर-ए-दिल की गलियों में शाम से भटकते हैं चाँद के तमन्नाई बे-क़रार सौदाई दिल-गुदाज़ तारीकी रूह-ओ-जाँ को डसती है रूह-ओ-जाँ में बस्ती है शहर-ए-दिल की गलियों में ताक शब की बेलों पर शबनमीं सरिश्कों की बे-क़रार लोगों ने बे-शुमार लोगों ने यादगार छोड़ी है इतनी बात थोड़ी है सद हज़ार बातें थीं हीला-ए-शकेबाई सूरतों की ज़ेबाई कामतों की रा'नाई इन सियाह रातों में एक भी न याद आई जा-ब-जा भटकते हैं किस की राह तकते हैं चाँद के तमन्नाई ये नगर कभी पहले इस क़दर न वीराँ था कहने वाले कहते हैं क़र्या-ए-निगाराँ था ख़ैर अपने जीने का ये भी एक सामाँ था आज दिल में वीरानी अब्र बन के घिर आई आज दिल को क्या कहिए बा-वफ़ा न हरजाई फिर भी लोग दीवाने आ गए हैं समझाने अपनी वहशत-ए-दिल के बुन लिए हैं अफ़्साने ख़ुश-ख़याल दुनिया ने गर्मियाँ तो जाती हैं वो रुतें भी आतीं हैं जब मलूल रातों में दोस्तों की बातों में जी न चैन पाएगा और ऊब जाएगा आहटों से गूँजेगी शहर-ए-दिल की पहनाई और चाँद रातों में चाँदनी के शैदाई हर बहाने निकलेंगे आज़माने निकलेंगे आरज़ू की गहराई ढूँडने को रुस्वाई सर्द सर्द रातों को ज़र्द चाँद बख़्शेगा बे-हिसाब तन्हाई बे-हिजाब तन्हाई शहर-ए-दिल की गलियों में — Ibn E Insha
यूँँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया फिर चाँद हमें किसी रात की गोद में डाल गया हम शहर में ठहरें, ऐसा तो जी का रोग नहीं और बन भी हैं सूने उन में भी हम से लोग नहीं और कूचे को तेरे लौटने का तो सवाल गया तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल ये शख़्स यहाँ पामाल रहा, पामाल गया तिरी चाह में देखा हम ने ब-हाल-ए-ख़राब इसे पर इश्क़ ओ वफ़ा के याद रहे आदाब इसे तिरा नाम ओ मक़ाम जो पूछा, हँस कर टाल गया इक साल गया, इक साल नया है आने को पर वक़्त की भी अब होश नहीं दीवाने को दिल हाथ से इस के वहशी हिरन की मिसाल गया हम अहल-ए-वफ़ा रंजूर सही, मजबूर नहीं और शहर-ए-वफ़ा से दश्त-ए-जुनूँ कुछ दूर नहीं हम ख़ुश न सही, पर तेरे सर का वबाल गया अब हुस्न के गढ़ और शहर-पनाहें सूनी हैं वो जो आश्ना थे उन सब की निगाहें सूनी हैं पर तू जो गया हर बात का जी से मलाल गया — Ibn E Insha
कुछ दे इसे रुख़्सत कर क्यूँँ आँख झुका ली है हाँ दर पे तिरे मौला! 'इंशा' भी सवाली है इस बात पे क्यूँँ इस की इतना भी हिजाब आए फ़रियाद से बे-बहरा कश्कोल से ख़ाली है शाइ'र है तो अदना है, आशिक़ है तो रुस्वा है किस बात में अच्छा है किस वस्फ़ में आली है किस दीन का मुर्शिद है, किस केश का मोजिद है किस शहर का शहना है किस देस का वाली है? ताज़ीम को उठते हैं इस वास्ते दिल वाले हज़रत ने मशीख़त की इक तरह निकाली है आवारा ओ सरगर्दां कफ़नी-ब-गुलू-पेचाँ दामाँ भी दुरीदा है गुदड़ी भी सँभाली है आवारा है राहों में, दुनिया की निगाहों में इज़्ज़त भी मिटा ली है तम्कीं भी गँवा ली है आदाब से बेगाना, दर आया है दीवाना ने हाथ में तोहफ़ा है, ने साथ में डाली है बख़्शिश में तअम्मुल है और आँख झुका ली है कुछ दर पे तिरे मौला, ये बात निराली है 'इंशा' को भी रुख़्सत कर, 'इंशा' को भी कुछ दे दे 'इंशा' से हज़ारों हैं, 'इंशा' भी सवाली है — Ibn E Insha
फैलता फैलता शाम-ए-ग़म का धुआँ इक उदासी का तनता हुआ साएबाँ ऊँचे ऊँचे मिनारों के सर पे रवाँ देख पहुँचा है आख़िर कहाँ से कहाँ झाँकता सूरत-ए-ख़ैल-ए-आवारगाँ ग़ुर्फ़ा ग़ुर्फ़ा बहर काख़-ओ-कू शहर में दफ़अ'तन सैल-ए-ज़ुल्मात को चीरता जल उठा दूर बस्ती का पहला दिया पंछियों ने भी पच्छिम का रस्ता लिया ख़ैर जाओ अज़ीज़ो मगर देखना एक जुगनू भी मिशअल सी ले के चला है उसे भी कोई जुस्तुजू शहर में? आसमाँ पर रवाँ सुरमई बादलो हाँ तुम्हीं क्या उड़ो और ऊँचे उड़ो बाग़-ए-आलम के ताज़ा शगुफ़्ता गुलू बे-नियाज़ाना महका करो ख़ुश रहो लेकिन इतना भी सोचा, कभी ज़ालिमो! हम भी हैं आशिक़-ए-रंग-ओ-बू शहर में कोई देखे ये मजबूरियाँ दूरियाँ एक ही शहर में हम कहाँ तुम कहाँ दोस्तों ने भी छोड़ी हैं दिल-दारियाँ आज वक़्फ़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त-ए-राएगाँ हम जो फिरते हैं वहशत-ज़दा सरगिराँ थे कभी साहिब-ए-आबरू शहर में लोग तानों से क्या क्या जताते नहीं ऐसे राही तो मंज़िल को पाते नहीं जी से इक दूसरे को भुलाते नहीं सामने भी मगर आते जाते नहीं और जाएँ तो आँखें मिलाते नहीं हाए क्या क्या नहीं गुफ़्तुगू शहर में चाँद निकला है दाग़ों की मिशअल लिए दूर गिरजा के मीनारों की ओट से आ मिरी जान आ एक से दो भले आज फेरे करें कूचा-ए-यार के और है कौन दर्द-आश्ना बावरे! एक मैं शहर में, एक तू शहर में — Ibn E Insha
ये सराए है यहाँ किस का ठिकाना ढूँडो याँ तो आते हैं मुसाफ़िर सो चले जाते हैं हाँ यही नाम था कुछ ऐसा ही चेहरा-मोहरा याद पड़ता है कि आया था मुसाफ़िर कोई सूने आँगन में फिरा करता था तन्हा तन्हा कितनी गहरी थी निगाहों की उदासी उस की लोग कहते थे कि होगा कोई आसेब-ज़दा हम ने ऐसी भी कोई बात न देखी उस में ये भी हिम्मत न हुई पास बिठा के पूछें दिल ये कहता था कोई दर्द का मारा होगा लौट आया है जो आवाज़ न उस की पाई जाने किस दर पे किसे जा के पुकारा होगा याँ तो हर रोज़ की बातें हैं ये जीतें मातें ये भी चाहत के किसी खेल में हारा होगा एक तस्वीर कुछ आप से मिलती जुलती एक तहरीर थी पर उस का तो क़िस्सा छोड़ें चंद ग़ज़लें थीं कि लिक्खें कभी लिख कर काटें शे'र अच्छे थे जो सुन लो तो कलेजा थामो बस यही माल मुसाफ़िर का था हम ने देखा जाने किस राह में किस शख़्स ने लूटा उस को गुज़रा करते हैं सुलगते हुए बाक़ी अय्याम लोग जब आग लगाते हैं बुझाते भी भी नहीं अजनबी पीत के मारों से कसी को क्या काम बस्तियों वाले कभी नाज़ उठाते भी नहीं छीन लेते हैं किसी शख़्स के जी का आराम फिर बुलाते भी नहीं पास बिठाते भी नहीं एक दिन सुब्ह जो देखा तो सराए में न था जाने किस देस गया है वो दिवाना ढूँडो!! हम से पूछो तो न आएगा वो जाने वाला तुम तो नाहक़ को भटकने का बहाना ढूँडो याँ तो आया जो मुसाफ़िर यूँँ ही शब-भर ठहरा ये सराए है यहाँ किस का ठिकाना ढूँडो — Ibn E Insha
तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए वक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूर इतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँँही दूर ही दूर सोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गया शहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गया रूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकी बचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगी दूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो दे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए बाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंध ऐ कलियो क्यूँँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंद कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके सहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बू हर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तू जो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन ले तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन जूड़े के इन्हीं फूलों को देखो कल की सी इन में बास कहाँ एक इक तारा कर के डूबी माथे की तन्नाज़ अफ़्शाँ सहने का दुख सह न सके हम कहने की बातें कह न सके पास तिरे कभी आ न सके हम दूर भी तुझ से रह न सके किस से कहे अब रूह की बिपता किस को सुनाए मन की बात दूर की राह भटकता राही जीवन-रात घनेरी रात होंटों की प्यास बुझानी है अब तिरे जी को ये बात लगे न लगे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे? लिए नहीं अपने लिए — Ibn E Insha
दिल पीत की आग में जलता है हाँ जलता रहे उसे जलने दो इस आग से लोगों दूर रहो ठंडी न करो पंखा न झलो हम रात दिना यूँँ ही घुलते रहें कोई पूछे कि हम को ना पूछे कोई साजन हो या दुश्मन हो तुम ज़िक्र किसी का मत छेड़ो सब जान के सपने देखते हैं सब जान के धोके खाते हैं ये दीवाने सादा ही सही पर इतने भी सादा नहीं यारो किस बैठी तपिश के मालिक हैं ठिठुरी हुई आग के अंगियारे तुम ने कभी सेंका ही नहीं तुम क्या समझो तुम क्या जानो दिल पीत की आग में जलता है हाँ जलता है इसे जलने दो इस आग से तुम तो दूर रहो ठंडी न करो पंखा न झलो हर महफ़िल में हम दोनों की क्या क्या नहीं बातें होती हैं इन बातों का मफ़्हूम है क्या तुम क्या समझो तुम क्या जानो दिल चल के लबों तक आ न सका लब खुल न सके ग़म जा न सका अपना तो बस इतना क़िस्सा था तुम अपनी सुनाओ अपनी कहो वो शाम कहाँ वो रात कहाँ वो वक़्त कहाँ वो बात कहाँ जब मरते थे मरने न दिया अब जीते हैं अब जीने दो दिल पीत की आग में जलता है हाँ जलता रहे इसे जलने दो इस आग से 'इंशा' दूर रहो ठंडी न करो पंखा न झलो लोगों की तो बातें सच्ची हैं और दिल का भी कहना करना हुआ पर बात हमारी मानो तो या उन के बनो या अपने रहो राही भी नहीं रहज़न भी नहीं बिजली भी नहीं ख़िर्मन भी नहीं ऐसा भी भला होता है कहीं तुम भी तो अजब दीवाने हो इस खेल में हर बात अपनी कहाँ जीत अपनी कहाँ मात अपनी कहाँ या खेल से यकसर उठ जाओ या जाती बाज़ी जाने दो दिल पीत की आग में जलता है — Ibn E Insha
दिल दर्द की शिद्दत से ख़ूँ-गश्ता ओ सी-पारा इस शहर में फिरता है इक वहशी-ओ-आवारा शाइ'र है कि आशिक़ है, जोगी है कि बंजारा दरवाज़ा खुला रखना सीने से घटा उट्ठे आँखों से झड़ी बरसे फागुन का नहीं बादल, जो चार-घड़ी बरसे बरखा है ये भादों की, बरसे तो बड़ी बरसे दरवाज़ा खुला रखना आँखों में तो इक आलम आँखों में तो दुनिया है होंटों पे मगर मोहरें मुँह से नहीं कहता है किस चीज़ को खो बैठा क्या ढूँडने निकला है दरवाज़ा खुला रखना हाँ थाम मोहब्बत की गर थाम सके डोरी साजन है तिरा साजन अब तुझ से तो क्या चोरी ये जिस की मुनादी है बस्ती में तिरी गोरी दरवाज़ा खुला रखना शिकवों को उठा रखना, आँखों को बिछा रखना इक शम्अ' दरीचे की चौखट पे जला रखना मायूस न फिर जाए, हाँ पास-ए-वफ़ा रखना दरवाज़ा खुला रखना दरवाज़ा खुला रखना — Ibn E Insha
दुनिया-भर से दूर ये नगरी नगरी दुनिया-भर से निराली अंदर अरमानों का मेला बाहरस देखो तो ख़ाली हम हैं इस कुटिया के जोगी हम हैं इस नगरी के वाली हम ने तज रक्खा है ज़माना तुम आना तो तन्हा आना दिल इक कुटिया दश्त किनारे बस्ती का सा हाल नहीं है मुखिया पीर प्रोहित प्यादे इन सब का जंजाल नहीं है ना बनिए न सेठ न ठाकुर पैंठ नहीं चौपाल नहीं है सोना रूपा चौकी मसनद ये भी माल-मनाल नहीं है लेकिन ये जोगी दिल वाला ऐ गोरी कंगाल नहीं है चाहो जो चाहत का ख़ज़ाना तुम आना और तन्हा आना आहू माँगे बन का रमना भँवरा चाहे फूल की डाली सूखे खेत की कोंपल माँगे इक घनघोर बदरिया काली धूप जले कहीं साया चाहें अंधी रातें दीप दिवाली हम क्या माँगे हम क्या चाहें होंट सिले और झोली ख़ाली दिल भँवरा न फूल न कोंपल बगिया ना बगिया का माली दिल आहू न धूप न साया दिल की अपनी बात निराली दिल तो किसी दर्शन का भूका दिल तो किसी दर्शन का सवाली नाम लिए बिन पड़ा पुकारे किसे पुकारे दश्त किनारे ये तो इक दुनिया को चाहें इन को किस ने अपना जाना और तो सब लोगों के ठिकाने अब भटकें तो आप ही भटकें छोड़ा दुनिया को भटकाना गीत कबत और नज़्में ग़ज़लें ये सब इन का माल पुराना झूटी बातें सच्ची बातें बीती बातें क्या दोहराना अब तो गोरी नए सिरे से अँधियारों में दीप जलाना मजबूरी? कैसी मजबूरी आना हो तो लाख बहाना आना इस कुटिया के द्वारे दिल इक कुटिया दश्त किनारे — Ibn E Insha