Ibn E Insha

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    "एक लड़का"

    एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
    एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ
    जी मचलता था एक एक शय पर
    जैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका
    लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों
    एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

    ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
    आज मेला लगा है उसी शान से
    आज चाहूँ तो इक इक दुकाँ मोल लूँ
    आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ
    ना-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ
    पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ

    Ibn E Insha
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    फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
    फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों

    फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो
    फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी आधी हम ने छुपाई हो

    फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हम ने बहाने हों
    फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सच-मुच के मय-ख़ाने हों

    फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूटा झूटी पीत हमारी हो
    फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हो

    फ़र्ज़ करो ये जोग बजोग का हम ने ढोंग रचाया हो
    फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो

    देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
    बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'

    जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
    कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं

    शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं
    बंजारे जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं

    इन में सच्चे मोती भी हैं, इन में कंकर पत्थर भी
    इन में उथले पानी भी हैं, इन में गहरे सागर भी

    गोरी देख के आगे बढ़ना सब का झूटा सच्चा 'हू'
    डूबने वाली डूब गई वो घड़ा था जिस का कच्चा 'हू'

    Ibn E Insha
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    'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
    वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या

    इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही
    जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या

    शब बीती चाँद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में
    क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या

    फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी
    जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या

    उस रोज़ जो उन को देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है
    उस रोज़ जो उन से बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या

    उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें
    जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या

    उस को भी जला दुखते हुए मन इक शो'ला लाल भबूका बन
    यूँ आँसू बन बह जाना क्या यूँ माटी में मिल जाना क्या

    जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूँ बन में न जा बिसराम करे
    दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या

    Ibn E Insha
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    हम जंगल के जोगी हम को एक जगह आराम कहाँ
    आज यहाँ कल और नगर में सुब्ह कहाँ और शाम कहाँ

    हम से भी पीत की बात करो कुछ हम से भी लोगो प्यार करो
    तुम तो परेशाँ हो भी सकोगे हम को यहाँ पे दवाम कहाँ

    साँझ-समय कुछ तारे निकले पल-भर चमके डूब गए
    अम्बर अम्बर ढूँढ रहा है अब उन्हें माह-ए-तमाम कहाँ

    दिल पे जो बीते सह लेते हैं अपनी ज़बाँ में कह लेते हैं
    'इंशा'-जी हम लोग कहाँ और 'मीर' का रंग-ए-कलाम कहाँ

    Ibn E Insha
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    कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो
    ऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो

    सच अच्छा पर उस के जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी
    पागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो

    उन का ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है
    सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो

    महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है
    फिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो

    गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं
    इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो

    आँखें मूँद किनारे बैठो मन के रक्खो बंद किवाड़
    'इंशा'-जी लो धागा लो और लब सी लो ख़ामोश रहो

    Ibn E Insha
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    इस शहर में किस से मिलें हमसे तो छूटीं महफ़िलें
    हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा

    Ibn E Insha
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    हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता
    हर किसी की नज़र नहीं होती

    Ibn E Insha
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    इक साल गया इक साल नया है आने को
    पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने को

    Ibn E Insha
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    हम घूम चुके बस्ती बन में
    इक आस की फांस लिए मन में
    कोई साजन हो कोई प्यारा हो
    कोई दीपक हो, कोई तारा हो
    जब जीवन रात अंधेरी हो
    इक बार कहो तुम मेरी हो

    जब सावन बादल छाए हों
    जब फागुन फूल खिलाए हों
    जब चंदा रूप लुटाता हो
    जब सूरज धूप नहाता हो
    या शाम ने बस्ती घेरी हो
    इक बार कहो तुम मेरी हो

    हांदिल का दामन फैला है
    क्यूंगोरी का दिल मैला है
    हम कब तक पीत के धोके में
    तुम कब तक दूर झरोके में
    कब दीद से दिल को सेरी हो
    इक बार कहो तुम मेरी हो

    क्या झगड़ा सूद ख़सारे का
    ये काज नहीं बंजारे का
    सब सोना रूपा ले जाए
    सब दुनिया, दुनिया ले जाए
    तुम एक मुझे बहुतेरी हो
    इक बार कहो तुम मेरी हो

    Ibn E Insha
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    कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
    कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

    Ibn E Insha
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