Hasrat Mohani

Hasrat Mohani

@hasrat-mohani

Lucknow· India

Hasrat Mohani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hasrat Mohani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हम क्या करें अगर न तिरी आरज़ू करें दुनिया में और भी कोई तेरे सिवा है क्या — Hasrat Mohani
'हसरत' की भी क़ुबूल हो मथुरा में हाज़िरी सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है आज — Hasrat Mohani
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं — Hasrat Mohani
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है — Hasrat Mohani
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का — Hasrat Mohani
देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम — Hasrat Mohani
शे'र दर-अस्ल हैं वही 'हसरत' सुनते ही दिल में जो उतर जाएँ — Hasrat Mohani

Ghazal

तिरे दर्द से जिस को निस्बत नहीं है वो राहत मुसीबत है राहत नहीं है जुनून-ए-मोहब्बत का दीवाना हूँ मैं मिरे सर में सौदा-ए-हिकमत नहीं है तिरे ग़म की दुनिया में ऐ जान-ए-आलम कोई रूह महरूम-ए-राहत नहीं है मुझे गरम-ए-नज़्ज़ारा देखा तो हँस कर वो बोले कि इस की इजाज़त नहीं है झुकी है तिरे बार-ए-इरफ़ाँ से गर्दन हमें सर उठाने की फ़ुर्सत नहीं है ये है उन के इक रू-ए-रंगीं का परतव बहार-ए-तिलिस्म-ए-लताफ़त नहीं है तिरे सरफ़रोशों में है कौन ऐसा जिसे दिल से शौक़-ए-शहादत नहीं है तग़ाफ़ुल का शिकवा करूँँ उन से क्यूँँकर वो कह देंगे तू बे-मुरव्वत नहीं है वो कहते हैं शोख़ी से हम दिलरुबा हैं हमें दिल नवाज़ी की आदत नहीं है शहीदान-ए-ग़म हैं सुबुक रूह क्या क्या कि उस दिल पे बार-ए-नदामत नहीं है नमूना है तक्मील-ए-हुस्न-ए-सुख़न का गुहर बारी-ए-तबा-ए-हसरत नहीं है — Hasrat Mohani
और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के — Hasrat Mohani
अक़्ल से हासिल हुई क्या क्या पशीमानी मुझे इश्क़ जब देने लगा तालीम-ए-नादानी मुझे रंज देगी बाग़-ए-रिज़वाँ की तन-आसानी मुझे याद आएगा तिरा लुत्फ़-ए-सितम-रानी मुझे मेरी जानिब है मुख़ातिब ख़ास कर वो चश्म-ए-नाज़ अब तो करनी ही पड़ेगी दिल की क़ुर्बानी मुझे देख ले अब कहीं आ कर जो वो ग़फ़लत-शिआर किस क़दर हो जाए मर जाने में आसानी मुझे बे-नक़ाब आने को हैं मक़्तल में वो बे-शक मगर देखने काहे को देगी मेरी हैरानी मुझे सैंकड़ों आज़ादियाँ इस क़ैद पर 'हसरत' निसार जिस के बाइस कहते हैं सब उन का ज़िंदानी मुझे — Hasrat Mohani
आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी — Hasrat Mohani
क्या तुम को इलाज-ए-दिल-ए-शैदा नहीं आता आता है पर इस तरह कि गोया नहीं आता हो जाती थी तस्कीन सो अब फ़र्त-ए-अलम से इस बात को रोते हैं कि रोना नहीं आता तुम हो कि तुम्हें वादा-वफ़ाई की नहीं ख़ू मैं हूँ कि मुझे तुम से तक़ाज़ा नहीं आता है पास ये किस की निगह-ए-महव-ए-हया का लब तक जो मिरे हर्फ़-ए-तमन्ना नहीं आता उन की निगह-ए-मस्त के जल्वे हैं नज़र में भूले से भी ज़िक्र-ए-मय-ओ-मीना नहीं आता शोख़ी से वो माना-ए-सितम पूछ रहे हैं अब लफ़्ज़-ए-जफ़ा भी उन्हें गोया नहीं आता मैं दर्द की लज़्ज़त से रज़ा-मंद हूँ 'हसरत' मुझ को सितम-ए-यार का शिकवा नहीं आता — Hasrat Mohani
उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी हम ने ये कह दिया कि मोहब्बत न हो सकी शुक्र-ए-जफ़ा भी अहल-ए-रज़ा ने किया अदा उन से यही नहीं कि शिकायत न हो सकी शब का ये हाल है कि तिरी याद के सिवा दिल को किसी ख़याल से राहत न हो सकी पा-बोस की भी हम को इजाज़त न दे सके इतनी भी तुम से क़द्र-ए-मोहब्बत न हो सकी ग़र्क़-ए-सुरूर-ओ-सूर मुझे पा के दफ़अ'तन नासेह से तर्क-ए-मय की नसीहत न हो सकी ख़ामोशियों का राज़-ए-मोहब्बत वो पा गए गो हम से अर्ज़-ए-हाल की जुरअत न हो सकी कर दी ज़बान-ए-शौक़ ने सब शरह-ए-आरज़ू अल्फ़ाज़ में अगरचे सराहत न हो सकी लुत्फ़-ए-मज़ीद की मैं तमन्ना तो कर सका तुम ये तो कह सके कि क़नाअ'त न हो सकी क्यूँँ इतनी जल्द हो गए घबरा के हम फ़ना ऐ दर्द-ए-यार कुछ तिरी ख़िदमत न हो सकी वाइज़ को अपने ऐब-ए-रिया का रहा ख़याल रिंदों की साफ़ साफ़ मज़म्मत न हो सकी अरबाब-ए-क़ाल हाल पे ग़ालिब न आ सके ज़ाहिद से आशिक़ों की इमामत न हो सकी ऐसा भी क्या इताब कि साक़ी बची-कुची आख़िर में कुछ भी हम को इनायत न हो सकी उन से मैं अपने दिल का तक़ाज़ा न कर सका ये बात थी ख़िलाफ़-ए-मुरव्वत न हो सकी क्यूँँ आए होश में जो इबादत न कर सके पीर-ए-मुग़ाँ की हम से इता'अत न हो सकी 'हसरत' तिरी निगाह-ए-मोहब्बत को क्या कहूँ महफ़िल में रात उन से शरारत न हो सकी — Hasrat Mohani
बुत-ए-बे-दर्द का ग़म मोनिस-ए-हिज्राँ निकला दर्द जाना था जिसे हम ने वो दरमाँ निकला आँख जब बंद हुई तब खुलीं आँखें अपनी बज़्म-ए-याराँ जिसे समझे थे वो ज़िंदाँ निकला हसरत-ओ-यास का अम्बोह फ़ुग़ाँ की कसरत मैं तिरी बज़्म से क्या बा-सर-ओ-सामाँ निकला ख़ून हो कर तो ये दिल आँख से बरसों टपका न कोई पर दिल-ए-नाकाम का अरमाँ निकला आइना पैकर-ए-तस्वीर निगाह-ए-मुश्ताक़ जिसे देखा तिरी महफ़िल में वो हैराँ निकला मुझ को हैरत है हुआ क्या दम-ए-रुख़्सत हमदम जान निकली मिरे पहलू से कि जानाँ निकला ख़ूब दोज़ख़ की मुसीबत से बचे हम 'हसरत' इस का दारोग़ा वही यार का दरबाँ निकला — Hasrat Mohani
घटेगा तेरे कूचे में वक़ार आहिस्ता आहिस्ता बढ़ेगा आशिक़ी का ए'तिबार आहिस्ता आहिस्ता बहुत नादिम हुए आख़िर वो मेरे क़त्ल-ए-नाहक़ पर हुई क़द्र-ए-वफ़ा जब आश्कार आहिस्ता आहिस्ता जिला-ए-शौक़ से आईना-ए-तस्वीर-ए-ख़ातिर में नुमायाँ हो चला रू-ए-निगार आहिस्ता आहिस्ता मोहब्बत की जो फैली है ये निकहत बाग़-ए-आलम में हुई है मुंतशिर ख़ुशबू-ए-यार आहिस्ता आहिस्ता दिल ओ जान ओ जिगर सब्र ओ ख़िरद जो कुछ है पास अपने ये सब कर देंगे हम उन पर निसार आहिस्ता आहिस्ता अजब कुछ हाल हो जाता है अपना बे-क़रारी से बजाते हैं कभी जब वो सितार आहिस्ता आहिस्ता असर कुछ कुछ रहेगा वस्ल में भी रंज-ए-फ़ुर्क़त का दिल-ए-मुज़्तर को आएगा क़रार आहिस्ता आहिस्ता न आएँगे वो 'हसरत' इंतिज़ार-ए-शौक़ में यूँँही गुज़र जाएँगे अय्याम-ए-बहार आहिस्ता आहिस्ता — Hasrat Mohani
जो वो नज़र बसर-ए-लुत्फ़ आम हो जाए अजब नहीं कि हमारा भी काम हो जाए शराब-ए-शौक़ की क़ीमत है नक़्द-ए-जान-ए-अज़ीज़ अगर ये बाइस-ए-कैफ़-ए-दवाम हो जाए रहीन-ए-यास रहें अहल-ए-आरज़ू कब तक कभी तो आप का दरबार आम हो जाए जो और कुछ हो तिरी दीद के सिवा मंज़ूर तो मुझ पे ख़्वाहिश-ए-जन्नत हराम हो जाए वो दूर ही से हमें देख लें यही है बहुत मगर क़ुबूल हमारा सलाम हो जाए अगर वो हुस्न-ए-दिल-आरा कभी हो जल्वा फ़रोश फ़रोग़-ए-नूर में गुम ज़र्फ़-ए-बाम हो जाए सुना है बरसर-ए-बख़ि़्शश है आज पीर मुग़ाँ हमें भी काश अता कोई जाम हो जाए तिरे करम पे है मौक़ूफ़ कामरानी-ए-शौक़ ये ना-तमाम इलाही तमाम हो जाए सितम के बा'द करम है जफ़ा के बा'द अता हमें है बस जो यही इल्तिज़ाम हो जाए अता हो सोज़ वो या रब जुनून-ए-'हसरत' को कि जिस से पुख़्ता ये सौदा-ए-ख़ाम हो जाए — Hasrat Mohani
नज़्ज़ारा-ए-पैहम का सिला मेरे लिए है हर सम्त वो रुख़ जल्वा-नुमा मेरे लिए है उस चेहरा-ए-अनवर की ज़िया मेरे लिए है वो ज़ुल्फ़-ए-सियह ताब-ए-दोता मेरे लिए है ज़िन्हार अगर अहल-ए-हवस तुझ पे फ़िदा हूँ ये मर्तबा-ए-सदक़-ओ-सफ़ा मेरे लिए है बन कर मैं रज़ाकार मुहय्याए-फ़ना हूँ आवाज़ा-ए-हक़ बाँग-ए-दरा मेरे लिए है ख़ुशनूदी-ए-फ़ुज्जार के पैरव हैं यज़ीदी तक़लीद-ए-शह-ए-कर्ब-ओ-बला मेरे लिए है महरूम हूँ मजबूर हूँ बे-ताब-ओ-तवाँ हूँ मख़्सूस तिरे ग़म का मज़ा मेरे लिए है सरमाया-ए-राहत है फ़ना की मुझे तल्ख़ी इस ज़हर में सामान-ए-बक़ा मेरे लिए है जन्नत की हवस हो तो मैं काफ़िर कि परेशाँ उस शोख़ की ख़ुशबू-ए-क़बा मेरे लिए है पहले भी कुछ उम्मीद न थी चारागरों को और अब तो दवा है न दुआ मेरे लिए है मर जाऊँगा मय-ख़ाने से निकला जो कभी मैं नज़्ज़ारा-मय रूह-फ़ज़ा मेरे लिए है तशख़ीस-ए-तबीबाँ पे हँसी आती है 'हसरत' ये दर्द-ए-जिगर है कि दवा मेरे लिए है — Hasrat Mohani
मुदावा-ए-दिल-ए-दीवाना करते ये करते हम तो कुछ अच्छा करते वफ़ा सादिक़ अगर होती हमारी वो करते भी तो जौर इतना न करते हम अच्छा था जो बहर-ए-पर्दा-पोशी मोहब्बत का तिरी चर्चा न करते तुम्हारी फ़ित्ना-पर्दाज़ी का शिकवा जो हम करते तो कुछ बेजा न करते निगाहें आशिक़ों की थी हवस-कार वो क्या करते अगर पर्दा न करते जो फिर मिलने की होती कुछ भी उम्मीद तो हम उस के लिए क्या क्या न करते तलब का हौसला होता तो इक दिन ख़िताब उस बुत से बेबाकाना न करते हमारा पास उन्हें कुछ भी जो होता किसी की और हम परवा न करते शकेबाई का दम रखते तो 'हसरत' उन्हें यूँँ शौक़ से देखा न करते — Hasrat Mohani