छुप के उस ने जो ख़ुद-नुमाई की

इंतिहा थी ये दिलरुबाई की

माइल-ए-ग़म्ज़ा है वो चश्म-ए-सियाह
अब नहीं ख़ैर पारसाई की

हम से क्यूँकर वो आस्ताना छुटे
मुद्दतों जिस पे जब्हा-साई की

दिल ने बरसों ब-जुस्तुजू-ए-कमाल
कूचा-ए-इश्क़ में गदाई की

दाम से उन के छूटना तो कहाँ
याँ हवस भी नहीं रिहाई की

क्या किया ये कि अहल-ए-शौक़ के साथ
तू ने की भी तो बे-वफ़ाई की

हो के नादिम वो बैठे हैं ख़ामोश
सुल्ह में शान है लड़ाई की

उस तग़ाफ़ुल-शिआर से 'हसरत'
हम में ताक़त नहीं जुदाई की

— Hasrat Mohani

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Judai Shayari

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