Bhaskar Shukla

Bhaskar Shukla

मैं कैसे मान लूँ कि इश्क़ बस इक बार होता है
तुझे जितनी दफ़ा देखूँ मुझे हर बार होता है

तुझे पाने की हसरत और डर ना-कामियाबी का
इन्हीं दो-तीन बातों से ये दिल दो-चार होता है

  • Sher
  • Ghazal

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