Bhaskar Shukla

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Bhaskar Shukla shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bhaskar Shukla's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

किताबें बंद कर के जब मैं बिस्तर पर पहुँचता हूँ तुम्हारी याद भी आ कर बगल में लेट जाती है — Bhaskar Shukla
मुश्किल है समझाना इस को दिल के पास दिमाग़ नहीं है — Bhaskar Shukla
कुछ एक की हम जैसी क़िस्मत होती है बाकी सब की अच्छी क़िस्मत होती है — Bhaskar Shukla
तुम्हारी याद का रंग डाल कर के कहा तन्हाई ने होली मुबारक ! — Bhaskar Shukla
लाज़िम है अब कि आप ज़ियादा उदास हों इस शहर में बचे हैं बहुत कम उदास लोग — Bhaskar Shukla
वरना तो ये दीवार-ओ-दर लगता है तुम होती हो घर में तो घर लगता है — Bhaskar Shukla
तेरा लिक्खा जो पढ़ूँ तो तेरी आवाज़ सुनूँ तेरी आवाज़ सुनूँ तो तेरा चेहरा देखूँ — Bhaskar Shukla
मिले थे फरवरी में आपसे पहली दफ़ा हम तभी से दोस्ती सी हो गई है फरवरी से — Bhaskar Shukla
जिसे तुम काट आए उस शजर को ढूँढ़ता होगा परिंदा लौट कर के अपने घर को ढूँढ़ता होगा — Bhaskar Shukla
हमारी मुस्कुराहट लाज़िमी है कि हम उन की गली से आ रहे हैं — Bhaskar Shukla
रात अँधेरी, ख़ाली रस्ता, और रफ़ी के गाने हैं गाड़ी में सब हम जैसे हैं या'नी सब दीवाने हैं — Bhaskar Shukla
ख़्वाहिश सब रखते हैं तुझ को पाने की और फिर अपनी अपनी क़िस्मत होती है — Bhaskar Shukla
चलो माना कि रोना मसअले का हल नहीं लेकिन करे भी क्या कोई जब ख़त्म हर उम्मीद हो जाए — Bhaskar Shukla
ख़्वाहिश है इन गुलों को दवामी बहार दूँ जितने किए हैं इश्क़ सुख़न में उतार दूँ — Bhaskar Shukla
ठीक थी उन सेे मुलाक़ात मगर ठीक ही थी फ़िल्म इतनी नहीं अच्छी कि दोबारा देखूँ — Bhaskar Shukla
वैसे तो उस का नाम नहीं हाफ़िज़े में अब मुमकिन है रूबरू जो कभी हो, पुकार दूँ — Bhaskar Shukla
जो कह नहीं सका उसे क़रीब था वो जब मेरे वो बात शे'र में बदल गई तो दूर तक गई — Bhaskar Shukla
ज़मीन-ओ-आसमाँ को जगमगा दो रौशनी से दिसम्बर आज मिलने जा रहा है जनवरी से — Bhaskar Shukla

Ghazal

जिस किसी पर भी तेरा दर खुल गया है ये समझ लीजे मुक़द्दर खुल गया है क्यूँ तलाशें राह बाहर की कोई जब रास्ता अंदर ही अंदर खुल गया है एक नज़र में लुट गया है दिल सरापा एक ही चाबी से घर भर खुल गया है एक नदी सेहरा की होना चाहती है एक नदी जिस पर समुंदर खुल गया है जानते तो थे मगर दौरान-ए-मुश्किल ये ज़माना और बेहतर खुल गया है यार अब तो बंद कर बातें बनाना राज़ तेरा शोबदागर खुल गया है ग़लतियाँ गर्दन की अब गिनवाई जाएँ किस के हाथों में था ख़ंजर खुल गया है चंद रोज़ अब कुछ नया होना नहीं है मीर का एक शे'र हम पर खुल गया है दिल गली वीराँ रही कुछ दिन तेरे बिन अब वहाँ यादों का दफ़्तर खुल गया है भास्कर यूँँ ही नहीं खुलता कहीं भी ध्यान से सुनिए उसे गर खुल गया है — Bhaskar Shukla