laazim hai ab ki aap ziyaada udaas hon | लाज़िम है अब कि आप ज़ियादा उदास हों

  - Bhaskar Shukla

लाज़िम है अब कि आप ज़ियादा उदास हों
इस शहर में बचे हैं बहुत कम उदास लोग

  - Bhaskar Shukla

Udas Shayari

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    ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना था वो ख़्वाब में भी मिले
    मैं नींद नींद को तरसा मगर नहीं सोया

    ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल था कि थम गई बारिश
    ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म है कि मैं नहीं रोया
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    दुख कम मिलें इस साल तुमको उस बरस से
    ये साल तुमको हौसला दे ये दुआ है
    Siddharth Saaz
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    मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए
    बहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं
    Nasir Kazmi
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    ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को
    हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है
    Hafeez Banarasi
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    हाए उसके हाथ पीले होने का ग़म
    इतना रोए हैं कि आँखें लाल कर ली
    Harsh saxena
    हम ऐसे लोग भी जाने कहाँ से आते हैं
    ख़ुशी में रोते हैं जो ग़म में मुस्कुराते हैं

    हमारा साथ भला कब तलक निभाते आप
    कभी कभी तो हमीं ख़ुद से ऊब जाते हैं
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    Mohit Dixit
    आज तो बे-सबब उदास है जी
    इश्क़ होता तो कोई बात भी थी
    Nasir Kazmi
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    वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
    ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
    Nasir Kazmi
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    उसी मक़ाम पे कल मुझ को देख कर तन्हा
    बहुत उदास हुए फूल बेचने वाले
    Jamal Ehsani
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    ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना
    थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें
    Majrooh Sultanpuri
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    वैसे तो उसका नाम नहीं हाफ़िज़े में अब
    मुमकिन है रूबरू जो कभी हो, पुकार दूँ
    Bhaskar Shukla
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    गुज़िश्ता साल शायद ठीक से मारा नहीं था
    ये रावण इस बरस फिर सामने तनकर खड़ा है
    Bhaskar Shukla
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    कुछ एक की हम जैसी क़िस्मत होती है
    बाकी सब की अच्छी क़िस्मत होती है

    ख़्वाहिश सब रखते हैं तुझको पाने की
    और फिर अपनी अपनी क़िस्मत होती है

    ख़्वाबों में तो दिख जाते हैं कम-अज़-कम
    दिन से अच्छी शब की क़िस्मत होती है

    उनकी गलियों में जाकर अहसास हुआ
    गलियों गलियों की भी क़िस्मत होती है

    उसने मुझको हँसकर देखा है यारा
    मैं ये समझूँ यानी..क़िस्मत होती है
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    Bhaskar Shukla
    दबे थे जो कहीं दिल में अचानक कल निकल आये
    खुला जब एलबम तो कुछ पुराने पल निकल आये
    Bhaskar Shukla
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    जो ये मुमकिन नहीं कलयुग में राम हो जाऊँ
    मेरी ख़्वाहिश है कि अब्दुल कलाम हो जाऊँ
    Bhaskar Shukla
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