Faiz Ahmad Faiz

Faiz Ahmad Faiz

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

About

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के।

रुमानियत और इंकलाब जैसी शायरी की जब बात हो तो जहन एक पत्रकार, शायर, फौजी, ट्रांसलेटर और आधा दर्जन से ज्यादा लैंग्वेज जानने वाले फैज अहमद फैज़ पर जाकर टिक जाता है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 3 फरवरी 1911 सियालकोट (पंजाब पाकिस्तान) के मशहूर बैरिस्टर सुल्तान मुहम्मद खां के घर पैदा हुए.
फैज़ अहमद फैज़ ने 1933 में अंग्रेजी में और 1934 में अरबी में M.A. पास करने के बाद मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज अमृतसर में लेक्चरशिप से अपने करियर की शुरुवात की | 1936 में लखनऊ में होनेवाली प्रगतिशील लेखक संघ की पहली मीटिंग में उन्होंने इस संस्था के संस्थापक-सदस्य के रूप में हिस्सा लिया |
अमृतसर में रहते हुए उनकी मुलाकात एलिस से हुई. पहली मुलाकात में ही दोनों दिल हार बैठे. और 1941 में एलिस उनकी हमसफर बन गईं. एलिस अमृतसर के एम ओ कॉलिज के प्रिसिंपल डॉ. तासीर की बीवी की बहन थीं. एलिस हिन्दुस्तान अपनी बहन से मिलने आई थीं. जहां फैज़ से इश्क हो गया. मुलाकात के तकरीबन दो साल बाद शादी हुई. शादी की रस्म कश्मीर में हुई. महाराजा कश्मीर ने अपना गर्मियों का महल निकाह की रस्म के लिए दिया था और शेख़ अब्दुल्लाह ने निकाह की रस्म अदा की थी.

राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया
दिल बहुत कुछ जला के देख लिया

और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया।

पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में, तुर्की, श्रीलंका, म्यांमार में जब आज़ादी आई तो उसका चेहरा वहां के लोग पहचान नहीं पा रहे थे. जब भारत में आज़ादी आई तब गांधी जी बेलियाघाट की तरफ थे, उधर लोग अपने हिंदू और मुसलमान भाइयों को आपस में मार-काट रहे थे. सभी को लगा कि यह तो वह है ही नहीं, जिसकी हमने ख़्वाहिश की थी. फ़ैज़ को भी यही लगा था-

ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

1951 में पाकिस्तान के रावलपिंडी में पीएम लियाकत अली खां का तख्ता पलटने की साजिश हुई. इस साजिश का भंडाफोड़ हुआ, लोगों की गिरफ्तारियां हुईं, गिरफ्तार लोगों में फैज अहमद फैज़ भी शामिल थे. फैज पर मुकदमा चला पर इल्जाम साबित ना हो सके और वो 1955 में रिहा हो गए. जेल में उन्होंने शायरी की और वो शायरी ‘जिंदान नामा’ के नाम से छपी. जेल में उनके लिखने पर पाबंदियां लगा दी गई थीं, शायर से कागज-कलम भले ही छिन गया था, मगर जज्बात और हिम्मत नहीं.

मताए लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने।

फैज़ अहमद फैज एक बार पाकिस्तान से वतन-बदर हुए तो फिर सारी दुनिया के हो गये | सारी दुनिया का हर मुल्क उनका अपना वतन बन गया | भारत की तो खैर बात ही दूसरी थी- पाकिस्तान और भारत उनके लिए एक ही जिस्म के दो हिस्से थे | फैज अहमद फैज ने कई राष्ट्रों की यात्राए की जिनमे सेनफ्रांसिस्को, जिनेवा, चीन, लन्दन, मास्को, हंगरी, क्यूबा, लेबनान, अल्जीरिया, मिस्त्र, फिलीपाइन और इंडोनेशिया शामिल है |फैज ना केवल एक देश के शायर थे बल्कि पुरे विश्व के शायर थे उन्होंने कई नज्मे दूसरे देशो की घटनाओ और उनके सन्दर्भ में लिखी जैसे: नज्म “फिलीस्तीनी बच्चे के लिए लोरी‘

मत रो बच्चे
रो रो के अभी
तेरी अम्मी की आँख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने ग़म से रुख़्सत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने ख़्वाब की तितली पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराए देस गया है
मत रो बच्चे
तेरे आँगन में
मुर्दा सूरज नहला के गए हैं
चंद्रमा दफ़ना के गए हैं
मत रो बच्चे
अम्मी, अब्बा, बाजी, भाई
चाँद और सूरज
तू गर रोएगा तो ये सब
और भी तुझ को रुलवाएेंगे
तू मुस्काएगा तो शायद
सारे इक दिन भेस बदल कर
तुझ से खेलने लौट आएँगे।

फैज अहमद फैज की रचनाओ को कई गायकों ने गाया जब फैज अहमद फैज का पहला संकलन नक्श-फरियादी छपा तो नूरजहांजो उस वक्त कि मशहूर गायिका थी ने फैज से ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत न मांग‘ को गाने की इजाजत मांगी | कहा जाता है की वो इसे सबसे पहले गाना चाहती थी | फैज़ की रचनाओ के गायकों में बेगम अख्तर, मेहँदी हसन और नए गाने वालो की पीढ़ी में इक़बाल बानो, फरीदा खानम, टीना सानी, नायर नूर शामिल है | बेगम अख्तर ने बहुत खूबसूरत ढंग से ‘शाम-ए-फ़िराक अब न पूछ‘ गाई और मेहँदी हसन ने ‘गुलो में रंग भरे‘ को इस तरह गाया की एक बार फैज़ साहब से दिल्ली में उनसे इस ग़ज़ल की फरमाइश करने पर उन्होंने कहा की यह तो हमने मेहँदी हसन को दे दी आप उन्ही से सुन लीजियेगा | फैज़ की शायरी जो सियासती तासीर रखती थी उसे कुछ ही गायकों ने आवाम तक पहुचाया जिनमे इकबाल बानो का नाम सबसे ऊपर आता है उनकी वह नज्म ‘हम देखेंगे‘ को बहुत अच्छे तरीके से गाया और अमर कर दिया।

फ़ैज़ को ज़िंदगी और सुन्दरता से प्यार है- भरपूर प्यार और इसलिए जब उन्हें मानवता पर मौत और बदसूरती की छाया मंडराती दिखाई देती है, वह उसको दूर करने के लिए बड़ी से बड़ी आहुति देने से भी नहीं चूकते। उनका जीवन इसी पवित्र संघर्ष का प्रतीक है और उनकी शाइरी इसी का संगीत। 20 नवंबर 1984 का वो दिन आया जब उर्दू शायरी का ये बड़ा सितारा इस जहां से परवाज कर गया. उन्हें ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ और कुछ अन्य सम्मान जीते-जी मिले, लेकिन उनके अपने देश पाकिस्तान में उन्हें ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से मरणोपरांत ही नवाजा जा सका।

कविता संग्रह:

नक्श-ए-फरियादी
दस्त-ए-सबा
ज़िंदानामा
दस्त-ए-तह-ए-संग
सर-ए-वादी-ए-सीना
शाम-ए-शहर-ए-यारां
मेरे दिल मेरे मुसाफिर
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