Faiz Ahmad Faiz

Faiz Ahmad Faiz

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Lahore· Pakistan

Faiz Ahmad Faiz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Faiz Ahmad Faiz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल ज़बाँ अब तक तेरी है — Faiz Ahmad Faiz
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही नहीं विसाल मुयस्सर तो आरज़ू ही सही — Faiz Ahmad Faiz
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के — Faiz Ahmad Faiz
रात यूँँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए — Faiz Ahmad Faiz
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई — Faiz Ahmad Faiz
हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे — Faiz Ahmad Faiz
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे — Faiz Ahmad Faiz
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं तेरे फ़िराक़ में यूँँ सुबह-ओ-शाम करते हैं — Faiz Ahmad Faiz
क़फ़स उदास है यारों सबास कुछ तो कहो कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले — Faiz Ahmad Faiz
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी — Faiz Ahmad Faiz
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए — Faiz Ahmad Faiz
जानता है कि वो न आएँगे फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल — Faiz Ahmad Faiz
'फ़ैज़' थी राह सर-ब-सर मंज़िल हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए — Faiz Ahmad Faiz
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम — Faiz Ahmad Faiz
अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम — Faiz Ahmad Faiz
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है — Faiz Ahmad Faiz
उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है, जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे — Faiz Ahmad Faiz
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए इस के बा'द आए जो अज़ाब आए — Faiz Ahmad Faiz

Ghazal

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है है ख़बर गर्म कि फिरता है गुरेज़ाँ नासेह गुफ़्तुगू आज सर-ए-कू-ए-बुताँ ठहरी है है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरीं का दहन निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है आते आते यूँँही दम भर को रुकी होगी बहार जाते जाते यूँँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में ईजाद 'फ़ैज़' गुलशन में वही तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है — Faiz Ahmad Faiz
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें चलो आओ तुम को दिखाएँ हम जो बचा है मक़्तल-ए-शहर में ये मज़ार अहल-ए-सफ़ा के हैं ये हैं अहल-ए-सिद्क़ की तुर्बतें मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें — Faiz Ahmad Faiz
रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे ख़याल-ए-यार कभी ज़िक्र-ए-यार करते रहे इसी मताअ' पे हम रोज़गार करते रहे नहीं शिकायत-ए-हिज्राँ कि इस वसीले से हम उन से रिश्ता-ए-दिल उस्तुवार करते रहे वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे ज़िया-ए-बज़्म-ए-जहाँ बार बार मांद हुई हदीस-ए-शोला-रुख़ाँ बार बार करते रहे उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे — Faiz Ahmad Faiz
कुछ मोहतसिबों की ख़ल्वत में कुछ वाइ'ज़ के घर जाती है हम बादा-कशों के हिस्से की अब जाम में कम-तर जाती है यूँँ अर्ज़-ओ-तलब से कम ऐ दिल पत्थर दिल पानी होते हैं तुम लाख रज़ा की ख़ू डालो कब ख़ू-ए-सितमगर जाती है बेदाद-गरों की बस्ती है याँ दाद कहाँ ख़ैरात कहाँ सर फोड़ती फिरती है नादाँ फ़रियाद जो दर दर जाती है हाँ जाँ के ज़ियाँ की हम को भी तशवीश है लेकिन क्या कीजे हर रह जो उधर को जाती है मक़्तल से गुज़र कर जाती है अब कूचा-ए-दिल-बर का रह-रौ रहज़न भी बने तो बात बने पहरे से अदू टलते ही नहीं और रात बराबर जाती है हम अहल-ए-क़फ़स तन्हा भी नहीं हर रोज़ नसीम-ए-सुब्ह-ए-वतन यादों से मोअत्तर आती है अश्कों से मुनव्वर जाती है — Faiz Ahmad Faiz
आज यूँँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया इस तरह ग़म-ज़दों को क़रार आ गया जैसे ख़ुश-बू-ए-ज़ुल्फ़-ए-बहार आ गई जैसे पैग़ाम-ए-दीदार-ए-यार आ गया जिस की दीद-ओ-तलब वहम समझे थे हम रू-ब-रू फिर सर-ए-रहगुज़ार आ गया सुब्ह-ए-फ़र्दा को फिर दिल तरसने लगा उम्र-ए-रफ़्ता तिरा ए'तिबार आ गया रुत बदलने लगी रंग-ए-दिल देखना रंग-ए-गुलशन से अब हाल खुलता नहीं ज़ख़्म छलका कोई या कोई गुल खिला अश्क उमडे कि अब्र-ए-बहार आ गया ख़ून-ए-उश्शाक़ से जाम भरने लगे दिल सुलगने लगे दाग़ जलने लगे महफ़िल-ए-दर्द फिर रंग पर आ गई फिर शब-ए-आरज़ू पर निखार आ गया सरफ़रोशी के अंदाज़ बदले गए दावत-ए-क़त्ल पर मक़्तल-ए-शहर में डाल कर कोई गर्दन में तौक़ आ गया लाद कर कोई काँधे पे दार आ गया 'फ़ैज़' क्या जानिए यार किस आस पर मुंतज़िर हैं कि लाएगा कोई ख़बर मय-कशों पर हुआ मोहतसिब मेहरबाँ दिल-फ़िगारों पे क़ातिल को प्यार आ गया — Faiz Ahmad Faiz
वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़याल-ए-रोज़-ए-जज़ा गया जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलू बना जो उठे थे हाथ लहू हुए वो नशात-ए-आह-ए-सहर गई वो वक़ार-ए-दस्त-ए-दुआ गया न वो रंग फ़स्ल-ए-बहार का न रविश वो अब्र-ए-बहार की जिस अदा से यार थे आश्ना वो मिज़ाज-ए-बाद-ए-सबा गया जो तलब पे अहद-ए-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई सर-ए-आम जब हुए मुद्दई' तो सवाब-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा गया अभी बादबान को तह रखो अभी मुज़्तरिब है रुख़-ए-हवा किसी रास्ते में है मुंतज़िर वो सुकूँ जो आ के चला गया — Faiz Ahmad Faiz

Nazm

"सोच" क्यूँ मेरा दिल शाद नहीं है क्यूँ ख़ामोश रहा करता हूँ छोड़ो मेरी राम-कहानी मैं जैसा भी हूँ अच्छा हूँ मेरा दिल ग़म-गीं है तो क्या ग़म-गीं ये दुनिया है सारी ये दुख तेरा है न मेरा हम सब की जागीर है पियारी तू गर मेरी भी हो जाए दुनिया के ग़म यूँही रहेंगे पाप के फंदे ज़ुल्म के बंधन अपने कहे से कट न सकेंगे ग़म हर हालत में मोहलिक है अपना हो या और किसी का रोना-धोना जी को जलाना यूँ भी हमारा यूँ भी हमारा क्यूँ न जहाँ का ग़म अपना लें बा'द में सब तदबीरें सोचें बा'द में सुख के सपने देखें सपनों की ताबीरें सोचें बे-फ़िकरे धन-दौलत वाले ये आख़िर क्यूँ ख़ुश रहते हैं इन का सुख आपस में बाँटें ये भी आख़िर हम जैसे हैं हम ने माना जंग कड़ी है सर फूटेंगे ख़ून बहेगा ख़ून में ग़म भी बह जाएँगे हम न रहें ग़म भी न रहेगा — Faiz Ahmad Faiz
वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ वो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ हज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशीं हर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगीं शबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसें वक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसें अदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बां बयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूम तवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूम वो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराए ज़बान-ए-शेर को ता'रीफ़ करते शर्म आए वो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोश बहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोश गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहीं वो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहीं किसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा था ब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा था और अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसीं है इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकीं हवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैं फ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मुयस्सर है — Faiz Ahmad Faiz
इक ज़रा सोचने दो इस ख़याबाँ में जो इस लहजा बयाबाँ भी नहीं कौन सी शाख़ में फूल आए थे सब से पहले कौन बे-रंग हुई रंज-ओ-तअब से पहले और अब से पहले किस घड़ी कौन से मौसम में यहाँ ख़ून का क़हत पड़ा गुल की शह-रग पे कड़ा वक़्त पड़ा सोचने दो सोचने दो इक ज़रा सोचने दो ये भरा शहर जो अब वादी-ए-वीराँ भी नहीं इस में किस वक़्त कहाँ आग लगी थी पहले इस के सफ़-बस्ता दरीचों में से किस में अव्वल ज़ह हुई सुर्ख़ शुआओं की कमाँ किस जगह जोत जगी थी पहले सोचने दो हम से उस देस का तुम नाम ओ निशाँ पूछते हो जिस की तारीख़ न जुग़राफ़िया अब याद आए और याद आए तो महबू-ए-गुज़िश्ता याद आए रू-ब-रू आने से जी घबराए हाँ मगर जैसे कोई ऐसे महबूब या महबूबा का दिल रखने को आ निकलता है कभी रात बिताने के लिए हम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँँही दिल से मिल आते हैं बस रस्म निभाने के लिए दिल की क्या पूछते हो सोचने दो — Faiz Ahmad Faiz
1 दूर जा कर क़रीब हो जितने हम से कब तुम क़रीब थे इतने अब न आओगे तुम न जाओगे वस्ल-ए-हिज्राँ बहम हुए कितने 2 चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का सहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रा'नाई का एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ कोई वा'दा कोई इक़रार मसीहाई का साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का 3 कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो अपने बस की बात ही क्या है हम से क्या मनवाओगे किस ने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उन को क्या जतलाओगे 'फ़ैज़' दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी तुम इस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर कितने दिन इतराओगे — Faiz Ahmad Faiz
जब दुख की नदिया में हम ने जीवन की नाव डाली थी था कितना कस-बल बाँहों में लोहू में कितनी लाली थी यूँँ लगता था दो हाथ लगे और नाव पूरम पार लगी ऐसा न हुआ, हर धारे में कुछ अन-देखी मंजधारें थीं कुछ माँझी थे अंजान बहुत कुछ बे-परखी पतवारें थीं अब जो भी चाहो छान करो अब जितने चाहो दोश धरो नदिया तो वही है, नाव वही अब तुम ही कहो क्या करना है अब कैसे पार उतरना है जब अपनी छाती में हम ने इस देस के घाव देखे थे था वेदों पर विश्वाश बहुत और याद बहुत से नुस्ख़े थे यूँँ लगता था बस कुछ दिन में सारी बिपता कट जाएगी और सब घाव भर जाएँगे ऐसा न हुआ कि रोग अपने कुछ इतने ढेर पुराने थे वेद इन की टोह को पा न सके और टोटके सब बे-कार गए अब जो भी चाहो छान करो अब जितने चाहो दोश धरो छाती तो वही है, घाव वही अब तुम ही कहो क्या करना है ये घाव कैसे भरना है — Faiz Ahmad Faiz
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से ज़ीना ज़ीना उतर रही है रात यूँँ सबा पास से गुज़रती है जैसे कह दी किसी ने प्यार की बात सहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जार सर-निगूँ महव हैं बनाने में दामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगार शाना-ए-बाम पर दमकता है मेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमील ख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूम नूर में घुल गया है अर्श का नील सब्ज़ गोशों में नील-गूँ साए लहलहाते हैं जिस तरह दिल में मौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए दिल से पैहम ख़याल कहता है इतनी शीरीं है ज़िंदगी इस पल ज़ुल्म का ज़हर घोलने वाले कामराँ हो सकेंगे आज न कल जल्वा-गाह-ए-विसाल की शमएँ वो बुझा भी चुके अगर तो क्या चाँद को गुल करें तो हम जानें — Faiz Ahmad Faiz
ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि सोगवार हो तू सकूँ की नींद तुझे भी हराम हो जाए तिरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाए तिरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाए ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा हुजूम-ए-यास से बेताब हो के रह जाए वुफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब हो के रह जाए तिरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाए ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरा तवील रातों में तू भी क़रार को तरसे तिरी निगाह किसी ग़म-गुसार को तरसे ख़िज़ाँ-रसीदा तमन्ना बहार को तरसे कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्दा पे ए'तिमाद करे ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि तुझ को याद आए वो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी है वो आँख जिस को तिरा इंतिज़ार अब भी है — Faiz Ahmad Faiz
तुम न आए थे तो हर इक चीज़ वही थी कि जो है आसमाँ हद्द-ए-नज़र राह-गुज़र राह-गुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय और अब शीशा-ए-मय राह-गुज़र रंग-ए-फ़लक रंग है दिल का मिरे ख़ून-ए-जिगर होने तक चम्पई रंग कभी राहत-ए-दीदार का रंग सुरमई रंग कि है साअत-ए-बेज़ार का रंग ज़र्द पत्तों का ख़स-ओ-ख़ार का रंग सुर्ख़ फूलों का दहकते हुए गुलज़ार का रंग ज़हर का रंग लहू रंग शब-ए-तार का रंग आसमाँ राह-गुज़र शीशा-ए-मय कोई भीगा हुआ दामन कोई दुखती हुई रग कोई हर लहजा बदलता हुआ आईना है अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग कोई रुत कोई शय एक जगह पर ठहरे फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है आसमाँ हद्द-ए-नज़र राह-गुज़र राह-गुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय — Faiz Ahmad Faiz