aaye kuchh abr kuchh sharaab aaye | आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

  - Faiz Ahmad Faiz

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के बाद आए जो अज़ाब आए

  - Faiz Ahmad Faiz

Maikada Shayari

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    मुझे ये फ़िक्र सब की प्यास अपनी प्यास है साक़ी
    तुझे ये ज़िद कि ख़ाली है मिरा पैमाना बरसों से
    Majrooh Sultanpuri
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    जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना
    हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँकर शराब-ए-आरिज़
    Ahmad Husain Mail
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    आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार
    लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर
    Jaleel Manikpuri
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    गरेबाँ चाक, धुआँ, जाम, हाथ में सिगरेट
    शब-ए-फ़िराक़, अजब हाल में पड़ा हुआ हूँ
    Hashim Raza Jalalpuri
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    खद्दर पहन के बेच रहा था शराब वो
    देखा मुझे तो हाथ में झंडा उठा लिया

    मैं भी कोई गँवार सिपाही न था जनाब
    मैंने भी जाम फेंक के डंडा उठा लिया
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    Paplu Lucknawi
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    लब हैं जैसे गुल सुमबुल रंग-ए-याक़ूती
    ख़ुद को मैख़ाना तितली का बना रखा है
    ALI ZUHRI
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    वो गुल-फ़रोश कहाँ अब गुलाब किस से लूँ
    नहीं रहा मिरा साक़ी शराब किस से लूँ
    Anwar Shaoor
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    मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
    कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

    क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
    ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

    तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
    काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

    डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझको
    भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

    सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
    तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

    फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
    बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

    सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
    दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में
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    Anis shah anis
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    फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिए 'मजरूह'
    शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने
    Majrooh Sultanpuri
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    हक़ीक़तों की तल्ख़ियाँ भी मीठे ख़्वाब की तरह
    मुझे शराब दे रही है वो गुलाब की तरह
    Rachit Sonkar

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As you were reading Shayari by Faiz Ahmad Faiz

    दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
    लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
    Faiz Ahmad Faiz
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    रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम
    मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम

    दोस्तो उस चश्म ओ लब की कुछ कहो जिस के बग़ैर
    गुलसिताँ की बात रंगीं है न मय-ख़ाने का नाम

    फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं
    फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम

    दिलबरी ठहरा ज़बान-ए-ख़ल्क़ खुलवाने का नाम
    अब नहीं लेते परी-रू ज़ुल्फ़ बिखराने का नाम

    अब किसी लैला को भी इक़रार-ए-महबूबी नहीं
    इन दिनों बदनाम है हर एक दीवाने का नाम

    मोहतसिब की ख़ैर ऊँचा है उसी के फ़ैज़ से
    रिंद का साक़ी का मय का ख़ुम का पैमाने का नाम

    हम से कहते हैं चमन वाले ग़रीबान-ए-चमन
    तुम कोई अच्छा सा रख लो अपने वीराने का नाम

    'फ़ैज़' उन को है तक़ाज़ा-ए-वफ़ा हम से जिन्हें
    आश्ना के नाम से प्यारा है बेगाने का नाम
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    Faiz Ahmad Faiz
    यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग
    यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग

    साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल
    सुर्ख़ी-ए-लब में परेशाँ तिरी आवाज़ का रंग

    बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब
    शीशा-ए-मय में ढले सुब्ह के आग़ाज़ का रंग

    चंग ओ नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
    दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग

    इक सुख़न और कि फिर रंग-ए-तकल्लुम तेरा
    हर्फ़-ए-सादा को इनायत करे ए'जाज़ का रंग
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    Faiz Ahmad Faiz
    चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का
    रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का

    दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ
    आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का

    गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ
    तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का

    सेहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ
    फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रानाई का

    एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ
    कोई वा'दा कोई इक़रार मसीहाई का

    दीदा ओ दिल को सँभालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़
    साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का
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    Faiz Ahmad Faiz
    इक फ़ुरसत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
    देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के
    Faiz Ahmad Faiz
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