Ahmad Husain Mail

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Ahmad Husain Mail shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Husain Mail's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जितने अच्छे हैं मैं हूँ उन में बुरा हैं बुरे जितने उन में अच्छा हूँ — Ahmad Husain Mail
मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई ग़ैरों में बट रहा है मिरा ए'तिबार आज — Ahmad Husain Mail
जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँँकर शराब-ए-आरिज़ — Ahmad Husain Mail

Ghazal

वो पारा हूँ मैं जो आग में हूँ वो बर्क़ हूँ जो सहाब में हूँ ज़मीं पे भी इज़्तिराब में हूँ फ़लक पे भी इज़्तिराब में हूँ न मैं हवा में न ख़ाक में हूँ न आग में हूँ न आब में हूँ शुमार मेरा नहीं किसी में अगरचे मैं भी हिसाब में हूँ अगरचे पानी की मौज बन कर हमेशा मैं पेच-ओ-ताब में हूँ वही हूँ क़तरा वही हूँ दरिया जो ऐन चश्म-ए-हबाब में हूँ सुलाया किस ने गले लगा कर कि सूर भी थक गया जगा कर बपा है आलम में शोर-ए-महशर मुझे जो देखो तो ख़्वाब में हूँ मज़ा है साक़ी तिरे करम से ज़ुहूर मेरा है तेरे दम से वो बादा हूँ जो हूँ मय-कदे में वो नश्शा हूँ जो शराब में हूँ इलाही वो गोरे गोरे तलवे कहीं न हो जाएँ मुझ से मैले कि ख़ाक बन कर ब-रंग-ए-सुर्मा हमेशा चश्म-ए-रिकाब में हूँ जो भेस अपना बदल के आया तो रंग-ए-इतलाक़ मुँह से धोया किया है पानी में क़ैद मुझ को हवा की सूरत हबाब में हूँ ग़ज़ब है जोश-ए-ज़ुहूर तेरा पुकारता है ये नूर तेरा ख़ुदा ने अंधा किया है जिस को उसी के आगे हिजाब में हूँ हुई है दोनों की एक हालत न चैन उस को न चैन मुझ को उधर वो है महव शोख़ियों में इधर जो मैं इज़्तिराब में हूँ इलाही मुझ पर करम हो तेरा न खोल आमाल-नामा मेरा पुकारता है ये ख़त्त-ए-क़िस्मत कि मैं भी फ़र्द-ए-हिसाब में हूँ दिमाग़ में हूँ क़दह-कशों के दहन में आया हूँ मह-वशों के नशा वो हूँ जो शराब में हूँ मज़ा वो हूँ जो कबाब में हूँ वो अपना चेहरा अगर दिखाए यक़ीन अंधों को ख़ाक आए पुकारती है ये बे-हिजाबी कि मैं अज़ल से हिजाब में हूँ अलाहदा कर के ख़ुद से मुझ को जो तू ने बख़्शा तो ख़ाक बख़्शा अगरचे जन्नत मुझे मिली है इलाही फिर भी अज़ाब में हूँ हुजूम नज़रों का है वो मुँह पर दिया है दोनो को जिस ने धोका यक़ीं ये मुझ को पड़ा है पर्दा गुमाँ ये उन को नक़ाब में हूँ जो मुझ को उस से जुदा करोगे तो मेरा नुक़सान क्या करोगे नहीं हूँ मानिंद-ए-सिफ़्र कुछ भी अगरचे मैं भी हिसाब में हूँ न आया मर कर भी चैन मुझ को उठा मिरी ख़ाक से बगूला बुतों का गेसू तो मैं नहीं हूँ इलाही क्यूँँ पेच-ओ-ताब में हूँ जो हाल पूछो तो इक कहानी निशान पूछो तो बे-निशानी वो ज़र्रा हूँ जो मिटा हुआ हूँ अगरचे मैं आफ़्ताब में हूँ मिटा अगरचे मज़ार मेरा छुटा न वो शहसवार मेरा पुकारता है ग़ुबार मेरा कि मैं भी हाज़िर रिकाब में हूँ करम की 'माइल' पे भी नज़र हो नज़र में फिर चुलबुला असर हो अज़ल से उम्मीद-वार मैं भी इलाही तेरी जनाब में हूँ — Ahmad Husain Mail
ज़मज़मा नाला-ए-बुलबुल ठहरे मैं जो फ़रियाद करूँँ ग़ुल ठहरे नग़्मा-ए-कुन के करिश्में देखो कहीं क़ुम क़ुम कहीं क़ुलक़ुल ठहरे जाल में कातिब-ए-आमाल फँसें दोश पर आ के जो काकुल ठहरे रात दिन रहती है गर्दिश उन को चाँद सूरज क़दह-ए-मुल ठहरे मेरा कहना तिरा सुनना मालूम जुम्बिश-ए-लब ही अगर गुल ठहरे जान कर भी वो न जानें मुझ को आरिफ़ाना ही तजाहुल ठहरे आशिक़ी में ये तनज़्ज़ुल कैसा आप हम क्यूँँ गुल-ओ-बुलबुल ठहरे तुझ पे खुल जाए जो राज़-ए-हमा-ऊस्त फ़लसफ़ी दूर ओ तसलसुल ठहरे आँख से आँख में पैग़ाम आए गर निगाहों का तवस्सुल ठहरे खुल गई बे-हमगी बा-हमगी कुल मैं जब महव हुए कुल ठहरे दिल से दिल बात करे आँख से आँख आशिक़ी का जो तवस्सुल ठहरे क्यूँँ न फ़िरदौस में जाए 'माइल' जब मोहम्मद का तवस्सुल ठहरे — Ahmad Husain Mail
वो बुत परी है निकालें न बाल-ओ-पर ता'वीज़ हैं दोनों बाज़ू पे इस के इधर उधर ता'वीज़ वो हम नहीं जो हों दीवाने ऐसे कामों से किसे पिलाते हो पानी में घोल कर ता'वीज़ उठेगा फिर न कलेजे में मीठा मीठा दर्द अगर लिखे मिरे दिल पर तिरी नज़र ता'वीज़ कहाँ वो लोग कि जिन के अमल का शोहरा था कुछ इस ज़माने में रखता नहीं असर ता'वीज़ पिलाया साँप को पानी जो मन निकाल लिया नहाने बैठे हैं चोटी से खोल कर ता'वीज़ वहाँ गया जो कोई दिल ही भूल कर आया रखे हैं गाड़ के उस ने इधर उधर ता'वीज़ पस-ए-फ़ना भी मोहब्बत का सिलसिला न मिटा तिरे गले में है और मेरी क़ब्र पर ता'वीज़ ये भेद है कि न मुर्दे डरें फ़रिश्तों से बना के क़ब्र बनाते हैं क़ब्र पर ता'वीज़ ये क्या कि ज़ुल्फ़ में रक्खा है बाँध कर मिरा दिल उसे भी घोल के पी जाओ जान कर ता'वीज़ जो चाँद से हैं बदन हैं वो चाँद तारों में गुलों में हैकलें हैकल के ता-कमर ता'वीज़ हुए हैं हज़रत-ए-'माइल' भी दिल में अब क़ाइल कुछ ऐसा लिखती है ऐ जाँ तिरी नज़र ता'वीज़ — Ahmad Husain Mail
निकली जो रूह हो गए अजज़ा-ए-तन ख़राब इक शम्अ' बुझ गई तो हुई अंजुमन ख़राब क्यूँँ डालता है ख़ाक कि होगा कफ़न ख़राब मैं हूँ सफ़ेद-पोश न कर पैरहन ख़राब जी में ये है कि दिल ही को सज्दे क्या करूँँ दैर-ओ-हरम में लोग हैं ऐ जान-ए-मन ख़राब नाज़ुक दिलों का हुस्न है रंग-ए-शिकस्तगी फटने से कब गुलों का हुआ पैरहन ख़राब दुनिया ने मुँह पे डाला है पर्दा सराब का होते हैं दौड़ दौड़ के तिश्ना-दहन ख़राब इबलीस से ये कहता है ला'नत का तौक़ रोज़ आदम ख़राब या सिफ़त मा-ओ-मन ख़राब क्या ख़ुशनुमा हो ख़िज़्र बढ़े गर लिबास-ए-उम्र क़द से जो हो दराज़ तो हो पैरहन ख़राब मेरा सलाम-ए-इश्क़ अलैहिस-सलाम को ख़ुसरव इधर ख़राब उधर कोहकन ख़राब यूसुफ़ के हुस्न ने ये ज़ुलेख़ा को दी सदा लो उँगलियाँ कटीं वो हुए ता'ना-ज़न ख़राब गर बस चले तो आप फिरूँ अपने गिर्द में का'बे को जा के कौन हो ऐ जान-ए-मन ख़राब ज़ख़्मी हुआ है नाम को दर-पर्दा हुस्न भी यूसुफ़ का ख़ून-ए-गुर्ग से है पैरहन ख़राब वा'दा किया है ग़ैर से और वो भी वस्ल का कुल्ली करो हुज़ूर हुआ है दहन ख़राब ऐ ख़ाक-ए-गोर देख न धब्बा लगे कहीं रख दूँ अभी उतार के गर हो कफ़न ख़राब कैसी भी हो ज़मीन अजब हल है तब-ए-तेज़ 'माइल' जो बोएँ हम न हो तुख़्म-ए-सुख़न ख़राब — Ahmad Husain Mail
समझ के हूर बड़े नाज़ से लगाई चोट जो उस ने आइना देखा तो ख़ुद ही खाई चोट नज़र लड़ी जो नज़र से तो दिल पर आई चोट गिरे कलीम सर-ए-तूर ऐसी खाई चोट लबों पे बन गई मिस्सी जो दिल पर आई चोट जगह बदल के लगी करने ख़ुद-नुमाई चोट बड़े दिमाग़ से मारा नज़र से जब मारा बड़े ग़ुरूर से आई जो दिल पर आई चोट किसी का तूर पे निकला है हाथ पर्दे से बड़ा मज़ा हो करे गर तिरी कलाई चोट ये दौड़-धूप लड़कपन की यक क़यामत है कि ठोकरों से क़यामत ने ख़ूब खाई चोट अभी उठी न थी नीची निगाह ज़ालिम की तड़प के दिल ने कहा वो जिगर पे आई चोट जो आए हश्र में वो सब को मारते आए जिधर निगाह फिरी चोट पर लगाई चोट जो दिल का आइना मल मल के हम ने साफ़ किया फिसल फिसल के तुम्हारी नज़र ने खाई चोट कलफ़ नहीं है निशाँ है ये चाँद-मारी का हमारे चाँद ने लो चाँद पर लगाई चोट ग़श आ रहा है मुझे ज़िक्र-ए-लन-तरानी से लगी है दिल पे मिरे लो सुनी-सुनाई चोट रुकेंगे क्या कफ़-ए-गुस्ताख़ दस्त-ए-रंगीं से कहीं न खाए तिरा पंजा-ए-हिनाई चोट दिल-ओ-जिगर को बता कर वो लोटना मेरा वो पूछना तिरा किस किस जगह पर आई चोट मरीज़-ए-हिज्र ये समझा जो चमकी चर्ख़ पे बर्क़ ये आग सेंकने लाई शब-ए-जुदाई चोट उठे तड़प के उठे तो गिरे गिरे तो मरे फड़क के रह गए वो चोट पर लगाई चोट पड़ेगी आह जो मेरी खुलेंगे बंद-ए-क़बा शब-ए-विसाल करेगी गिरह-कुशाई चोट गिरा हूँ ख़ुल्द से लंका में पहले तूर पे बा'द जहाँ जहाँ मैं गया साथ साथ आई चोट वो झाँक झाँक के लड़ते हैं मुझ से ये कह कर जो हम ने वार किया तुम ने क्यूँँ बचाई चोट जो दर्द दिल में उठा उन की याद खिच आई दिखाती है असर-ए-जज़्ब-ए-कहरुबाई चोट उठा उठा के दिल-ए-मुज़्तरिब ने दे टपका गिरा गिरा के मुझे चोट पर लगाई चोट निगाह-ए-शोख़ से जिस दम निगाह-ए-शौक़ लड़ी बड़ा ही लुत्फ़ रहा ये गई वो आई चोट लगाई उस ने जो ठोकर तो जी उठा 'माइल' निकल के जान फिर आई कुछ ऐसी खाई चोट — Ahmad Husain Mail
खड़े हैं मूसा उठाओ पर्दा दिखाओ तुम आब-ओ-ताब-ए-आरिज़ हिजाब क्यूँँ है कि ख़ुद तजल्ली बनी हुई है हिजाब-ए-आरिज़ न रुक सकेगी ज़िया-ए-आरिज़ जो सद्द-ए-रह हो नक़ाब-ए-आरिज़ वो होगी बे-पर्दा रख के पर्दा ग़ज़ब की चंचल है ताब-ए-आरिज़ छुपा न मुँह दोनों हाथ से यूँँ तड़पती है बर्क़-ए-ताब-ए-आरिज़ लगा न दे आग उँगलियों में ये गर्मी-ए-इज़्तिराब-ए-आरिज़ जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँँ कर शराब-ए-आरिज़ परी जो देखे कहे तड़प कर जो हूर देखे कहे फड़क कर तुम्हारा गेसू जवाब-ए-गेसू तुम्हारा आरिज़ जवाब-ए-आरिज़ हुज़ूर घुँघट उठा के आएँ बड़ी चमक किस में है दिखाएँ इधर रहे आफ़्ताब-ए-महशर उधर रहे आफ़्ताब-ए-आरिज़ छुपाना क्या एक का था मंज़ूर आज तक हैं जो चार मशहूर ज़बूर तौरेत मुसहफ़ इंजील पाँचवीं है किताब-ए-आरिज़ न क्यूँँ हो दा'वा बराबरी का वहाँ मिला तिल यहाँ सुवैदा ये नुक़्ता-ए-इंतिख़ाब-ए-दिल है वो नुक़्ता-ए-इंतिख़ाब-ए-आरिज़ पड़ा हूँ ग़श में मुझे सुँघा दो पसीना चेहरे का ज़ुल्फ़ की बू नहीं है कम लख़लख़े से मुझ को ये मुश्क-ए-गेसू गुलाब-ए-आरिज़ जो शो'ला-रू मुँह छुपा के निकला धुआँ सर-ए-राह कुछ कुछ उट्ठा लगी वो आतिश बने है जल कर नक़ाब-ए-आरिज़ कबाब-ए-आरिज़ न झेपो सुब्ह-ए-विसाल देखो तुम आँख से आँख तो मिलाओ लिए हैं गिन गिन के मैं ने बोसे ज़बान पर है हिसाब-ए-आरिज़ करो न ग़ुस्से से लाल चेहरा भवों में डालो न बल ख़ुदारा नहीं मजाल-ए-जलाल-ए-अबरू नहीं है ताब-ए-इताब-ए-आरिज़ जो गाल पर गाल हम रखेंगे शब-ए-विसाल उन के हाथ उठेंगे तमांचे मारेंगे प्यार से वो बजेंगे चंग-ओ-रुबाब-ए-आरिज़ कमर को गर्दन को दस्त-ओ-लब को विसाल में लुत्फ़ दे रहा है शबाब-ए-ज़ानू शबाब-ए-बाज़ू शबाब-ए-सीना शबाब-ए-आरिज़ जनाब-ए-'माइल' ये कूदक-ए-दिल बुतों की उल्फ़त में होगा कामिल पढ़ाओ क़ुरआँ के बदले इस को बयाज़-ए-गर्दन किताब-ए-आरिज़ — Ahmad Husain Mail
जुम्बिश में ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ गर्दिश में चश्म-ए-सेहर-ए-फ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ आरिज़ पे ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ हैं आज दो सूरज-गहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ मतलब इशारों से कहा मैं इन इशारों के फ़िदा आँखें भी हैं गर्म-ए-सुख़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ जिस दम सिकंदर मर गया हाल-ए-तही-दस्ती खुला थे हाथ बैरून-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ जाएगा दो हो कर ये दिल आधा इधर आधा उधर खींचेगी ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ ग़ैरों से खेल खेलो न तुम कर देंगे रुस्वा हश्र में हैं दो फ़रिश्ते जान-ए-मन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ आरिज़ पे सिमटे ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ुल्फ़ों के घूँगर वाले बाल है नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ शीरीं का ख़्वाहाँ हश्र में ख़ुसरव भी है फ़रहाद भी खींचेंगे दोनों पैरहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ घूंगट जो गालों से उठा तार-ए-नज़ारा जल गया सूरज थे दो जल्वा-फ़िगन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ क़ातिल इधर जर्राह उधर मैं नीम-बिस्मिल ख़ाक पर इक तीर-ए-कश इक तीर-ए-ज़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ आँखों के अंदर जाए ग़ैर आँखों के ऊपर है नक़ाब ख़ल्वत में हैं दो अंजुमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ वो हाथा-पाई हम ने की बिस्तर पे टूटे और गिरे बाज़ू के दोनों नव-रतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ पेश-ए-ख़ुदा रोज़-ए-जज़ा मैं भी हूँ चुप क़ातिल भी चुप गोया खड़े हैं बे-दहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ रुख़्सार पर ख़त का निशाँ गुल पर हुआ सब्ज़ा अयाँ हैं दोनों आरिज़ दो चमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ काफ़िर भी हूँ मोमिन भी हूँ जलना भी है गड़ना भी है खींचेंगे शैख़-ओ-बरहमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ घबरा न जाएँ दिल-जिगर है बंद तुर्बत में हवा पंखे हों दो नज़्द-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ यारब उठूँ जब क़ब्र से दो बुत रहें हम-रह मिरे ग़ारत-गर-ए-हिन्द-ओ-दकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ कहते हैं अनमोल उस को सब कहते हैं कुछ गोल उस को सब क्या चीज़ है ऐ जान-ए-मन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ जन्नत की हूरें आईं हैं 'माइल' दबाने मेरे पाँव बैठी हैं नज़दीक-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़ — Ahmad Husain Mail
चोरी से दो घड़ी जो नज़ारे हुए तो क्या चिलमन तो बीच में है इशारे हुए तो क्या बोसा-दही का लुत्फ़ मिला हुस्न बढ़ गया रुख़्सार लाल लाल तुम्हारे हुए तो क्या बे-पर्दा मुँह दिखा के मिरे होश उड़ाओ तुम पर्दे की आड़ से जो नज़ारे हुए तो क्या मुझ को कुढ़ा कुढ़ा के वो मारेंगे जान से दिलबर हुए तो क्या मिरे प्यारे हुए तो क्या ऐ जाँ मुक़ाबला मिरे हाथों से कब हुआ जौबन तिरे उभर के करारे हुए तो क्या उल्फ़त का लुत्फ़ क्या जो बग़ल ही न गर्म हो वो दिल में रहने वाले हमारे हुए तो क्या तासीर दे दुआ में ख़ुदा है यही दुआ ऊँचे जो दोनों हाथ हमारे हुए तो क्या बोसा न दे वो मुझ को तो मैं इस को दिल न दूँ इस गोरे हाथ से जो इशारे हुए तो क्या तुम सोओ फैल के फूलों की सेज पर फ़ुर्क़त में हम जो गोर किनारे हुए तो क्या सीना मिला के सीना से दिल में जगह करो फिरते हो जौबनों को उभारे हुए तो क्या कब खेलने पकड़ के हवा में से लाए वो जुगनू जो आह दल के शरारे हुए तो क्या ऐ जाँ है तेरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का हुस्न और हूरों के बाल हैं जो सँवारे हुए तो क्या आँखें खुली भी हूँ तो वही सामने रहे आँखों को बंद कर के नज़ारे हुए तो क्या लाखों मज़े मिलें मिरे लब से अगर मिलें वो गोरे गाल आँख के तारे हुए तो क्या यक बोसा और लूंगा अरक़ मुँह से पूछ कर वो आब आब शर्म के मारे हुए तो क्या 'माइल' न हो विसाल तो क्या इश्क़ का मज़ा माशूक़ दूर से वो हमारे हुए तो क्या — Ahmad Husain Mail
प्यार अपने पे जो आता है तो क्या करते हैं आईना देख के मुँह चूम लिया करते हैं वस्ल का लुत्फ़ मुझे वस्ल से पहले ही मिला जब कहा यार ने घबरा के ये क्या करते हैं इस क़दर था मुझे उल्फ़त में भरोसा उन पर की जफ़ा भी तो ये समझा कि वफ़ा करते हैं है यही अर्ज़ ख़ुदा से कि फुलाँ बुत मिल जाए वही अच्छे जो नमाज़ों में दुआ करते हैं लब किसी के जो हिले कान उधर ध्यान उधर दिल लगा कर वो मिरा ज़िक्र सुना करते हैं सुब्ह को देख के आईने में बोसे का निशाँ मुस्कुराते हुए होंटों में गिला करते हैं कैसे कैसे मुझे बे-साख़्ता मिलते हैं ख़िताब ग़ुस्सा आता है तो क्या क्या वो कहा करते हैं क्या हुआ मुझ को रक़ीबों ने अगर दी ताज़ीम तेरी महफ़िल में तो फ़ित्ने ही उठा करते हैं कान बातों की तरफ़ आँख है कामों की तरफ़ हो के अंजान मिरा ज़िक्र सुना करते हैं चीन पेशानी पे है मौज-ए-तबस्सुम लब में ऐसे हँसमुख हैं कि ग़ुस्से में हँसा करते हैं बस तो चलता नहीं कुछ कह के उन्हें क्यूँँ हों ज़लील हम तो अपना ही लहू आप पिया करते हैं इस इशारे के फ़िदा ऐसे तजाहुल के निसार मार कर आँख वो मुँह फेर लिया करते हैं जलसे ही जलसे हैं जब से वो हुए ख़ुद-मुख़्तार कोई इतना नहीं कहता कि ये क्या करते हैं आशिक़ाना है अक़ीदा भी हमारा 'माइल' ले के हम नाम-ए-बुताँ ज़िक्र-ए-ख़ुदा करते हैं — Ahmad Husain Mail
रू-ए-ताबाँ माँग मू-ए-सर धुआँ बत्ती चराग़ क्या नहीं इंसाँ की गर्दन पर धुआँ बत्ती चराग़ कुछ न पूछो ज़ाहिदों के बातिन-ओ-ज़ाहिर का हाल है अँधेरा घर में और बाहर धुआँ बत्ती चराग़ दूद-ए-अफ़्ग़ान-ओ-रग-ए-जान-ओ-सुवैदा दिल में है बंद है क़िंदील के अंदर धुआँ बत्ती चराग़ तूर पर जा कर चराग़-ए-तूर क्यूँँ देखे कोई क्या मकानों में नहीं पत्थर धुआँ बत्ती चराग़ हो मुआफ़िक़ क्यूँँकर ऐ परवाने साया-गुस्तरी है मुख़ालिफ़ ज़ेर-ए-बाल-ओ-पर धुआँ बत्ती चराग़ काँपता है हाथ तासीर-ए-दिल-ए-बेताब से मैं करूँँ रौशन तो हो मुज़्तर धुआँ बत्ती चराग़ सूरत-ए-बख़्शिश दिखावें काग़ज़-ओ-सत्र-ओ-हुरूफ़ हो अमल-नामा सर-ए-महशर धुआँ बत्ती चराग़ ख़िज़्र है बहरी मुसाफ़िर का मनार-ए-रौशनी है जहाज़ों के लिए रहबर धुआँ बत्ती चराग़ क्या ज़रूरत रौशनी की बे-ख़ुदी की बज़्म में ज़ुल्फ़-ए-साक़ी मौज-ए-मय साग़र धुआँ बत्ती चराग़ शो'ला-रूयों के मुक़ाबिल रंग जमता ही नहीं उड़ न जाए बज़्म से बन कर धुआँ बत्ती चराग़ किस सलीक़े से है रौशन महफ़िल-ए-अर्ज़-ओ-समा आसमाँ पर चाँद है घर घर धुआँ बत्ती चराग़ सुब्ह तक करते रहे रौशन दिलों से हम सेरी शाम से रौशन नफ़स हो कर धुआँ बत्ती चराग़ इश्क़ की गर्मी ने फूँका पर्दे पर्दे में मुझे मेरी चादर में मिरा बिस्तर धुआँ बत्ती चराग़ ज़ुल्फ़-ओ-रुख़सार-ओ-नज़र हैं दुश्मन-ए-ईमान-ओ-दीं लूटने निकले हैं वो ले कर धुआँ बत्ती चराग़ मैं वो ताइर हूँ जो हूँ कम-ख़र्च और बाला-नशीं एक जुगनू याँ है और घर घर धुआँ बत्ती चराग़ शब को 'माइल' वक़्त-ए-आराइश मुसाहिब थे यही फूल सुर्मा आइना ज़ेवर धुआँ बत्ती चराग़ — Ahmad Husain Mail
हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम देते हैं दिल इक आफ़त-ए-जाँ को था में हुए हाथों से जिगर हम ग़ैर को गर वो प्यार करेंगे अपने लहू में होंगे तर हम डाल ही देंगे उन के क़दम पर काट कर अपने हाथ से सर हम सुल्ह हुई तो नाले खींचे यूँँ करते हैं सब को ख़बर हम पीटते हैं सीने का ढिंढोरा देते हैं दिल बार-ए-दिगर हम और मिलेंगे छोड़ न देंगे सुन के सदा-ए-मुर्ग़-ए-सहर हम हल्क़ा दोनों हाथ का अपने डाल रखेंगे गिर्द-ए-कमर हम दिल के अंदर तूर के ऊपर चश्म-ए-सनम में ऐन हरम में तेरी ही सूरत तेरी ही मूरत पूजने जाएँ तुझ को किधर हम राज़ छुपते तो आग़ाज़ अच्छा भेद खुले तो अंजाम अच्छा मिस्ल-ए-सिकंदर भेस बदल कर जाते हैं बन कर नामा-बर हम अंदाज़ा गो कर ही चुके हैं आ जाती है मुट्ठी में ये आज मगर बे-पर्दा करेंगे देखेंगे पतली सी कमर हम लाते ही कुछ रंग-ए-जवानी आँख से यूँँ कीं आँख ने बातें आओ दिखाएँ सब को घातें शो'बदा-गर तुम जादूगर हम कहती हैं ज़ुल्फ़ें मुश्कीं कस लें कोई जो डाले हाथ कमर में फैल के सोओ डर क्या तुम को गश्त करेंगे गिर्द-ए-कमर हम लुत्फ़ बड़ा हो और मज़ा हो इस के एवज़ गर आप को पाएँ बैठ के अपने घर के अंदर ढूँढ़ रहे हैं यार का घर हम तुम को नज़ाकत और ख़ुदा दे हम को लज़्ज़त और ख़ुदा दे पाएँचे तुम चुटकी से उठा लो था में हुए चलते हैं कमर हम उठता जोबन झुकती गर्दन दबती बातें रुकती घातें हाए न क्यूँँ सौ जाँ से फ़िदा हों इन चारों पर उठ फिर हम साया बन कर साथ चलेंगे साथ फिरेंगे साथ रहेंगे अपने घर में ग़ैर के दिल में जाओ जिधर तुम आएँ उधर हम जल्द तुम उट्ठो दौड़ के आओ हम को थामो हम को सँभालो गिरते हैं मिस्ल-ए-अश्क ज़मीं पर उठते हैं शक्ल-ए-दर्द-ए-जिगर हम सब से छुड़ा कर लाए उड़ा कर क्या न रखेंगे दिल में छुपा कर रहने बसने चलने फिरने तुम को ख़ुदा का देंगे घर हम मुँह जो खुलेगा रंज बढ़ेगा हम से न बोलो हम को न छेड़ो काहीदा-तन आज़ुर्दा-जान आशुफ़्ता-दिल ख़स्ता-जिगर हम ये तो छपर-खट छोटा सा है पहलू में तुम सोओगे क्यूँँकर आओ लिटा लें सीने पर हम तुम को सुला लें छाती पर हम रंज गर आया हो तो भुला दे प्यार बढ़ा दे हम से मिला दे उन की निगह से तो गिर तो चुके हैं जाएँ न यारब दिल से उतर हम देख के उन का जौबन उभरा मैं ने कहा ये माल है अच्छा बोले वो क्या तुम लूट ही लोगे गोद में यूँँ आ जाएँ अगर हम ठहरी है बाहम लुत्फ़ की बाज़ी पहले जो पाए जीत उसी की वस्ल की शब है ढूँढ़ रहे हैं दिल वो हमारा उन की कमर हम रोज़ नए दिल लाएँ कहाँ से ऐसे तोहफ़े पाएँ कहाँ से चाट पड़ी है तुम को दिलों की लूटने जाएँ किस का घर हम ग़ैर के बर में उन को देखा ख़ाक में जाए ऐसा नज़ारा हाथ में कम-बख़्त आ नहीं सकता तोड़ते वर्ना तार-ए-नज़र हम नश्व-ओ-नुमा पाई है दकन में क़द्र हमारी क्यूँँकर होगी घर की मुर्ग़ी दाल बराबर किस को दिखाएँ अपना हुनर हम क्यूँँ न करे दीवाना किसी को शर्म की आदत हुस्न की शोख़ी हो गए 'माइल' देख के माइल उठता जोबन झुकती नज़र हम — Ahmad Husain Mail
क्या रोज़-ए-हश्र दूँ तुझे ऐ दाद-गर जवाब आमाल-नामे का तो है पेशानी पर जवाब रुक रुक के हँस के यूँँ ही तो दे फ़ित्ना-गर जवाब देता है और लुत्फ़ मुझे तेरा हर जवाब किस से मिसाल दूँ तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को उम्र-ए-तवील-ए-ख़िज़्र है इक मुख़्तसर जवाब मुश्किल के वक़्त दिल ही से कुछ मशवरा करें क्यूँँ दें किसी को ग़ैर से हम पूछ कर जवाब करते हैं सज्दा नक़्श-ए-क़दम को तमाम लोग है ख़ाना-ए-ख़ुदा का तिरी रहगुज़र जवाब मुनकिर-नकीर पूछते हैं डाँट डाँट कर हों मुंतशिर हवा से तो क्या दे बशर जवाब ख़ुल्द-ओ-सक़र के बीच में है कोई इश्क़-ए-यार है पुल-सिरात का ये मिरी रहगुज़र जवाब क्यूँँ सर झुका रहा है ज़रा आँख तो मिला देगी मिरे सवाल का तेरी नज़र जवाब ग़ुस्से में यूँँ न आओ कि ग़ुस्सा हराम है तुम बात ही से बात का दो सोच कर जवाब ज़र्रों की तरह ख़ाक में हैं आशिक़ों के दिल गर तू करे सवाल तो दे रहगुज़र जवाब मैं ने किया सलाम तो चिलमन में छुप गए दर-पर्दा देगी अब निगह-ए-पर्दा-दर जवाब हंगामा हश्र का सिफ़त-ए-गर्द रह गया तेरे ख़िराम का न हुआ फ़ित्ना-गर जवाब क्या अपने भोले-पन से कहें दम में आए हो हर बात का जो देते हो अब सोच कर जवाब क्या होगा ख़ाक हो के सर-ए-चर्ख़ जाएगा ये ज़ेर-ए-पा सवाल वो बाला-ए-सर जवाब लिक्खा है मुझ को हो गया तेरा लहू सफ़ेद मैं भी लिखूँगा ख़ून से सर फोड़ कर जवाब बेहोश कर के पूछते हो दिल का मुद्दआ' देता भी है हुज़ूर कहीं बे-ख़बर जवाब ग़ुस्से से कुछ कहूँ तो वो किस तरह चुप रहे इक बात का जो शाम से दे ता-सहर जवाब चितवन से ताड़ जाते हैं 'माइल' का मुद्दआ' दिल में इधर सवाल है लब पर उधर जवाब — Ahmad Husain Mail
कोई हसीन है मुख़्तार-ए-कार-ख़ाना-ए-इश्क़ कि ला-मकाँ ही की चौखट है आस्ताना-ए-इश्क़ निगाहें ढूँढ़ रही हैं दिल-ए-यगाना-ए-इश्क़ इशारे पूछ रहे हैं कहाँ है ख़ाना-ए-इश्क़ फिरेंगे हश्र में गर्द-ए-दिल-ए-यगाना-ए-इश्क़ करेंगे पेश-ए-ख़ुदा हम तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-इश्क़ नई सदा हो नए होंठ हों नया लहजा नई ज़बाँ से कहूँ गर कहूँ फ़साना-ए-इश्क़ जो मौलवी हैं वो लिक्खेंगे कुफ़्र के फ़तवे सुनाऊँ सूरत-ए-मंसूर अगर तराना-ए-इश्क़ अगर लगे तो लगे चोट मेरे नाले की अगर पड़े तो पड़े दिल पे ताज़ियाना-ए-इश्क़ जो डाल दें उसे पत्थर पे भी फले-फूले दरख़्त-ए-तूर बने सब्ज़ हो के दाना-ए-इश्क़ तुम्हीं कहो जो लुटा दें तो कौन ख़ाली हो ख़ज़ाना हुस्न का अफ़्ज़ूँ है या ख़ज़ाना-ए-इश्क़ वो रात आए कि सर तेरा ले के बाज़ू पर तुझे सुलाऊँ बयाँ कर के मैं फ़साना-ए-इश्क़ वो दर तक आते नहीं दर से हम नहीं उठते उधर बहाना-ए-हुस्न और इधर बहाना-ए-इश्क़ सिखाई किस ने ये रफ़्तार मेरे नाले को कमर की तरह लचकता है ताज़ियाना-ए-इश्क़ किसी को प्यार करेगा शबाब में तू भी तिरे भी घर में जलेगा चराग़-ए-ख़ाना-ए-इश्क़ जो ख़ुश-नवीस मिले कोई देंगे दिल अपना हम इस किताब में लिखवाएँगे फ़साना-ए-इश्क़ गए हैं वो मिरी महफ़िल में भूल कर रूमाल ये जा-नमाज़ बिछा कर पढ़ूँ दोगाना-ए-इशक़ किसी के हुस्न ने काफ़िर बना दिया 'माइल' लगा के क़श्क़ा-ए-दुर्द-ए-शराब-ख़ाना-ए-इश्क़ — Ahmad Husain Mail
शब-ए-माह में जो पलंग पर मिरे साथ सोए तो क्या हुए कभी लिपटे बन के वो चाँदनी कभी चाँद बन के जुदा हुए हुए वक़्त-ए-आख़िरी मेहरबाँ दम-ए-अव्वलीं जो ख़फ़ा हुए वो अबद में आ के गले मिले जो अज़ल में हम से जुदा हुए ये इलाही कैसा ग़ज़ब हुआ वो समाए मुझ में तो क्या हुए मिरा दिल बने तो तड़प गए मिरा सर बने तो जुदा हुए चले साथ साथ क़दम क़दम कोई ये न समझा कि हैं बहम कभी धूप बन के लिपट गए कभी साया बन के जुदा हुए अभी हैं ज़माने से बे-ख़बर रखा हाथ रक्खे ये लाश पर उठो बस उठो कहा मान लो मिरी क्या ख़ता जो ख़फ़ा हुए हैं अजीब मुर्ग़-ए-शिकस्ता-पर न चमन में घर न क़फ़स में घर जो गिरे तो साया हैं ख़ाक पर जो उठे तो मौज-ए-हवा हुए वो अरक़ अरक़ हुए जिस घड़ी मुझे उम्र-ए-ख़िज़्र अता हुई शब-ए-वस्ल क़तरे पसीने के मिरे हक़ में आब-ए-बक़ा हुए कभी शक्ल-ए-आइना रू-ब-रू कभी तूती और कभी गुफ़्तुगू कभी शख़्स बन के गले मिले कभी अक्स बन के जुदा हुए न तजल्लियाँ हैं न गर्मियाँ न शरारतें हैं न फुर्तियाँ हमा-तन थे दिन को तो शोख़ियाँ हमा-तन वो शब को हया हुए मिरे नाले हैं कि अज़ल अबद तिरे इश्वे हैं कि लब-ए-मसीह वहाँ कुन का ग़लग़ला वो बने यहाँ क़ुम की ये जो सदा हुए गिरे ज़ात में तो है जुमला-ऊस्त उठे जब सिफ़त में हमा-अज़-दस्त कहा कौन हो तो मिले रहे कहा नाम क्या तो जुदा हुए किए उस ने बज़्म में शो'बदे मली मेहंदी हाथ पे शम्अ' के जो पतंगे रात को जल गए वो तमाम मुर्ग़-ए-हिना हुए मिरे दिल के देखो तो वलवले कि हर एक रंग में जा मिली जो घटे तो उन का दहन बने जो बढ़े तो अर्ज़-ओ-समा हुए वही फ़र्श-ओ-अर्श-नशीं रहे हुए नाम अलग जो कहीं रहे गए दैर में तो सनम बने गए ला-मकाँ तो ख़ुदा हुए जो तसव्वुर उन का जुदा हुआ दिल बे-ख़बर ने ये दी सदा अभी हम-बग़ल थे किधर गए अभी गोद में थे वो क्या हुए कभी सोज़िशें कभी आफ़तें कभी रंजिशें कभी राहतें मिलीं चार हम को ये नेअ'मतें तिरे इश्क़ में जो फ़ना हुए हमें शौक़ ये कि हो एक तौर उसे ज़ौक़ ये कि हो शक्ल और बने आग तो बुझे आब में मिले ख़ाक में तो हवा हुए गए सर से जबकि वो ता-कमर तो अलिफ़ इधर का हुआ उधर तिरा जोड़ा खुलते ही बाल सब पस-ए-पुश्त आ के बला हुए कोई दब गया कोई मर गया कोई पिस गया कोई मिट गया तिरे इश्वे से जब से फ़लक बने तिरे ग़म्ज़े जब से क़ज़ा हुए मुझे गुदगुदी से ग़श आ गया तो हिला के शाना यही कहा अभी हँसते थे अभी मर गए अभी क्या थे तुम अभी क्या हुए कहो काफ़िरों से करें ख़ुशी कि ये मसअला है तनासुख़ी मिरे नाले ख़ाक में जब मिले तो सुबू के दस्त-ए-दुआ हुए पस-ए-वस्ल हम जो सरक गए तो वो खिलखिला के फड़क गए कहा शोख़ियों ने चलो हटो कि हुज़ूर तुम से ख़फ़ा हुए तुम्हें लोग कहते हैं नौजवाँ कि हो बीस तीस के दरमियाँ कहो मुझ से 'माइल'-ए-ख़ुश-बयाँ वो तुम्हारे वलवले क्या हुए — Ahmad Husain Mail
आफ़्ताब आए चमक कर जो सर-ए-जाम-ए-शराब रिंद समझें कि है सादिक़ सहर-ए-जाम-ए-शराब सब के हाथों पे था शब-भर सफ़र-ए-जाम-ए-शराब हर ख़त-ए-दस्त बना रह-गुज़र-ए-जाम-ए-शराब दुख़्तर-ए-रज़ पे गिरें मस्त पतंगों की तरह शम-ए-महफ़िल हो ये लख़्त-ए-जिगर-ए-जाम-ए-शराब थाम ले दस्त-ए-सुबू आए जो चलने में लचक ख़त-ए-बग़दाद हो मू-ए-कमर-ए-जाम-ए-शराब तूर-ए-सीना का गुमाँ हो ख़ुम-ए-मय पर सब को इस तरह होश उड़ाओ असर-ए-जाम-ए-शराब साग़र-ए-मय में नहीं परतव-ए-ख़ाल-ए-साक़ी है कफ़-ए-दुख़्तर-ए-रज़ में सिपर-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक मय-ख़ाने की बन जाती क़यामत पिस कर हर क़दम पर जो लचकती कमर-ए-जाम-ए-शराब आज मय-नोशों का मजमा' है कहाँ ऐ साक़ी कौन सी बज़्म में है शोर-ओ-शर-ए-जाम-ए-शराब जितने मय-ख़्वार हैं साक़ी से गले मिलते हैं सहर-ए-ईद बनी है ख़बर-ए-जाम-ए-शराब शीशा-ए-मय से उड़ा काग कबूतर की तरह नामा पहुँचाने चला नामा-बर-ए-जाम-ए-शराब मौज-ए-सहबा पे गिरा सपना-ए-मीना उड़ कर है मिरे सामने तेग़-ओ-सिपर-ए-जाम-ए-शराब मय पिलाता है अगर ढाँप ले सीना साक़ी तेरे जोबन को लगेगी नज़र-ए-जाम-ए-शराब आफ़्ताब आ के सिखाता है चलन शब-भर का रात को होता है अक्सर गुज़र-ए-जाम-ए-शराब दस्त-ए-साक़ी में रहे दस्त-ए-क़दह-कश में रहे गर्दन-ए-शीशा-ए-सहबा कमर-ए-जाम-ए-शराब मस्त करते हैं दो-आलम को यही दो ख़ुद-मस्त लज़्ज़त-ए-नग़मा-ए-मुतरिब असर-ए-जाम-ए-शराब क्या ग़ज़ब है कि तिरा होंठ न चूसे 'माइल' और हो तेरे लबों तक गुज़र-ए-जाम-ए-शराब — Ahmad Husain Mail
क्यूँँ शौक़ बढ़ गया रमज़ाँ में सिंगार का रोज़ा न टूट जाए किसी रोज़ा-दार का उन का वो शोख़ियों से फड़कना पलंग पर वो छातियों पे लोटना फूलों के हार का हूर आए ख़ुल्द से तो बिठाऊँ कहाँ उसे आरास्ता हो एक तो कोना मज़ार का शीशों ने तर्ज़ उड़ाई रुकू ओ क़याम की क्या इन में है लहू किसी परहेज़-गार का क्यूँँ ग़श हुए कलीम तजल्ली-ए-तूर पर वो इक चराग़ था मिरे दल के मज़ार का बअ'द-ए-फ़ना भी साफ़ नहीं दिल रक़ीब से गुम्बद खड़ा हुआ है लहद पर ग़ुबार का कसरत का रंग शाहिद-ए-वहदत का है बनाव वो एक ही से नाम है हज़दा हज़ार का नाक़ूस बिन के पूछने जाऊँ अगर मिज़ाज बुत भी कहेंगे शुक्र है परवरदिगार का दूल्हा की ये बरात है रस्में अदा करो दर पर जनाज़ा आया है इक जाँ-निसार का क्या क्या तड़प तड़प के सराफ़ील गिर पड़े दम आ गया जो सूर में मुझ बे-क़रार का सुर्मा के साथ फैल के क्या वो भी मिट गया क्यूँँ नाम तक नहीं तिरी आँखों में प्यार का क्या रात से किसी की नज़र लग गई इसे अच्छा नहीं मिज़ाज दिल-ए-बे-क़रार का आँखें मिरी फ़क़ीर हुईं शौक़-ए-दीद में तस्मा कमर में है निगह-ए-इंतिज़ार का लूटूँ मज़े जो बाज़ी-ए-शतरंज जीत लूँ इस खेल में तो वा'दा है बोस-ए-कनार का अल्लाह मिरा ग़फ़ूर मोहम्मद मिरे शफ़ीअ' 'माइल' को ख़ौफ़ कुछ नहीं रोज़-ए-शुमार का — Ahmad Husain Mail
महशर में चलते चलते करूँँगा अदा नमाज़ पढ़ लूंगा पुल-सिरात पे 'माइल' क़ज़ा नमाज़ सर जाए उम्र भर की हो यारब अदा नमाज़ आए मिरी क़ज़ा तो पढ़ूँ मैं क़ज़ा नमाज़ माँगी नजात हिज्र से तो मौत आ गई रोज़े गले पड़े जो छुड़ाने गया नमाज़ देखो कि फँस न जाएँ फ़रिश्ते भी जाल में क्यूँँ पढ़ रहे हो खोल के ज़ुल्फ़-ए-रसा नमाज़ हर इक सुतून ख़ाना-ए-शर-ए-शरीफ़ है रोज़ा हो या ज़कात हो या हज हो या नमाज़ ये क्यूँँ ख़मीदा है सिफ़त-ए-साहब-ए-रुकू क्या पढ़ रही है दोश पे ज़ुल्फ़-ए-दोता नमाज़ निय्यत जो बाँध ली तो चला मैं हुज़ूर में रहबर मिरी नमाज़ मिरी रहनुमा नमाज़ साक़ी क़याम से ये जो आया रूकूअ' में शीशा ख़ुदा के ख़ौफ़ से पढ़ता है क्या नमाज़ उठ उठ के बैठ बैठ के करता है क्यूँँ ग़ुरूर ज़ाहिद कहीं बढ़ाए न तेरी रिया नमाज़ अरकान याद हैं मुझे ऐ दावर-ए-जज़ा गर हुक्म हो तो सामने पढ़ लूँ क़ज़ा नमाज़ शैतान बन गया है फ़रिश्ता ग़ुरूर से क्या फ़ाएदा हुआ जो पढ़ी जा-ब-जा नमाज़ ले जाते हैं मुझे सू-ए-दोज़ख़ कशाँ कशाँ रोज़े मिरे इधर हैं उधर है क़ज़ा नमाज़ हक़्क़-उल-यक़ीं का नाम उरूज-ए-मक़ाम है पढ़ते हैं औलिया सर-ए-दोश-ए-हवा नमाज़ मस्जिद में पाँच वक़्त दुआ वो भी वस्ल की 'माइल' बुतों के वास्ते पढ़ते हो क्या नमाज़ — Ahmad Husain Mail