nikli jo rooh ho ga.e ajzaa-e-tan kharab | निकली जो रूह हो गए अजज़ा-ए-तन ख़राब

  - Ahmad Husain Mail

निकली जो रूह हो गए अजज़ा-ए-तन ख़राब
इक शम्अ' बुझ गई तो हुई अंजुमन ख़राब

क्यूँँ डालता है ख़ाक कि होगा कफ़न ख़राब
मैं हूँ सफ़ेद-पोश न कर पैरहन ख़राब

जी में ये है कि दिल ही को सज्दे क्या करूँँ
दैर-ओ-हरम में लोग हैं ऐ जान-ए-मन ख़राब

नाज़ुक दिलों का हुस्न है रंग-ए-शिकस्तगी
फटने से कब गुलों का हुआ पैरहन ख़राब

दुनिया ने मुँह पे डाला है पर्दा सराब का
होते हैं दौड़ दौड़ के तिश्ना-दहन ख़राब

इबलीस से ये कहता है ला'नत का तौक़ रोज़
आदम ख़राब या सिफ़त मा-ओ-मन ख़राब

क्या ख़ुशनुमा हो ख़िज़्र बढ़े गर लिबास-ए-उम्र
क़द से जो हो दराज़ तो हो पैरहन ख़राब

मेरा सलाम-ए-इश्क़ अलैहिस-सलाम को
ख़ुसरव इधर ख़राब उधर कोहकन ख़राब

यूसुफ़ के हुस्न ने ये ज़ुलेख़ा को दी सदा
लो उँगलियाँ कटीं वो हुए ता'ना-ज़न ख़राब

गर बस चले तो आप फिरूँ अपने गिर्द में
का'बे को जा के कौन हो ऐ जान-ए-मन ख़राब

ज़ख़्मी हुआ है नाम को दर-पर्दा हुस्न भी
यूसुफ़ का ख़ून-ए-गुर्ग से है पैरहन ख़राब

वा'दा किया है ग़ैर से और वो भी वस्ल का
कुल्ली करो हुज़ूर हुआ है दहन ख़राब

ऐ ख़ाक-ए-गोर देख न धब्बा लगे कहीं
रख दूँ अभी उतार के गर हो कफ़न ख़राब

कैसी भी हो ज़मीन 'अजब हल है तब-ए-तेज़
'माइल' जो बोएँ हम न हो तुख़्म-ए-सुख़न ख़राब

  - Ahmad Husain Mail

Raaz Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ahmad Husain Mail

As you were reading Shayari by Ahmad Husain Mail

Similar Writers

our suggestion based on Ahmad Husain Mail

Similar Moods

As you were reading Raaz Shayari Shayari