Ameer Minai

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Ameer Minai shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ameer Minai's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो — Ameer Minai
बोसा लिया जो उस लब-ए-शीरीं का मर गए दी जान हम ने चश्मा-ए-आब-ए-हयात पर — Ameer Minai
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है — Ameer Minai
शब-ए-विसाल बहुत कम है आसमाँ से कहो कि जोड़ दे कोई टुकड़ा शब-ए-जुदाई का — Ameer Minai
बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी हैं एक कम-सिन के लिए — Ameer Minai
वस्ल हो जाए यहीं हश्र में क्या रक्खा है आज की बात को क्यूँँ कल पे उठा रक्खा है — Ameer Minai
मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र आज आप एक बात मेरी मान जाइए — Ameer Minai
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा — Ameer Minai
अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो न छेड़ूँगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो — Ameer Minai
आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है — Ameer Minai
कौन उठाएगा तुम्हारी ये जफ़ा मेरे बा'द याद आएगी बहुत मेरी वफ़ा मेरे बा'द — Ameer Minai
माँग लूँ तुझ से तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है — Ameer Minai
'अमीर' अब हिचकियाँ आने लगी हैं कहीं मैं याद फ़रमाया गया हूँ — Ameer Minai
पुतलियाँ तक भी तो फिर जाती हैं देखो दम-ए-नज़अ वक़्त पड़ता है तो सब आँख चुरा जाते हैं — Ameer Minai
बाक़ी न दिल में कोई भी या रब हवस रहे चौदह बरस के सिन में वो लाखों बरस रहे — Ameer Minai
तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है — Ameer Minai
जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता — Ameer Minai
आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है — Ameer Minai
हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी क्यूँँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी — Ameer Minai
तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर — Ameer Minai

Ghazal

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब साथ ख़ंजर के चलेगी वक़्त-ए-ज़ब्ह अपनी ज़बान जान देने वाले देते हैं बराबर का जवाब सज्दा करता हूँ जो मैं ठोकर लगाता है वो बुत पाँव उस का बढ़ के देता है मिरे सर का जवाब अब्र के टुकड़े न उलझें मेरी मौज-ए-अश्क से ख़ुश्क मग़्ज़ों से है मुश्किल मिस्रा-ए-तर का जवाब वो खिंचा था मैं भी खिंच रहता तो बनती किस तरह सर झुका देता था क़ातिल तेरे ख़ंजर का जवाब जीते-जी मुमकिन नहीं उस शोख़ का ख़त देखना ब'अद मेरे आएगा मेरे मुक़द्दर का जवाब शैख़ कहता है बरहमन को बरहमन उस को सख़्त का'बा ओ बुत-ख़ाना में पत्थर है पत्थर का जवाब रोज़ दिखलाता है गर्दूं कैसी कैसी सूरतें बुत-तराशी में है ये काफ़िर भी आज़र का जवाब हर जगह क़ब्र-ए-गदा तकिए में हर जा गोर-ए-शाह एक घर इस शहर में है दूसरे घर का जवाब जल्वा-गर है नूर-ए-हक़ होने से यकताई 'अमीर' साया भी होता अगर होता पयम्बर का जवाब — Ameer Minai
क्या रोके क़ज़ा के वार तावीज़ क़िल'अ है न कुछ हिसार तावीज़ चोटी में है मुश्क-बार तावीज़ या फ़ित्ना-ए-रोज़गार तावीज़ दोनों ने न दर्द-ए-दिल मिटाया गंडे का है रिश्ता-दार तावीज़ क्या नाद-ए-अली में भी असर है चारों टुकड़े हैं चार तावीज़ डरता हूँ न सुब्ह हो शब-ए-वस्ल है महर वो ज़र-निगार तावीज़ हम को भी हो कुछ उमीद-ए-तस्कीं खोए जो तप-ए-ख़यार तावीज़ पत्तां को जड़ हमारी पहुँची गाड़ा तह-ए-पा-ए-यार तावीज़ हाजत नहीं उन को नौ-रतन की बाज़ू पे हैं पाँच चार तावीज़ खटके वो न आए फ़ातिहे को देखा जो सर-ए-मज़ार तावीज़ पी जाएँगे घोल कर किसे आप है नक़्श न ख़ाकसार तावीज़ ऐ तुर्क टलें बलाएँ सर से इक तेग़ का ख़त-ए-हज़ार तावीज़ डर है तुम्हें कंकनों से लाज़िम लाया तो है सादा-कार तावीज़ इक्सीर का नुस्ख़ा इस को समझूँ खोए जो तिरा ग़ुबार तावीज़ मजमा है 'अमीर' की लहद पर मेले का है इश्तिहार तावीज़ — Ameer Minai
तिरा क्या काम अब दिल में ग़म-ए-जानाना आता है निकल ऐ सब्र इस घर से कि साहिब-ख़ाना आता है नज़र में तेरी आँखें सर में सौदा तेरी ज़ुल्फ़ों का कई परियों के साए में तिरा दीवाना आता है वफ़ूर-ए-रहमत-ए-बारी है मय-ख़्वारों पे इन रोज़ों जिधर से अब्र उठता है सू-ए-मय-ख़ाना आता है लगी दिल की बुझाए बेकसी में कौन है ऐसा मगर इक गिर्या-ए-हसरत कि बे-ताबाना आता है उन्हीं से ग़म्ज़े करती है जो तुझ पर जान देते हैं अजल तुझ को भी कितना नाज़-ए-मअशूक़ाना आता है परेशानी में ये आलम तिरी ज़ुल्फ़ों का देखा है कि इक इक बाल पर क़ुर्बान होने शाना आता है छलक जाता है जाम-ए-उम्र अपना वाए-नाकामी हमारे मुँह तलक साक़ी अगर पैमाना आता है वो बुत ही मेहरबाँ सब अपना अपना हाल कहते हैं लब-ए-ख़ामोश तुझ को भी कोई अफ़्साना आता है तिलिस्म-ए-ताज़ा तेरा साया-ए-दीवार रखता है बदलता है परी का भेस जो दीवाना आता है ये अज़्मत रह के ज़ाहिद इन बुतों में हम ने पाई है कि का'बा हम को लेने ता-दर-ए-मय-ख़ाना आता है दो-रंगी से नहीं ख़ाली अदम भी सूरत-ए-हस्ती कोई होश्यार आता है कोई दीवाना आता है हुमा यूँँ उस्तुख़्वान-ए-सोख़्ता पर मेरे गिरता है तड़प कर शम्अ' पर जैसे कोई परवाना आता है उधर हैं हुस्न की घातें इधर हैं इश्क़ की बातें तुझे अफ़्सूँ तो मुझ को उसे परी अफ़्साना आता है कलेजा हाथ से अहल-ए-तमअ के चाक होता है सदफ़-आसा अगर मुझ को मुयस्सर दाना आता है नमक जल्लाद छिड़का चाहता है मेरे ज़ख़्मों पर मज़े का वक़्त अब ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना आता है ज़बरदस्ती का धड़का वस्ल में तुम को समाया है किधर हो होश में आओ कोई आया न आता है इलाही किस की शम्-ए-हुस्न से रौशन है घर मेरा कि बन जाता है जुगनू आज जो परवाना आता है वो आशिक़ ख़ाल-ओ-ख़त का हूँ नज़्र-ए-मोर करता हूँ मुयस्सर तीसरे दिन भी जो मुझ को दाना आता है 'अमीर' और आने वाला कौन है गोर-ए-ग़रीबाँ पर जो रौशन शम्अ' होती है तो हाँ परवाना आता है — Ameer Minai
कुछ ख़ार ही नहीं मिरे दामन के यार हैं गर्दन में तौक़ भी तो लड़कपन के यार हैं सीना हो कुश्तगान-ए-मोहब्बत का या गला दोनों ये तेरे ख़ंजर-ए-आहन के यार हैं ख़ातिर हमारी करता है दैर-ओ-हरम में कौन हम तो न शैख़ के न बरहमन के यार हैं क्या पूछता है मुझ से निशाँ सैल-ओ-बर्क़ का दोनों क़दीम से मिरे ख़िर्मन के यार हैं क्या गर्म हैं कि कहते हैं ख़ूबान-ए-लखनऊ लंदन को जाएँ वो जो फिरंगन के यार हैं वो दुश्मनी करें तो करें इख़्तियार है हम तो अदू के दोस्त हैं दुश्मन के यार हैं कुछ इस चमन में सब्ज़ा-ए-बेगाना हम नहीं नर्गिस के दोस्त लाला-ओ-सौसन के यार हैं काँटे हैं जितने वादी-ए-ग़ुर्बत के ऐ जुनूँ सब आस्तीं के जेब के दामन के यार हैं गुम-गश्तगी में राह बताता है हम को कौन है ख़िज़्र जिन का नाम वो रहज़न के यार हैं चलते हैं शौक़-ए-बर्क़-ए-तजल्ली में क्या है ख़ौफ़ चीते तमाम वादी-ए-ऐमन के यार हैं पीरी मुझे छुड़ाती है अहबाब से 'अमीर' दंदाँ नहीं ये मेरे लड़कपन के यार हैं — Ameer Minai
पिला साक़िया अर्ग़वानी शराब कि पीरी में दे नौजवानी शराब वो शो'ला है साक़ी कि रंजक की तरह उड़ा देती है ना-तवानी शराब कहाँ बादा-ए-ऐश तक़दीर में पि यूँँ मैं तो हो जाए पानी शराब न लाया है शीशा न जाम-ओ-सुबू पिलाता है साक़ी ज़बानी शराब कहाँ अक़्ल-ए-बर्ना कहाँ अक़्ल-ए-पीर नए से है बेहतर पुरानी शराब मिरे चेहरा-ए-ज़र्द के अक्स से हुई साक़िया ज़ा'फ़रानी शराब हुए मस्त देखा जो फूलों का रंग पियालों में थी अर्ग़वानी शराब कहाँ चश्मा-ए-ख़िज़्र कैसे ख़िज़र ख़िज़र है मिरी ज़िंदगानी शराब ख़िज़र हूँ अगर मैं तो जा कर पि यूँँ सर-ए-चश्मा-ए-ज़िंदगानी शराब गुलिस्ताँ है फूलों से क्या लाल लाल चले साक़िया अर्ग़वानी शराब अजब साक़िया गंदुमी रंग है कि परतव से बनती है धानी शराब रहे ताक़ पर पारसाई 'अमीर' पिलाए जो वो यार-ए-जानी शराब — Ameer Minai
हम लोटते हैं वो सो रहे हैं क्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं क्या रंग जहाँ में हो रहे हैं दो हँसते हैं चार रो रहे हैं दुनिया से अलग जो हो रहे हैं तकियों में मज़े से सो रहे हैं पहुँची है हमारी अब ये हालत जो हँसते थे वो भी रो रहे हैं तन्हा तह-ए-ख़ाक भी नहीं हम हसरत के साथ सो रहे हैं सोते हैं लहद में सोने वाले जो जागते हैं वो रो रहे हैं अरबाब-ए-कमाल चल बसे सब सौ में कहीं एक दो रहे हैं पलकों की झपक दिखा के ये बुत दिल में नश्तर चुभो रहे हैं मुझ दाग़-नसीब की लहद पर लाले का वो बीज बो रहे हैं पीरी में भी हम हज़ार अफ़्सोस बचपन की नींद सौ रहे हैं दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्ती आब-ए-ख़ंजर से दो रहे हैं में जाग रहा हूँ ए शब-ए-ग़म पर मेरे नसीब सौ रहे हैं रोएँगे हमें रुलाने वाले डूबेंगे वो जो डुबो रहे हैं ऐ हश्र मदीने में न कर शोर चुप चुप सरकार सौ रहे हैं आईने पे भी कड़ी निगाहें किस पर ये इताब हो रहे हैं भारी है जो मोतियों का माला आठ आठ आँसू वो रो रहे हैं दिल छीन के हो गए हैं ग़ाफ़िल फ़ित्ने वो जगा के सौ रहे हैं है ग़ैर के घर जो इन की दावत हम जान से हाथ धो रहे हैं सद शुक्र ख़याल है उसी का हम जिस से लिपट के सौ रहे हैं हो जाएँ न ख़ुश्क दाग़ के फूल आँसू उन को भिगो रहे हैं आएगी न फिर के उम्र-ए-रफ़्ता हम मुफ़्त में जान खो रहे हैं क्या गिर्या-ए-बे-असर से हासिल इस रोने पे हम तो रो रहे हैं फ़रियाद कि नाख़ुदा-ए-कश्ती कश्ती को मिरी डुबो रहे हैं क्यूँ करते हैं ग़म-गुसार तकलीफ़ आँसू मिरे मुँह को धो रहे हैं महफ़िल बरख़ास्त है पतंगे रुख़्सत शम्ओं' से हो रहे हैं है कोच का वक़्त आसमाँ पर तारे कहीं नाम को रहे हैं उन की भी नुमूद है कोई दम वो भी न रहेंगे जो रहे हैं दुनिया का ये रंग और हम को कुछ होश नहीं है सो रहे हैं ठहरो दम-ए-नज़्अ' दो घड़ी और दो चार नफ़स ही तो रहे हैं फूल उन को पिन्हा पिन्हा के अग़्यार काँटे मिरे हक़ में बो रहे हैं ज़ानू पे 'अमीर' सर को रक्खे पहरों गुज़रे कि रो रहे हैं — Ameer Minai
तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है — Ameer Minai
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं फ़िराक़ में तिरे आशिक़ को जा के कल देखा कि वो तो हेच था कुछ अश्क थे कुछ आहें थीं बगूले अब हैं कि ग़ुर्बत है गोर-ए-शाहाँ पर सरों पे चत्र जिलौ में कभी सिपाहें थीं हज़ारों लोट गए कल उठी जो वो चिलमन ख़दंग मूए-ए-मिज़ा बर्छियाँ निगाहें थीं किया ये शौक़ ने अंधा मुझे न सूझा कुछ वगर्ना रब्त की उस से हज़ार राहें थीं ये ज़ोफ़ है कि निकलती नहीं हैं अब दिल से कभी फ़लक से भी ऊँची हमारी आहें थीं जिगर में हिज्र की कल चुभ रही थीं कुछ फ़ाँसें मगर जो ग़ौर से देखा तिरी निगाहें थीं पहुँच गए सर-ए-मंज़िल चले जो चाल नई उन्हीं में फेर था देखी हुई जो राहें थीं फ़लक के दौर से दुनिया बदल गई वर्ना जहाँ बने हैं ये मय-ख़ाने ख़ान-क़ाहें थीं ये ज़ोफ़ अब है कि हिलना गिराँ है क़दमों को सुबुक-रवी में कभी इन को दस्तगाहें थीं मुशाएरे से हसीं क्यूँँ न छीन ले जाते रुबाइयाँ मिरी चू गो शुबह कुलाहें थीं हसीन ज़र के हैं तालिब कि अब हैं गिर्द-ए-'अमीर' ग़रीब हम थे तो ये प्यार था न चाहें थीं — Ameer Minai
किस के चमके चाँद से रुख़्सार क़ैसर-बाग़ में चाँदनी है साया-ए-दीवार क़ैसर-बाग़ में फ़िल-हक़ीक़त ये भी कम गुलज़ार-ए-जन्नत से नहीं हूरें फिरती हैं सर-ए-बाज़ार क़ैसर-बाग़ में पाँव का याँ ज़िक्र कैसा साफ़ है ऐसी ज़मीं दिल फिसलते हैं दम-ए-रफ़्तार क़ैसर-बाग़ में ज़ेर-ए-शाख़-ए-गुल अगर सब्ज़ा कभी सोने लगा शोर-ए-बुलबुल ने किया बेदार क़ैसर-बाग़ में इतने पत्ते भी न होंगे गुलशन-ए-फ़िरदौस में जिस क़दर फूलों के हैं अम्बार क़ैसर-बाग़ में तिश्नगान-ए-शौक़ हैं शीरीं-लबों के मेहमाँ बट रहा है शर्बत-ए-दीदार क़ैसर-बाग़ में क़तरे शबनम के रग-ए-गुल पर दिखाते हैं बहार गुँध रहे हैं मोतियों के हार क़ैसर-बाग़ में साया-ए-बाल-ए-हुमा क्या ढूँढ़ता है ऐ 'अमीर' बैठ ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार क़ैसर-बाग़ में — Ameer Minai
या-रब शब-ए-विसाल ये कैसा गजर बजा अगले पहर के साथ ही पिछ्ला पहर बजा आवाज़-ए-सूर सुन के कहा दिल ने क़ब्र में किस की बरात आई ये बाजा किधर बजा कहते हैं आसमाँ जो तुम्हारे मकाँ को हम कहता है आफ़्ताब दुरुस्त और क़मर बजा जागो नहीं ये ख़्वाब का मौक़ा मुसाफ़िरो नक़्क़ारा तक भी कोच का वक़्त-ए-सहर बजा तामीर मक़बरे की है लाज़िम बजाए-क़स्र ज़र-दारों से कहो कि करें सर्फ़-ए-ज़र बजा हैं हम तो शादमाँ कि है ख़त में पयाम-ए-वस्ल बग़लें ख़ुशी से तू भी तो ऐ नामा-बर बजा तुझ को नहीं जो उन से मोहब्बत कहाँ मुझे ताली न एक हाथ से ऐ बे-ख़बर बजा नफ़रत है ये ख़ुशी से कि अश्क अपने गिर पड़े हम-राह ताज़िया के भी बाजा अगर बजा जा-ए-क़याम मंज़िल-ए-हस्ती न थी 'अमीर' उतरे थे हम सिरा में कि कोस-ए-सफ़र बजा — Ameer Minai
वादा-ए-वस्ल और वो कुछ बात है हो न हो इस में भी कोई घात है ख़ल्क़ नाहक़ दरपय-ए-इसबात है है दहन उस का कहाँ इक बात है बोसा-ए-चाह-ए-ज़नख़दाँ ग़ैर लें डूब मरने की ये ऐ दिल बात है घर से निकले हो निहत्ते वक़्त-ए-क़त्ल ये भी बहर-ए-क़त्ल-ए-आशिक़ घात है मैं ने इतना ही कहा बनवाओ ख़त ये बिगड़ने की भला क्या बात है ब'अद मुद्दत बख़्त जागे हैं मिरे बैठे हैं सोने को सारी रात है क्या करूँँ वस्फ़-ए-बुतान-ए-ख़ुद-पसंद इन से बढ़ कर बस ख़ुदा की ज़ात है बातों बातों में जो मैं कुछ कह गया हँस के फ़रमाने लगे क्या बात है हर्फ़-ए-मतलब साफ़ कह सकता नहीं है अदब माने कि पहली रात है मुझ से हो इज़हार-ए-उल्फ़त वाह-वा आप के फ़रमाने की ये बात है रो रहे हैं हम मिला दे लब से लब मय-कशी हो साक़िया बरसात है ज़च है तेरी चाल से रफ़्तार-ए-चर्ख़ मोहर-ए-रुख़ से बाज़ी-ए-मह मात है कैसी कटती है सियह-बख़्ती में उम्र रात से दिन दिन से बद-तर रात है छेड़ता है दिल को क्या ऐ दर्द-ए-हिज्र ख़ुद गिरफ़्तार-ए-हज़ार-आफ़ात है ऐ ग़नी दे सीम-ओ-ज़र वक़्त-ए-बला माल-ए-दुनिया जान की ख़ैरात है गर जगह दिल में नहीं फिर इस से क्या ये दोशम्बे की ये बुध की रात है साफ़ कह दे तू यहाँ आया न कर यार ये सौ बात की इक बात है लख़्त-ए-दिल हैं मेरे खाने को 'अमीर' बस इन्हीं टुकड़ों पे अब औक़ात है — Ameer Minai
गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी कहाँ ग़ुंचा कहाँ उस का दहन तंग बढ़ाई शाइरों ने बात थोड़ी उठे क्या ज़ानू-ए-ग़म से सर अपना बहुत गुज़री रही हैहात थोड़ी ख़याल-ए-ज़ब्त-ए-गिर्या है जो हम को बहुत इमसाल है बरसात थोड़ी पिलाए ले के नक़द-ए-होश साक़ी तही-दस्तों की है औक़ात थोड़ी वही है आसमाँ पर गंज-ए-अंजुम मिली थी जो तिरी ख़ैरात थोड़ी तिरा ऐ दुख़्त-ए-रज़ वासिफ़ है वाइज़ पए-हुर्मत है इतनी बात थोड़ी चलो मंज़िल 'अमीर' आँखें तो खोलो निहायत रह गई है रात थोड़ी — Ameer Minai
शमशीर है सिनाँ है किसे दूँ किसे न दूँ इक जान-ए-ना-तवाँ है किसे दूँ किसे न दूँ मेहमान इधर हुमा है उधर है सग-ए-हबीब इक मुश्त उस्तुखाँ है किसे दूँ किसे न दूँ दरबाँ हज़ार उस के यहाँ एक नक़्द-ए-जाँ माल इस क़दर कहाँ है किसे दूँ किसे न दूँ बुलबुल को भी है फूलों की गुलचीं को भी तलब हैरान बाग़बाँ है किसे दूँ किसे न दूँ सब चाहते हैं उस से जो वा'दा विसाल का कहता है वो ज़बाँ है किसे दूँ किसे न दूँ शहज़ादी दुख़्त-ए-रज़ के हज़ारों हैं ख़्वास्त-गार चुप मुर्शिद-ए-मुग़ाँ है किसे दूँ किसे न दूँ यारों को भी है बोसे की ग़ैरों को भी तलब शश्दर वो जान-ए-जाँ है किसे दूँ किसे न दूँ दिल मुझ से माँगते हैं हज़ारों हसीं 'अमीर' कितना ये अरमुग़ाँ है किसे दूँ किसे न दूँ — Ameer Minai
हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा की नज़र रू-ए-किताबी पे तो कुछ दिल ठहरा मक्तब-ए-शौक़ भी क़ुरआन की मंज़िल ठहरा निगहत-ए-गुल से परेशान हुआ उस का दिमाग़ ख़ंदा-ए-गुल न हुआ शोर-ए-अनादिल ठहरा नज्द से क़ैस जो आया मरे ज़िंदाँ की तरफ़ देर तक गोश-बर-आवाज़-ए-सलासिल ठहरा हुस्न जिस तिफ़्ल का चमका वो हुआ बाइस-ए-क़त्ल जिस ने तलवार सँभाली मिरा क़ातिल ठहरा ख़त जो निकला रुख़-ए-जानाँ पे मिला बोसा-ए-ख़ाल यही दाना फ़क़त इस किश्त का हासिल ठहरा अलम इक नुक़्ता जो मशहूर था ऐ जोश-ए-जुनूँ ग़ौर से की जो नज़र नुक़्ता-ए-बातिल ठहरा दूर जब तक थे तड़पता था में कैसा कैसा पास आ कर वो जो ठहरे तो मिरा दिल ठहरा कसरत-ए-दाग़ से गुल-दस्ता बना दिल तो क्या ज़ीनत-ए-बाग़ न आराइश-ए-महफ़िल ठहरा दौड़ता क़ैस भी आता है निहायत ही क़रीब इक ज़रा नाक़े को ऐ साहिब-ए-महमिल ठहरा दम जो बेताब था मुद्दत से मिरे सीने में तेग़-ए-क़ातिल के तले कुछ दम-ए-बिस्मिल ठहरा हम बड़ी दूर से आए हैं तुम्हारा है ये हाल घर से दरवाज़े तक आना कई मंज़िल ठहरा अब तक आती है सदा तुर्बत-ए-लैला से 'अमीर' सारबान अब तो ख़ुदा के लिए महमिल ठहरा — Ameer Minai
चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़ — Ameer Minai
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा बराबर आईने के भी न समझे क़द्र वो दिल की इसे ज़ेर-ए-क़दम रक्खा उसे पेश-ए-नज़र रक्खा मिटाए दीदा-ओ-दिल दोनों मेरे अश्क-ए-ख़ूनीं ने अजब ये तिफ़्ल अबतर था न घर रक्खा न दर रक्खा तुम्हारे संग-ए-दर का एक टुकड़ा भी जो हाथ आया अज़ीज़ ऐसा किया मर कर उसे छाती पे धर रक्खा जिनाँ में साथ अपने क्यूँँ न ले जाऊँगा नासेह को सुलूक ऐसा ही मेरे साथ है हज़रत ने कर रक्खा न की किस ने सिफ़ारिश मेरी वक़्त-ए-क़त्ल क़ातिल से कमाँ ने हाथ जोड़े तेग़ ने क़दमों पे सर रक्खा ग़ज़ब बरसे वो मेरे आते ही मालूम होता है जगह ख़ाली जो पाई यार को ग़ैरों ने भर रक्खा बड़ा एहसाँ है मेरे सर पे उस की लग़्ज़िश-ए-पा का कि इस ने बे-तहाशा हाथ मेरे दोश पर रक्खा ज़मीं में दाना-ए-गंदुम सदफ़ में हम हुए गौहर हमारे इज्ज़ ने हर मअ'रका में हम को दर रक्खा तिरे हर नक़्श-ए-पा को रहगुज़र में सज्दा-गह समझे जहाँ तू ने क़दम रक्खा वहाँ मैं ने भी सर रक्खा अमीर अच्छा शगून-ए-मय किया साक़ी की फ़ुर्क़त में जो बरसा अब्र-ए-रहमत जा-ए-मय शीशों में भर रक्खा — Ameer Minai
साफ़ कहते हो मगर कुछ नहीं खुलता कहना बात कहना भी तुम्हारा है मुअम्मा कहना रो के उस शोख़ से क़ासिद मिरा रोना कहना हँस पड़े उस पे तो फिर हर्फ़-ए-तमन्ना कहना मसल-ए-मक्तूब न कहने में है क्या क्या कहना न मिरी तर्ज़-ए-ख़मोशी न किसी का कहना और थोड़ी सी शब-ए-वस्ल बढ़ा दे या-रब सुब्ह नज़दीक हमें उन से है क्या क्या कहना फाड़ खाता है जो ग़ैरों को झपट कर सग-ए-यार मैं ये कहता हूँ मिरे शे'र तिरा क्या कहना हर बुन-ए-मू-ए-मिज़ा में हैं यहाँ सौ तूफ़ाँ ऐन ग़फ़लत है मरी आँख को दरिया कहना वस्फ़-ए-रुख़ में जो सुने शे'र वो हँस कर बोले शे'र हैं नूर के है नूर का तेरा कहना ला सकोगे न ज़रा जल्वा-ए-दीदार की ताब अरिनी मुँह से न ऐ हज़रत-ए-मूसा कहना कर लिया अहद कभी कुछ न कहेंगे मुँह से अब अगर सच भी कहें तुम हमें झूटा कहना ख़ाक में ज़िद से मिलाओ न मिरे आँसू को सच्चे मोती को मुनासिब नहीं झूटा कहना कैसे नादाँ हैं जो अच्छों को बुरा कहते हैं हो बुरा भी तो उसे चाहिए अच्छा कहना दम-ए-आख़िर तू बुतो याद ख़ुदा करने दो ज़िंदगी भर तो किया मैं ने तुम्हारा कहना पढ़ते हैं देख के उस बुत को फ़रिश्ते भी दरूद मर्हबा सल्ले-अला सल्ले-अला क्या कहना ऐ बुतो तुम जो अदा आ के करो मस्जिद में लब-ए-मेहराब कहे नाम-ए-ख़ुदा क्या कहना इन हसीनों की जो ता'रीफ़ करो चिढ़ते हैं सच तो ये है कि बुरा है उन्हें अच्छा कहना शौक़ काबे लिए जाता है हवस जानिब-ए-दैर मेरे अल्लाह बजा लाऊँ में किस का कहना सारी महफ़िल को इशारों में लुटा दो ऐ जान सीख लो चश्म-ए-सुख़न-गो से लतीफ़ा कहना घटते घटते में रहा इश्क़-ए-कमर में आधा जामा-ए-तन को मिरे चाहिए नीमा कहना में तो आँखों से बजा लाता हूँ इरशाद-ए-हुज़ूर आप सुनते नहीं कानों से भी मेरा कहना चुस्ती-ए-तब्अ से उस्ताद का है क़ौल 'अमीर' हो ज़मीं सुस्त मगर चाहिए अच्छा कहना — Ameer Minai