maani hain main ne saikron baatein tamaam umr | मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र

  - Ameer Minai

मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र
आज आप एक बात मेरी मान जाइए

  - Ameer Minai

Anjam Shayari

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    अब बिछड़ने पर समझ पाते हैं हम इक दूसरे को
    इम्तिहाँ के ख़त्म हो जाने पे हल याद आ रहा है
    Nishant Singh
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    तमाम शहर की ख़ातिर चमन से आते हैं
    हमारे फूल किसी के बदन से आते हैं
    Farhat Ehsaas
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    मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ
    ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
    Bashir Badr
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    चाँद सा मिस्रा अकेला है मिरे काग़ज़ पर
    छत पे आ जाओ मिरा शेर मुकम्मल कर दो
    Bashir Badr
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    तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ
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    सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
    अब किसे रात भर जगाती है
    Jaun Elia
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    अब मिरा ध्यान कहीं और चला जाता है
    अब कोई फ़िल्म मुकम्मल नहीं देखी जाती
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    दिल के तमाम ज़ख़्म तेरी हाँ से भर गए
    जितने कठिन थे रास्ते वो सब गुज़र गए
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    यूँ दिल को तड़पने का कुछ तो है सबब आख़िर
    या दर्द ने करवट ली या तुम ने इधर देखा
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    इसलिए भी घर का दरवाज़ा खुला रखता हूँ मैं
    Tousief Tabish
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As you were reading Shayari by Ameer Minai

    अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है
    हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है

    तुझ से माँगूँ मैं तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए
    सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है

    देख ले बुलबुल ओ परवाना की बेताबी को
    हिज्र अच्छा न हसीनों का विसाल अच्छा है

    आ गया उस का तसव्वुर तो पुकारा ये शौक़
    दिल में जम जाए इलाही ये ख़याल अच्छा है

    आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब
    वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है

    बर्क़ अगर गर्मी-ए-रफ़्तार में अच्छी है 'अमीर'
    गर्मी-ए-हुस्न में वो बर्क़-जमाल अच्छा है
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    Ameer Minai
    कहा जो मैं ने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था
    तो हँस के बोले वो मुँह क़ाबिल-ए-नक़ाब न था

    शब-ए-विसाल भी वो शोख़ बे-हिजाब न था
    नक़ाब उलट के भी देखा तो बे-नक़ाब न था

    लिपट के चूम लिया मुँह मिटा दिया उन का
    नहीं का उन के सिवा इस के कुछ जवाब न था

    मिरे जनाज़े पे अब आते शर्म आती है
    हलाल करने को बैठे थे जब हिजाब न था

    नसीब जाग उठे सो गए जो पाँव मिरे
    तुम्हारे कूचे से बेहतर मक़ाम-ए-ख़्वाब न था

    ग़ज़ब किया कि इसे तू ने मोहतसिब तोड़ा
    अरे ये दिल था मिरा शीशा-ए-शराब न था

    ज़माना वस्ल में लेता है करवटें क्या क्या
    फ़िराक़-ए-यार के दिन एक इंक़लाब न था

    तुम्हीं ने क़त्ल किया है मुझे जो तनते हो
    अकेले थे मलक-उल-मौत हम-रिकाब न था

    दुआ-ए-तौबा भी हम ने पढ़ी तो मय पी कर
    मज़ा ही हम को किसी शय का बे-शराब न था

    मैं रू-ए-यार का मुश्ताक़ हो के आया था
    तिरे जमाल का शैदा तो ऐ नक़ाब न था

    बयान की जो शब-ए-ग़म की बेकसी तो कहा
    जिगर में दर्द न था दिल में इज़्तिराब न था

    वो बैठे बैठे जो दे बैठे क़त्ल-ए-आम का हुक्म
    हँसी थी उन की किसी पर कोई इताब न था

    जो लाश भेजी थी क़ासिद की भेजते ख़त भी
    रसीद वो तो मिरे ख़त की थी जवाब न था

    सुरूर-ए-क़त्ल से थी हाथ पाँव को जुम्बिश
    वो मुझ पे वज्द का आलम था इज़्तिराब न था

    सबात बहर-ए-जहाँ में नहीं किसी को 'अमीर'
    इधर नुमूद हुआ और उधर हुबाब न था
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    Ameer Minai
    दिल को तर्ज़-ए-निगह-ए-यार जताते आए
    तीर भी आए तो बे-पर की उड़ाते आए

    बादशाहों का है दरबार दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ
    सैकड़ों जाते गए सैकड़ों आते आए

    छुप के भी आए मिरे घर तो वो दरबानों को
    अपनी पाज़ेब की झंकार सुनाते आए

    रोज़-ए-महशर जो बुलाए गए दीवाना-ए-ज़ुल्फ़
    बेड़ियाँ पहने हुए शोर मचाते आए

    क्या कहेंगे कोई महशर में जो पूछेगा 'अमीर'
    क्यूँ न बिगड़ी हुई बातों को बनाते आए
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    Ameer Minai
    दिल जुदा माल जुदा जान जुदा लेते हैं
    अपने सब काम बिगड़ कर वो बना लेते हैं

    हो ही रहता है किसी बुत का नज़ारा ता-शाम
    सुब्ह को उठ के जो हम नाम-ए-ख़ुदा लेते हैं

    मजलिस-ए-वाज़ में जब बैठते हैं हम मय-कश
    दुख़्तर-ए-रज़ को भी पहलू में बिठा लेते हैं

    ऐसे बोसे के एवज़ माँगते हैं दिल क्या ख़ूब
    जी में सोचें तो वो क्या देते हैं क्या लेते हैं

    अपनी महफ़िल से उठाए हैं अबस हम को हुज़ूर
    चुपके बैठे हैं अलग आप का क्या लेते हैं

    बुत भी क्या चीज़ हैं अल्लाह सलामत रक्खे
    गालियाँ दे के ग़रीबों की दुआ लेते हैं

    शाख़-ए-मर्जां में जवाहर नज़र आते हैं 'अमीर'
    कभी उँगली जो वो दाँतों में दबा लेते हैं
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    Ameer Minai
    कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं
    नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है
    Ameer Minai
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