Arzoo Lakhnavi

Arzoo Lakhnavi

@arzoo-lakhnavi

📍 Lucknow· India

Arzoo Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Arzoo Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

35

Content

43

Likes

580

Shayari
Audios
  • Sher(23)
  • Ghazal(20)

Sher

हद से टकराती है जो शय वो पलटती है ज़रूर ख़ुद भी रोएँगे ग़रीबों को रुलाने वाले — Arzoo Lakhnavi
आँसू पोंछ के हँस देता है आग में आग लगाने वाला — Arzoo Lakhnavi
आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई — Arzoo Lakhnavi
दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया समझे थे हम जिसे ख़लील का'बा उसी ने ढा दिया — Arzoo Lakhnavi
मोहब्बत वहीं तक है सच्ची मोहब्बत जहाँ तक कोई अहद-ओ-पैमाँ नहीं है — Arzoo Lakhnavi
कह के ये और कुछ कहा न गया कि मुझे आप से शिकायत है — Arzoo Lakhnavi
ख़मोशी मेरी मअनी-ख़ेज़ थी ऐ आरज़ू कितनी कि जिस ने जैसा चाहा वैसा अफ़्साना बना डाला — Arzoo Lakhnavi
भोली बातों पे तेरी दिल को यक़ीं पहले आता था अब नहीं आता — Arzoo Lakhnavi
भोले बन कर हाल न पूछ बहते हैं अश्क तो बहने दो जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो — Arzoo Lakhnavi
जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते मोहब्बत दीन होती है वफ़ा ईमान होती है — Arzoo Lakhnavi
फिर चाहे तो न आना ओ आन बान वाले झूटा ही वअ'दा कर ले सच्ची ज़बान वाले — Arzoo Lakhnavi
किस काम की ऐसी सच्चाई जो तोड़ दे उम्मीदें दिल की थोड़ी सी तसल्ली हो तो गई माना कि वो बोल के झूट गया — Arzoo Lakhnavi
दो तुंद हवाओं पर बुनियाद है तूफ़ाँ की या तुम न हसीं होते या में न जवाँ होता — Arzoo Lakhnavi
कुछ तो मिल जाए लब-ए-शीरीं से ज़हर खाने की इजाज़त ही सही — Arzoo Lakhnavi
मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है बढ़ी जब बे-ख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से — Arzoo Lakhnavi
दिल की ज़िद इस लिए रख ली थी कि आ जाए क़रार कल ये कुछ और कहेगा मुझे मालूम न था — Arzoo Lakhnavi
फिर चाहे तो न आना ओ आन बान वाले झूटा ही वअ'दा कर ले सच्ची ज़बान वाले — Arzoo Lakhnavi
अल्लाह अल्लाह हुस्न की ये पर्दा-दारी देखिए भेद जिस ने खोलना चाहा वो दीवाना हुआ — Arzoo Lakhnavi
वफ़ा तुम से करेंगे दुख सहेंगे नाज़ उठाएँगे जिसे आता है दिल देना उसे हर काम आता है — Arzoo Lakhnavi
निगाहें इस क़दर क़ातिल कि उफ़ उफ़ अदाएँ इस क़दर प्यारी कि तौबा — Arzoo Lakhnavi

Ghazal

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना किस दर्जा दुखे दिल का रंगीन है अफ़्साना जो कुछ था न कहने का सब कह गया दीवाना समझो तो मुकम्मल है अब इश्क़ का अफ़्साना दो ज़िंदगियों का है छोटा सा ये अफ़्साना लहराया जहाँ शो'ला अंधा हुआ परवाना इन रस भरी आँखों से मस्ती जो टपकती है होती है नज़र साक़ी दिल बनता है पैमाना वीराने में दीवाना घर छोड़ के आया था जब होगा न दीवाना घर ढूँढेगा वीराना अफ़्साना ग़म-ए-दिल का सुनने के नहीं क़ाबिल कह देते हैं सब हँस कर दीवाना है दीवाना जब इश्क़ के मारों का पुरसाँ ही नहीं कोई फिर दोनों बराबर हैं बस्ती हो कि वीराना ये आग मोहब्बत की पानी से नहीं बुझती फिर शम्अ' से जा लिपटा जलता हुआ परवाना — Arzoo Lakhnavi
दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया आसान काम आप ने मुश्किल बना दिया हर साँस एक शो'ला है हर शो'ला एक बर्क़ क्या तू ने मुझ को ऐ तपिश-ए-दिल बना दिया इस हुस्न-ए-ज़न पे हम-सफ़रों के हूँ पा-ब-गिल मुझ बे-ख़बर को रहबर-ए-मंज़िल बना दिया अंधा है शौक़ फिर नज़र इम्कान पर हो क्यूँँ काम अपना दिल ने आप ही मुश्किल बना दिया दौड़ा लहू रगों में बंधी ज़िंदगी की आस ये भी बुरा नहीं है जो बिस्मिल बना दिया ग़र्क़ ओ उबूर दोनों का हासिल है ख़त्म-ए-कार मजबूरियों ने मौज को साहिल बना दिया उस शान-ए-आजिज़ी के फ़िदा जिस ने 'आरज़ू' हर नाज़ हर ग़ुरूर के क़ाबिल बना दिया — Arzoo Lakhnavi
मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने दिल आप निशाना बनता है वो तीर चलाना क्या जाने कह जाती है क्या वो चीन-ए-जबीं ये आज समझ सकते हैं कहीं कुछ सीखा हुआ तो काम नहीं दिल नाज़ उठाना क्या जाने चटकी जो कली कोयल कूकी उल्फ़त की कहानी ख़त्म हुई क्या किस ने कही क्या किस ने सुनी ये बता ज़माना क्या जाने था दैर-ओ-हरम में क्या रखा जिस सम्त गया टकरा के फिरा किस पर्दे के पीछे है शोअ'ला अंधा परवाना क्या जाने ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने सज्दों से पड़ा पत्थर में गढ़ा लेकिन न मिटा माथे का लिखा करने को ग़रीब ने क्या न किया तक़दीर बनाना क्या जाने आँखों की अंधी ख़ुद-ग़र्ज़ी काहे को समझने देगी कभी जो नींद उड़ा दे रातों की वो ख़्वाब में आना क्या जाने पत्थर की लकीर है नक़्श-ए-वफ़ा आईना न जानो तलवों का लहराया करे रंगीं-शोला दिल पलटे खाना क्या जाने जिस नाले से दुनिया बेकल है वो जलते दिल की मशअल है जो पहला लूका ख़ुद न सहे वो आग लगाना क्या जाने हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने — Arzoo Lakhnavi
आँख से दिल में आने वाला दिल से नहीं अब जाने वाला घर को फूँक के जाने वाला फिर के नहीं है आने वाला दोस्त तो है नादान है लेकिन बे-समझे समझाने वाला आँसू पोंछ के हँस देता है आग में आग लगाने वाला है जो कोई तो ध्यान उसी का आने वाला जाने वाला हुस्न की बस्ती में है यारो कोई तरस भी खाने वाला डाल रहा है काम में मुश्किल मुश्किल में काम आने वाला दी थी तसल्ली ये किस दिल से चुप न हुआ चिल्लाने वाला ख़्वाब के पर्दे में आता है सोता पा के जगाने वाला इक दिन पर्दा ख़ुद उल्टेगा छुप-छुप के तरसाने वाला 'आरज़ू' इन के आगे है चुप क्यूँँ तुम सा बातें बनाने वाला — Arzoo Lakhnavi
हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की शम्अ' लौ दे के ज़बाँ बन गई परवाने की शान बस्ती से नहीं कम मिरे वीराने की रूह हर बोंडले में है किसी दीवाने की आमद-ए-मौसम-ए-गुल की है ख़बर दौर-ए-दिगर ताज़गी चाहिए कुछ साख़्त में पैमाने की आई है काट के मीआद-ए-असीरी की बहार हतकड़ी खुल के गिरी जाती है दीवाने की सर्द ऐ शम्अ' न हो गर्मी-ए-बाज़ार-ए-जमाल फूँक दे रूह नई लाश में परवाने की उठ खड़ा हो तो बगूला है जो बैठे तो ग़ुबार ख़ाक हो कर भी वही शान है दीवाने की 'आरज़ू' ख़त्म हक़ीक़त पे हुआ दौर-ए-मजाज़ डाली काबे की बिना आड़ से बुत-ख़ाने की — Arzoo Lakhnavi
आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं सब दोस्त हैं अपने मतलब के दुनिया में किसी का कोई नहीं गुल-गश्त में दामन मुँह पे न लो नर्गिस से हया क्या है तुम को उस आँख से पर्दा करते हो जिस आँख में पर्दा कोई नहीं जो बाग़ था कल फूलों से भरा अटखेलियों से चलती थी सबा अब सुम्बुल ओ गुल का ज़िक्र तो क्या ख़ाक उड़ती है उस जा कोई नहीं कल जिन को अंधेरे से था हज़र रहता था चराग़ाँ पेश-ए-नज़र इक शम्अ' जला दे तुर्बत पर जुज़ दाग़ अब इतना कोई नहीं जब बंद हुईं आँखें तो खुला दो रोज़ का था सारा झगड़ा तख़्त उस का न अब है ताज उस का अस्कंदर ओ दारा कोई नहीं क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं ऐ 'आरज़ू' अब तक इतना पता चलता है तिरी बर्बादी का जिस से न बगूले हों पैदा इस तरह का सहरा कोई नहीं — Arzoo Lakhnavi
गँवा के दिल सा गुहर दर्द-ए-सर ख़रीद लिया बहुत गराँ था ये सौदा मगर ख़रीद लिया अमीन-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-ख़तर ख़रीद लिया ये आइना म-ए-आईना-गर ख़रीद लिया ग़ज़ब था इश्क़ का सौदा कि अहल-ए-होश ने भी जो कुछ नसीब था सब बेच कर ख़रीद लिया भला हो ग़म की तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-तबीअत का अगरचे बात गँवा दी असर ख़रीद लिया रह-ए-रज़ा में है ख़ूनी-कफ़न से शान-ए-शहीद तो जान बेच के रख़्त-ए-सफ़र ख़रीद लिया जो दिल कहे न कहूँ वो जो तू कहे वो कहूँ तो क्या ज़मीर भी ऐ हीला-गर ख़रीद लिया तलाश-ए-ऐश में ऐ 'आरज़ू' है रंज ही रंज सितम-नसीब ये क्या दर्द-ए-सर ख़रीद लिया — Arzoo Lakhnavi
मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ हो ए'तिबार तो फिर ताब-ए-इंतिज़ार कहाँ दिलों में फ़र्क़ हुआ जब तो चाह प्यार कहाँ चमन चमन ही नहीं आएगी बहार कहाँ जिसे ये कह के वो हँस दें कि क़िस्सा अच्छा है वो राज़ खुल के भी होता है आश्कार कहाँ उमंग थी ये जवानी की या कोई आँधी मिला के ख़ाक में हम को गई बहार कहाँ उमीद-वार बनाने से मुद्दआ' क्या था जब आस तुम ने दिला दी तो अब क़रार कहाँ मिली है इस लिए दो-चार दिन की आज़ादी कि सर्फ़ करता है देखें ये इख़्तियार कहाँ ये शौक़ ले के चला है चमन से शक्ल-ए-नसीम कि देखें मिलती है जाती हुई बहार कहाँ है एक शर्त वफ़ा की वो क़ैद-ए-बे-ज़ंजीर सब इख़्तियार हैं और कुछ भी इख़्तियार कहाँ मिटे निशाँ पे नज़र कर के रो जिसे चाहे तिरे सितम की है तुर्बत मिरा मज़ार कहाँ तुम ऐसा अहद-शिकन 'आरज़ू' सा ना-उम्मीद कहो जो सच भी तो आता है ए'तिबार कहाँ — Arzoo Lakhnavi
आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं अब अहद-ए-वफ़ा टूटा कि रहा तुम और कहीं हम और कहीं बे-आप ख़ुशी से एक इधर कुछ खोया हुआ सा एक उधर ज़ाहिर में बहम बातिन में जुदा तुम और कहीं हम और कहीं आए तो ख़ुशामद से आए बैठे तो मुरव्वत से बैठे मिलना ही ये क्या जब दिल न मिला तुम और कहीं हम और कहीं वअदा भी किया तो की न वफ़ा आता है तुम्हें चर्कों में मज़ा छोड़ो भी ये ज़िद लुत्फ़ इस में है क्या तुम और कहीं हम और कहीं बरगश्ता-नसीब का यूँँ होना सोना भी तो इक करवट सोना कब तक ये जुदाई का रोना तुम और कहीं हम और कहीं दिल मिलने पे भी पहलू न मिला दुश्मन तो बग़ल ही में है छुपा क़ातिल है मोहब्बत की ये हया तुम और कहीं हम और कहीं यकसूई-ए-दिल मर्ग़ूब हमें बर्बादी-ए-दिल मतलूब तुम्हें इस ज़िद का है और अंजाम ही क्या तुम और कहीं हम और कहीं दिल से है अगर क़ाएम रिश्ता तो दूर-ओ-क़रीब की बहस ही क्या है ये भी निगाहों का धोका तुम और कहीं हम और कहीं सुन रक्खो क़ब्ल-ए-अहद-ए-वफ़ा क़ौल आरज़ू-ए-शैदाई का जन्नत भी है दोज़ख़ गर ये हुआ तुम और कहीं हम और कहीं — Arzoo Lakhnavi
जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं दरवाज़ों से टकरा जाते हैं दीवारों से बातें होती हैं आशोब-ए-जुदाई क्या कहिए अन-होनी बातें होती हैं आँखों में अँधेरा छाता है जब उजाली रातें होती हैं जब वो नहीं होते पहलू में और लंबी रातें होती हैं याद आ के सताती रहती है और दिल से बातें होती हैं घिर घिर के बादल आते हैं और बे-बरसे खुल जाते हैं उम्मीदों की झूटी दुनिया में सूखी बरसातें होती हैं उम्मीद का सूरज डूबा है आँखों में अँधेरा छाया है दुनिया-ए-फ़िराक़ में दिन कैसा रातें ही रातें होती हैं तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं जो नाज़ है वो अपनाता है जो ग़म्ज़ा है वो लुभाता है इन रंग-बिरंगी पर्दों में घातों पर घातें होती हैं हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से क्यूँँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं — Arzoo Lakhnavi
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी आँख से बह नहीं सकता है भरम का पानी फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी दिल से लौका जो उठा आँख से टपका पानी आग से आज निकलते हुए देखा पानी किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी टिकटिकी बांधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी ये पसीना वही आँसू हैं जो पी जाते थे हम 'आरज़ू' लो वो खुला भेद वो टूटा पानी — Arzoo Lakhnavi