hain des-bides ek guzar aur basar men | हैं देस-बिदेस एक गुज़र और बसर में

  - Arzoo Lakhnavi

हैं देस-बिदेस एक गुज़र और बसर में
बे-आस को कब चैन मिला है किसी घर में

चुप मैं ने लगाई तो हुआ उस का भी चर्चा
जो भेद न खुलता हो वो खुल जाता है डर में

सूरज का घमंड और नहीं तारे के बराबर
ऐसी ही तो बातें हैं इस अंधेर-नगर में

वो टल नहीं सकती जो पहुँचने की घड़ी है
चलता रहे गलियों में कि बैठा रहे घर में

हूक उट्ठी इधर जी में उधर कूक उठी कोयल
पूछे कोई तो कौन इधर में न उधर में

ऐ 'आरज़ू' आँखों ही में कट जाते हैं दिन-रात
कोई भी घड़ी चैन की है आठ-पहर में

  - Arzoo Lakhnavi

Baaten Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Arzoo Lakhnavi

As you were reading Shayari by Arzoo Lakhnavi

Similar Writers

our suggestion based on Arzoo Lakhnavi

Similar Moods

As you were reading Baaten Shayari Shayari