kuchh baat hai ki hasti mitati nahin hamaari | कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

  - Allama Iqbal

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा

  - Allama Iqbal

Nafrat Shayari

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    सारी दुनिया ने तो नफ़रत से पुकारा मुझको
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    सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
    हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

    मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी
    जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं

    इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त
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    जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं

    बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो
    तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

    ढूँढता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को
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    दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
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    अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं
    ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं
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    फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर
    तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर

    तू अपनी ख़ुदी को खो चुका है
    खोई हुई शय की जुस्तुजू कर

    तारों की फ़ज़ा है बे-कराना
    तू भी ये मक़ाम-ए-आरज़ू कर

    उर्यां हैं तिरे चमन की हूरें
    चाक-ए-गुल-ओ-लाला को रफ़ू कर

    बे-ज़ौक़ नहीं अगरचे फ़ितरत
    जो उस से न हो सका वो तू कर
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    Allama Iqbal
    हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़
    यही रहा है अज़ल से क़लंदरों का तरीक़

    हुजूम क्यूँ है ज़ियादा शराब-ख़ाने में
    फ़क़त ये बात कि पीर-ए-मुग़ाँ है मर्द-ए-ख़लीक़

    इलाज-ए-ज़ोफ़-ए-यक़ीं इन से हो नहीं सकता
    ग़रीब अगरचे हैं 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़

    मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब
    ख़ुदा करे कि मिले शैख़ को भी ये तौफ़ीक़

    उसी तिलिस्म-ए-कुहन में असीर है आदम
    बग़ल में उस की हैं अब तक बुतान-ए-अहद-ए-अतीक़

    मिरे लिए तो है इक़रार-ए-बिल-लिसाँ भी बहुत
    हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़

    अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी
    न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़
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    Allama Iqbal

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