Shadab Javed

Shadab Javed

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Shadab Javed shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shadab Javed's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तीनों ज़िद्दी हैं कि हम तुझ सेे कहेंगे भी नहीं तू छूएगा भी नहीं ज़ख़्म भरेंगे भी नहीं — Shadab Javed
दूल्हा-दूल्हन को नहीं तकता कोई क्यूँँ कि उस बारात में इक चाँद है — Shadab Javed
कुछ नहीं होता है क़सम तोड़ो मैं ने सिगरेट जला के देख लिया — Shadab Javed
किसी ने अपने मुक़द्दर का रोना रोते हुए किसी के कार्ड के बोसे सँभल-सँभल के लिए — Shadab Javed
किसी के साथ वो दो पाँव आज चलने लगे हम अपनी आँख के साथ हाथ भी मसलने लगे — Shadab Javed
मसअले का ये हल निकाला है ख़्वाहिशों को ही मार डाला है — Shadab Javed
तेरे लब से जब तक पुकारा न जाऊँ मैं पंखे से तब तक उतारा न जाऊँ — Shadab Javed
अगर तू ख़ुश है मेरी हार से तो मेरी हर जीत से नफ़रत है मुझ को — Shadab Javed
मैं पहले झूठ पर हकलाया उस सेे फिर उस के बा'द माहिर हो गया था — Shadab Javed
हमें जिन की हिमायत चाहिए थी वही नज़रें चुरा कर जा रहे हैं — Shadab Javed
वो आँखें आप के ग़म में नहीं हुई हैं नम दिया जलाते हुए हाथ जल गया होगा — Shadab Javed
ता'रीफ़ सुन रहा हूँ बहुत तेरे हाथ की साक़ी मेरे लिए भी ज़रा सी निकाल दे — Shadab Javed
इक प्यासे की मौत हुई है अब पानी को दुख होगा — Shadab Javed
तू परिंदा है किसी शाख़ को घर कर लेगा जो तेरे हिज्र का मारा है किधर जाएगा — Shadab Javed
तो क्या ऐसे ही रोना आ गया था नहीं वो याद लहजा आ गया था — Shadab Javed
तुम्हें हरगिज़ ग़लत समझे न कोई रुको मैं बे-वफ़ाई कर रहा हूँ — Shadab Javed
मेरे अश'आर पढ़ने वाले लोग तेरी तस्वीर माँग बैठे हैं — Shadab Javed
जब भी कहता हूँ कब मिलेंगे हम टाल देता है क्या पता कह कर — Shadab Javed
बूढ़ी बोझल सूखी आँखें देख रही हैं हैरत से कच्ची उम्र के लड़कों ने कुछ ऐसी बातें लिक्खी हैं — Shadab Javed
ख़बर मिली है स्टेशन पर तुम भी आने वाली हो रेल को पीछे छोड़ दीया है साँसों की रफ़्तारों ने — Shadab Javed

Ghazal

दिल-ए-ग़रीब को नाशाद कर के रोया जाए कोई नहीं है जिसे याद कर के रोया जाए अमीर-ए-शहर के बस का नहीं हमारा सवाल किसी फ़क़ीर से फरियाद कर के रोया जाए सुतून-ए-अर्श है लर्ज़ा किसी की आहों से ख़राब-हालों उसे शाद कर के रोया जाए किसी को देख के हँसने से लाख बेहतर है किसी के दुख में कुछ इमदाद कर के रोया जाए ये कोह-ए-ज़ीस्त फ़क़त आँसुओं से पिघलेगा सो अपने अज़्म को फ़रहाद कर के रोया जाए सबब नहीं है कोई आह-ओ-सीना-कूबी का सबब नहीं है तो ईजाद कर के रोया जाए वो हादसा मेरी आँखों को ख़ुश्क कर गया था उसी को आज न क्यूँँ याद कर के रोया जाए नज़र में सुर्ख़ ज़मीं है लहू है लाशें हैं सो शहर-ए-क़ल्ब को बग़दाद कर के रोया जाए ख़ुदा करे मेरी शादाबियत मरे किसी शब ख़ुदा करे मुझे शब-ज़ाद कर के रोया जाए — Shadab Javed
इतना आसान तो नहीं था इश्क़ अब तो करता है बच्चा बच्चा इश्क़ इश्क़ हा-मीम इश्क़ है यासीन इश्क़ अलिफ़-लाम-मीम ताहा इश्क़ हम ने पाया है इश्क़ विरसे में इश्क़ आदम है और हव्वा इश्क़ रौशनी छीने है निगाहों की पूछो याक़ूब से कि है क्या इश्क़ थोड़े गंदुम के बदले में लेने आई है मिस्र में ज़'ईफ़ा इश्क़ इश्क़ में हुस्न भी रहा आगे इश्क़ यूसुफ़ है और ज़ुलैख़ा इश्क़ याद है न वो क़िस्सा ए यूनुस मछली के पेट में था ज़िंदा इश्क़ बन के मूसा की हसरत ए दीदार तूर को नूर से जलाता इश्क़ हम को हासिल है अज़ ख़लीलुल्लाह आग को बाग़ करने वाला इश्क़ बेटे से एड़ियाँ रगड़वाता हाजिरा से स'ई कराता इश्क़ कितने मुर्दों को ज़िन्दगी दे दी इश्क़ ए ईसा भी था ग़ज़ब का इश्क़ वक़्त-ए-मिलाद-ए-मुस्तफ़ाई पर काबतुल्लाह को झुकाता इश्क़ देखो सहबा में मुर्तज़ा के लिए डूबे सूरज को खींच लाया इश्क़ ज़ख़्म खा कर बिलाल हँसता है दंग है देख कर उमैया इश्क़ आज भी लग रहा है कर्बल में सर को पकड़े हुए है बैठा इश्क़ बाबा गंज ए शकर बताते हैं मुझ को शक्ल ए शकर मिला था इश्क़ अपने दाँतों को ख़ुद ही तोड़ दिया वाह क़रनी का ये अनूठा इश्क़ ग़ौस ए आज़म के एक इशारे पर लौट आया है एक माँ का इश्क़ तलवा ए ग़ौस सर पे रखने को अपनी गर्दन झुकाए बैठा इश्क़ एक कासे में हुक्म ए ख़्वाजा पर एक सागर समेट लाया इश्क़ इश्क़ शीरीं है इश्क़ है फ़रहाद इश्क़ मजनूं है और लैला इश्क़ इश्क़ नदियों में फेंक देता है और मेले में है गुमाता इश्क़ इश्क़ को हल्का जानने वालो शहर का शहर फूँक देगा इश्क़ दिल में इक दर्द बन के बैठा था आँख से अश्क बन के निकला इश्क़ वो कभी खुल के मुस्कुरा न सका जिस ने बर्बाद होते देखा इश्क़ ये जनाज़ा जो उठ रहा है नकहते हैं इस को भी हुआ था इश्क़ आज के दौर में मेरे भाई सिर्फ़ धोखा है सिर्फ़ धोखा इश्क़ देखो ! किस काम में मुझे लाए मुझ निकम्में का एक तरफ़ा इश्क़ ये दिलासा मुझे सँभाले है अब किसे है नसीब सच्चा इश्क़ दिल ! तू बदनाम हो गया कैसे क्या किया अच्छा अच्छा इश्क़ आओ शादाब उस सेे बोल ही दें कौन सा इश्क़ यार कैसा इश्क़ — Shadab Javed
किसी के अश्क पे ज़िंदा-दिली का क़ब्ज़ा है किसी के हँसने पे अफ़सुर्दगी का क़ब्ज़ा है ये कह के तेरे मुसव्विर ने रंग फेंक दिए हर एक रंग पे तस्वीर ही का क़ब्ज़ा है किसी को ज़िन्दगी कह कर बचे हुए हैं हम हमारी मौत पे अब ज़िन्दगी का क़ब्ज़ा है कुछ और बढ़ गई दर्शन की प्यास आँखों में तेरे सबील पे तिश्ना-लबी का क़ब्ज़ा है ये किस के शहर की गलियाँ हैं ऐ दिल-ए-सूफ़ी हर एक अक़्ल पे दीवानगी का क़ब्ज़ा है तेरे ख़याल की चौखट से उठ नहीं सकता मेरे शऊर पे अब आगही का क़ब्ज़ा है तुम्हारी छाँव में आ कर उसी पे क़ाबिज़ हूँ तमाम शहर में जिस रौशनी का क़ब्ज़ा है — Shadab Javed

Nazm

मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ?? — Shadab Javed
हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !! — Shadab Javed