किसी के अश्क पे ज़िंदा-दिली का क़ब्ज़ा है
किसी के हँसने पे अफ़सुर्दगी का क़ब्ज़ा है
ये कह के तेरे मुसव्विर ने रंग फेंक दिए
हर एक रंग पे तस्वीर ही का क़ब्ज़ा है
किसी को ज़िन्दगी कह कर बचे हुए हैं हम
हमारी मौत पे अब ज़िन्दगी का क़ब्ज़ा है
कुछ और बढ़ गई दर्शन की प्यास आँखों में
तेरे सबील पे तिश्ना-लबी का क़ब्ज़ा है
ये किसके शहर की गलियाँ हैं ऐ दिल-ए-सूफ़ी
हर एक अक़्ल पे दीवानगी का क़ब्ज़ा है
तेरे ख़याल की चौखट से उठ नहीं सकता
मेरे शऊर पे अब आगही का क़ब्ज़ा है
तुम्हारी छाँव में आ कर उसी पे क़ाबिज़ हूँ
तमाम शहर में जिस रौशनी का क़ब्ज़ा है
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