Liaqat Jafri

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Liaqat Jafri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Liaqat Jafri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं कुछ दिन से अचानक फिर अकेला पड़ गया हूँ नए मौसम में इक वहशत पुरानी काटती है — Liaqat Jafri
मेरी जानिब न बढ़ना अब मोहब्बत मैं अब पहले से मुश्किल रास्ता हूँ — Liaqat Jafri
मैं दौड़ दौड़ के ख़ुद को पकड़ के लाता हूँ तुम्हारे इश्क़ ने बच्चा बना दिया है मुझे — Liaqat Jafri
मैं बहुत जल्द लौट आऊँगा तुम मिरा इंतिज़ार मत करना — Liaqat Jafri
इश्क़ तू ने बड़ा नुक़सान किया है मेरा मैं तो उस शख़्स से नफ़रत भी नहीं कर सकता — Liaqat Jafri
जहाँ जो था वहीं रहना था उस को मगर ये लोग हिजरत कर रहे हैं — Liaqat Jafri

Ghazal

रौनक़-ए-दामन-ए-सद-चाक कहाँ से लाएँ शहर में दश्त की पोशाक कहाँ से लाएँ हालत-ए-जज़्ब में इदराक कहाँ से लाएँ ज़हर के वास्ते तिरयाक कहाँ से लाएँ गर्द-हा-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक कहाँ से लाएँ इस क़दर गर्दिश-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ पानी ले आए हैं अब एक नई उलझन है कूज़ा-गर तेरे लिए ख़ाक कहाँ से लाएँ चेहरा-मोहरा तो बहर-हाल दमक ही लेगा ताबिश-ए-चश्मा-ए-नम-नाक कहाँ से लाएँ तुझ को बिल्कुल नहीं एहसास-ए-हुनर ऐ दरिया अब तिरे वास्ते तैराक कहाँ से लाएँ ख़ाक-ज़ादे हैं सो बस एक ही रंगत है नसीब ख़ुद में सद-रंगी-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ हम भी जी भर के तुझे कोसते फिरते लेकिन हम तिरा लहजा-ए-बे-बाक कहाँ से लाएँ — Liaqat Jafri
किसी गिर्दाब की फेंकी पड़ी है लब-ए-साहिल जो इक कश्ती पड़ी है हक़ीक़त में वही सीधी पड़ी है मुझे इक चाल जो उल्टी पड़ी है सफ़र उलझा दिए हैं उस ने सारे मिरे पैरों में जो तेज़ी पड़ी है वो हंगामा गुज़र जाता उधर से मगर रस्ते में ख़ामोशी पड़ी है मिरे कानों की ज़द पर हैं मनाज़िर मिरी आँखों में सरगोशी पड़ी है हुआ है क़त्ल बेदारी का जब से ये बस्ती रात दिन सोई पड़ी है ये मिस्रा मैं अधूरा छोड़ता हूँ मिरे बस्ते में इक तख़्ती पड़ी है पतंग कटने का बाइस और है कुछ अगरचे डोर भी उलझी पड़ी है ज़रा कोयल का पिंजरा खुल गया था अभी तक ख़ौफ़ से सहमी पड़ी है मुकम्मल एक दुनिया और भी है जो इक दुनिया की अन-देखी पड़ी है बड़ी बंजर थी ये खेती 'लियाक़त' मगर कुछ रोज़ से सींची पड़ी है — Liaqat Jafri
पड़े पड़े नई ज़र-ख़ेज़ियाँ निकल आईं कटे दरख़्त में फिर टहनियाँ निकल आईं उस आइने में था सरसब्ज़ बाग़ का मंज़र छुआ जो मैं ने तो दो तितलियाँ निकल आईं मैं तोड़ डाला गया तो इमारत-ए-जाँ में कहाँ कहाँ से मिरी चाबियाँ निकल आईं मैं आसमान पे पहुँचा तो लड़खड़ाने लगा बुलंदियों में अजब पस्तियाँ निकल आईं ठहर गए तो मुयस्सर हुई न जा-ए-अमाँ जो चल पड़े तो कई बस्तियाँ निकल आईं वही नसीब कि मैं शहरयार जिस से बना उसी नसीब में तंग-दस्तियाँ निकल आईं मिरे इलाज को अल्लाह इस्तक़ामत दे मिरे मरीज़ की फिर पस्लियाँ निकल आईं मैं आसमान से उतरा ज़मीन की जानिब ज़मीं से मेरी तरफ़ सीढ़ियाँ निकल आईं वही सूराख़ जहाँ छिपकिली का डेरा था उसी सूराख़ से फिर च्यूँँंटियाँ निकल आईं अभी अभी तो सँभाला गया था गर्द-ओ-ग़ुबार हिसार-ए-दश्त में फिर आँधियाँ निकल आईं सँभाल रखा था अम्मी ने जिस को मौत तलक उसी कबाड़ से कुछ तख़्तियाँ निकल आईं मैं आख़िरी था जिसे सरफ़राज़ होना था मिरे हुनर में भी कोताहियाँ निकल आईं — Liaqat Jafri
हालाँकि पहले दिन से कहा जा रहा हूँ मैं लेकिन कहाँ किसी को सुना जा रहा हूँ मैं लाचार ओ बद-हवा से घने जंगलों के बीच दरिया के साथ साथ चला जा रहा हूँ मैं पछता रहे हैं सब मिरा पिंजर निकाल कर दीवार में दोबारा चुना जा रहा हूँ मैं हालाँकि पहले साए से रहती थी कश्मकश अब अपने बोझ से ही दबा जा रहा हूँ मैं तेरे सँभालने से भी पकड़ी न मैं ने आग अब और भी ज़ियादा बुझा जा रहा हूँ मैं पहले-पहल तो ख़ुद से ही मंसूब थे ये अश्क अब उस की आँख से भी बहा जा रहा हूँ मैं ये दिन भी कैसा सख़्त शिकंजा है 'जाफ़री' अब जिस पे सारी रात कसा जा रहा हूँ मैं — Liaqat Jafri
कोई समझाओ दरिया की रवानी काटती है कि मेरे साँस को तिश्ना-दहानी काटती है मैं बाहर तो बहुत अच्छा हूँ पर अंदर ही अंदर मुझे कोई बला-ए-ना-गहानी काटती है मैं दरिया हूँ मगर कितना सताया जा रहा हूँ कि बस्ती रोज़ आ के मेरा पानी काटती है ज़मीं पर हूँ मगर कट कट के गिरता जा रहा हूँ मुसलसल इक निगाह-ए-आसमानी काटती है मैं कुछ दिन से अचानक फिर अकेला पड़ गया हूँ नए मौसम में इक वहशत पुरानी काटती है कि राजा मर चुका है और शहज़ादे जवाँ हैं ये रानी किस तरह अपनी जवानी काटती है नज़र वालो तुम्हारी आँख से शिकवा है मुझ को ज़बाँ वालो तुम्हारी बे-ज़बानी काटती है — Liaqat Jafri
तुम्हें अब इस से ज़ियादा सज़ा नहीं दूँगा दुआएँ दूँगा मगर बद-दुआ' नहीं दूँगा तिरी तरफ़ से लड़ूँगा मैं तेरी हर इक जंग रहूँगा साथ मगर हौसला नहीं दूँगा तिरी ज़बान पे मौक़ूफ़ मेरे हाथ का लम्स निवाला दूँगा मगर ज़ाइक़ा नहीं दूँगा मैं पहले बोसे से ना-आश्ना रखूँगा तुम्हें फिर इस के बा'द तुम्हें दूसरा नहीं दूँगा फिर एक बार गुज़र जाओ मेरे ऊपर से मैं इस के बा'द तुम्हें रास्ता नहीं दूँगा कि तू तलाश करे और मैं तुझ को मिल जाऊँ मैं तेरी आँख को इतनी सज़ा नहीं दूँगा भगाए रक्खूँगा अपनी अदालतों में तुम्हें तमाम उम्र तुम्हें फ़ैसला नहीं दूँगा मैं उस के साथ हूँ जो उठ के फिर खड़ा हो जाए मैं तेरे शहर को अब ज़लज़ला नहीं दूँगा तिरी अना के लिए सिर्फ़ ये सज़ा है बहुत तू जा रहा है तो तुझ को सदा नहीं दूँगा कि अब की बार 'लियाक़त' हुआ हुआ सो हुआ मैं उस के हाथ में अब आइना नहीं दूँगा — Liaqat Jafri
मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे — Liaqat Jafri
उसी के दम पे तो ये दोस्ती बची हुई थी हमारे बीच में जो हम-सरी बची हुई थी हमारे बीच में इक पुख़्तगी बची हुई थी बची हुई थी मगर आरज़ी बची हुई थी उसी के नूर से ये रौशनी बची हुई थी मिरे नसीब में जो तीरगी बची हुई थी उसी के दम पे मनाया था उस ने जश्न मिरा कि दुश्मनी में भी जो दोस्ती बची हुई थी कमाल ये था कि हम बहस हार बैठे थे हमारे लहजे की शाइस्तगी बची हुई थी अगरचे ख़त्म थे रिश्ते पड़ोसियों वाले हमारे बीच में हम सेायगी बची ही थी बदल चुका था वो अपना मिज़ाज मेरे लिए मगर दिखावे को इक बे-रुख़ी बची हुई थी उसी के नूर से पुर-नूर था ये सारा जहाँ हमारी आँख में जो रौशनी बची हुई थी अब इस मक़ाम पे पहुँचा दिया था हम ने इश्क़ जुनून ख़त्म था दीवानगी बची हुई थी उसी ने जोड़ के रक्खा हुआ था रिश्ते को हमारे बीच में जो बरहमी बची हुई थी इस एक बात की शर्मिंदगी ने मार दिया मिरे वजूद तिरी तिश्नगी बची हुई थी उबूर कर लिया सहरा तो फिर से लौट आए जुनून बाक़ी था आशुफ़्तगी बची हुई थी मैं गाहे-गाहे उसे याद कर ही लेता था इसी बहाने मिरी ज़िंदगी बची हुई थी उसी के दम पे पढ़े भी गए सुने भी गए हमारे लहजे में जो चाशनी बची हुई थी ज़माने तेरी हुनर-कोश रज़्म के हाथों मैं लुट चुका था मगर शाएरी बची हुई थी वो कौन राज़ था जिस को बयान कर न सके वो कौन बात थी जो 'जाफ़री' बची हुई थी — Liaqat Jafri
लफ़्ज़ को इल्हाम मअ'नी को शरर समझा था मैं दर-हक़ीक़त ऐब था जिस को हुनर समझा था मैं रौशनी थी आँख थी मंज़र था फिर कुछ भी न था हाए किस आशोब को अपनी नज़र समझा था मैं आसमानों को लपकते हैं ज़मीं-ज़ादे सभी मुर्ग़-ए-आदम-ज़ाद को बे-बाल-ओ-पर समझा था मैं ''कुन'' का अफ़्सून-ए-अज़ल फूँका गया था जिस घड़ी मुझ को अब भी याद है बार-ए-दिगर समझा था मैं है कोई? जो मेरे इस लम्हे पे गिर्या कर सके जब मुझे बिल्कुल समझ न थी मगर समझा था मैं अपने बच्चों की तरह उस ने उड़ाया मुझ को साथ जिस हवा-ए-तुंद-ख़ू को दर-ब-दर समझा था मैं मुझ पे फ़र्सूदा अक़ाएद की अजब यलग़ार थी छोटे छोटे वसवसों को ख़ैर-ओ-शर समझा था मैं रेगज़ार-ए-शब-गज़ीदा तुझ में ता-हद्द-ए-नज़र धूप का आसेब था जिस को शजर समझा था मैं बे-सर-ओ-सामानियों की इंतिहा थी 'जाफ़री' जब दर-ओ-दीवार को दीवार-ओ-दर समझा था मैं बाब-ए-हैरत जब तलक खुलता लियाक़त-'जाफ़री' क़ैस को फ़रहाद को आशुफ़्ता-सर समझा था मैं — Liaqat Jafri
ये जो रह रह के सर-ए-दश्त हवा चलती है कितनी अच्छी है मगर कितना बुरा चलती है एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है हाए वो साँस कि रुकती है तो क्या रुकती है हाए वो आँख कि चलती है तो क्या चलती है पेश-ख़ेमा है किसी और नई वहशत का ये जो इतरा के अभी बाद-ए-सबा चलती है तीर चलते हैं लगातार सवाद-ए-जाँ में और तलवार कोई एक जुदा चलती है बीच दरिया के अजब जश्न बपा है यारो साथ कश्ती के कोई मौज-ए-बला चलती है आज कुछ और ही मंज़र है मिरे चारों तरफ़ ग़ैर-महसूस तरीक़े से हवा चलती है मैं ब-ज़ाहिर तो हूँ आसूदा प मेरे अंदर धीमे धीमे से कहीं आह-ओ-बुका चलती है यूँँ तो बेबाक बना फिरता है वो यारों में उस की आँखों में अजब शर्म-ओ-हया चलती है मेरे मौला जो रहे सिर्फ़ कहा तेरा रहे मेरे होंटों पे यही एक दुआ चलती है — Liaqat Jafri
मिरे वजूद अभी ना-तवाँ नहीं होना फिर इस के ब'अद ये मौसम जवाँ नहीं होना किसे ख़बर थी कि महशर का होगा ये भी रंग ज़मीं का होना मगर आसमाँ नहीं होना हमें ख़बर है कि वहशत ठिकाने लगनी है हमारा जोश अभी राएगाँ नहीं होना वजूद अपना है और आप तय करेंगे हम कहाँ पे होना है हम को कहाँ नहीं होना अब इस के ब'अद सकत कुछ नहीं रही मुझ में अब इस से आगे का क़िस्सा बयाँ नहीं होना हमारी बस्ती का दुख है हमीं से पूछो मियाँ कि क़ब्रें होनी मगर आस्ताँ नहीं होना मक़ाम-ए-शुक्र है मेरे लिए कि मेरे मुरीद ये तेरा आज मिरा क़द्र-दाँ नहीं होना मैं ख़ानदान का सब से बड़ा मदारी हूँ तमाशा होता रहेगा यहाँ नहीं होना बस इतनी दूरी मुयस्सर रहेगी दोनों को कि फ़ासला भी कोई दरमियाँ नहीं होना अजब अज़ाब था कि अपने शहर-ए-अरमाँ में हमारे वास्ते जा-ए-अमाँ नहीं होना ये ज़ुल्म है कि मुनादी हो इम्तिहानों की फिर इस के ब'अद कोई इम्तिहाँ नहीं होना अजब सुपुर्दगी-ए-जाँ का मरहला था 'अली' हमारे होने का हम को गुमाँ नहीं होना — Liaqat Jafri
मुसलसल अश्क-बारी कर रहा था मैं अपनी आबियारी कर रहा था मुझे वो ख़्वाब फिर से देखना था मैं ख़ुद पे नींद तारी कर रहा था कई दिन तक था मेरी दस्तरस में मैं अब दरिया को जारी कर रहा था मुझे रुक रुक के पंछी देखते थे मैं पत्थर पर सवारी कर रहा था गुज़रना था बहुत मुश्किल उधर से दरीचा चाँद-मारी कर रहा था कोई एटम था मेरे जिस्म-ओ-जाँ में मैं जिस की ताब-कारी कर रहा था सफ़ीने सब के सब ग़र्क़ाब कर के समुंदर आह-ओ-ज़ारी कर रहा था मुझे फ़ितरत भी घिसती जा रही थी मैं ख़ुद भी रेग-मारी कर रहा था मेरी ड्यूटी थी ख़ेमों की हिफ़ाज़त मगर मैं आब-दारी कर रहा था सितारे टिमटिमाना रुक गए थे मैं फिर अख़्तर-शुमारी कर रहा था मुझे भिड़ना था किस वहशी से लेकिन मैं किस पागल से यारी कर रहा था बहुत से काम करने थे 'लियाक़त' जिन्हें मैं बारी बारी कर रहा था — Liaqat Jafri
उसी के दम पे तो ये दोस्ती बची हुई थी हमारे बीच में जो हम-सरी बची हुई थी हमारे बीच में इक पुख़्तगी बची हुई थी बची हुई थी मगर आरज़ी बची हुई थी उसी के नूर से ये रौशनी बची हुई थी मिरे नसीब में जो तीरगी बची हुई थी उसी के दम पे मनाया था उस ने जश्न मिरा कि दुश्मनी में भी जो दोस्ती बची हुई थी कमाल ये था कि हम बहस हार बैठे थे हमारे लहजे की शाइस्तगी बची हुई थी अगरचे ख़त्म थे रिश्ते पड़ोसियों वाले हमारे बीच में हम सेायगी बची ही थी बदल चुका था वो अपना मिज़ाज मेरे लिए मगर दिखावे को इक बे-रुख़ी बची हुई थी उसी के नूर से पुर-नूर था ये सारा जहाँ हमारी आँख में जो रौशनी बची हुई थी अब इस मक़ाम पे पहुँचा दिया था हम ने इश्क़ जुनून ख़त्म था दीवानगी बची हुई थी उसी ने जोड़ के रक्खा हुआ था रिश्ते को हमारे बीच में जो बरहमी बची हुई थी इस एक बात की शर्मिंदगी ने मार दिया मिरे वजूद तिरी तिश्नगी बची हुई थी उबूर कर लिया सहरा तो फिर से लौट आए जुनून बाक़ी था आशुफ़्तगी बची हुई थी मैं गाहे-गाहे उसे याद कर ही लेता था इसी बहाने मिरी ज़िंदगी बची हुई थी उसी के दम पे पढ़े भी गए सुने भी गए हमारे लहजे में जो चाशनी बची हुई थी ज़माने तेरी हुनर-कोश रज़्म के हाथों मैं लुट चुका था मगर शाएरी बची हुई थी वो कौन राज़ था जिस को बयान कर न सके वो कौन बात थी जो 'जाफ़री' बची हुई थी — Liaqat Jafri
कोई समझाओ दरिया की रवानी काटती है कि मेरे साँस को तिश्ना-दहानी काटती है मैं बाहर तो बहुत अच्छा हूँ पर अंदर ही अंदर मुझे कोई बला-ए-ना-गहानी काटती है मैं दरिया हूँ मगर कितना सताया जा रहा हूँ कि बस्ती रोज़ आ के मेरा पानी काटती है ज़मीं पर हूँ मगर कट कट के गिरता जा रहा हूँ मुसलसल इक निगाह-ए-आसमानी काटती है मैं कुछ दिन से अचानक फिर अकेला पड़ गया हूँ नए मौसम में इक वहशत पुरानी काटती है कि राजा मर चुका है और शहज़ादे जवाँ हैं ये रानी किस तरह अपनी जवानी काटती है नज़र वालो तुम्हारी आँख से शिकवा है मुझ को ज़बाँ वालो तुम्हारी बे-ज़बानी काटती है — Liaqat Jafri