Ameer Imam

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"इस शाइरी में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए
दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए"

अमीर इमाम का ताल्लुक़ उत्तरप्रदेश के शहर सँभल से है। वो 30 जून 1984 को पैदा हुए। आपने अंग्रेज़ी में एम.ए किया है और फ़िलहाल शिक्षा के पेशे से जुड़े हुए हैं और इस वक़्त वो संभल के एक कॉलेज में पढ़ा रहे हैं। उनका पहला संग्रह उर्दू में 'नक़्श-ए-पा हवाओं के' के नाम से 2013 में प्रकाशित हुआ था, जिस पर साहित्य अकादमी का युवा साहित्य पुरुस्कार भी मिला था। अमीर अपनी शायरी से 'ज़िन्दगी' में एक नया रंग भरने के काम को बख़ूबी कर रहे है।

"सोचती रह जाएगी दुनिया इसे क्या नाम दूं
ज़िन्दगी तुझ में इक ऐसा रंग भर जाएंगे हम"

अमीर का आलिम जब जब उसके शाइर से टकराता है तो उस टकराहट की शे'री गूंज क़ारी के ज़हन की वादियों में देर तक हलचल मचाए रखती है! समन्दर के खारे पानी से उभरती किसी सिने-तारिका की मानिंद दुनिया की कुड़त्तण से इश्क़ के उभरने का मंज़र अमीर के यहाँ पाया जाता है, जिसे आप चाह कर भी भूल नहीं पाते..

"और फिर हमें भी ख़ुद पे बहुत प्यार आ गया
उस की तरफ़ खड़े हुए जब हम मिले हमें"

अमीर जिस अहद का शाइर है उसके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से आरी नहीं है.. हक़-परस्ती और हक़-गोई अमीर के यहाँ भरपूर है

हक़ तलब करते हुए लोगों को फ़रियादी कहें
गर ये आज़ादी है कैसे इस को आज़ादी कहें

आँधियों से लड़ रहें हैं जंग कुछ कागज़ के लोग
हम पे लाजिम है कि इन लोगों को फ़ौलादी कहें

आपके दो काव्य संग्रह "नक़्श-ए-पा हवाओं के" और "सुबह बख़ैर ज़िंदगी” प्रकाशित हो चुके हैं।
  • Sher
  • Ghazal

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