Ameer Imam

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Ameer Imam shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ameer Imam's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो एक अश्क जो हासिल है ज़िंदगानी का तमाम उम्र के मंज़र निचोड़ कर निकला — Ameer Imam
ख़ुद हुस्न से न पूछिए ता'रीफ़ हुस्न की दीवाने से ये पूछिए दीवाना क्यूँँ हुआ — Ameer Imam
बे-सबब मरने से अच्छा है कि हो कोई सबब दोस्तों सिगरेट पियो मय-ख़्वारियाँ करते रहो — Ameer Imam
मत बताना कि बिखर जाएँ तो क्या होता है नईं नस्लों को नए ख़्वाब सजाने देना — Ameer Imam
अमीर इमाम के अश'आर अपनी पलकों पर तमाम हिज्र के मारे उठाए फिरते हैं — Ameer Imam
हसीन लड़कियाँ ख़ुश्बूएँ चाँदनी रातें और इन के बा'द भी ऐसी सड़ी हुई दुनिया — Ameer Imam
सिगरेट की शक्ल में कभी चाय की शक्ल में इक प्यास है कि जिस को पिए जा रहे हैं हम — Ameer Imam
तू ने जिस बात को इज़हार-ए-मुहब्बत समझा बात करने को बस इक बात रखी थी हम ने — Ameer Imam
मुस्कुरा बैठे हैं तुझ को मुस्कुराता देख कर वरना तेरी मुस्कराहट की क़सम ग़ुस्से में हैं — Ameer Imam
जान लेना कि नया हाथ बुलाता है तुम्हें गर कोई हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना — Ameer Imam
असर करती है कोई-कोई बात आहिस्ता आहिस्ता समझ में आते हैं कुछ मोजज़ात आहिस्ता आहिस्ता — Ameer Imam
ख़ाक को ख़ाक से मिलने नहीं देती दुनिया मर भी जाएँ तो कफ़न बीच में आ जाता है — Ameer Imam
हम से यहाँ तो कुछ भी समेटा न जा सका हम से हर एक चीज़ बिखरती चली गई — Ameer Imam
लुत्फ़ आता है बहुत सोच के मुझ को कि रक़ीब रंगत-ए-लब को तेरी पान समझते होंगे — Ameer Imam
इक और किताब ख़त्म की फिर उस को फाड़ कर काग़ज़ का इक जहाज़ बनाया ख़ुशी हुई — Ameer Imam
धूप में कौन किसे याद किया करता है पर तिरे शहर में बरसात तो होती होगी — Ameer Imam
आँधियों से लड़ रहे हैं जंग कुछ काग़ज़ के लोग हम पे लाज़िम है कि इन लोगों को फ़ौलादी कहें — Ameer Imam
अब सुलगती है हथेली तो ख़याल आता है वो बदन सिर्फ़ निहारा भी तो जा सकता था — Ameer Imam
पूछ मुझ सेे कि तेरे होंठ पे तिल है क्यूँँ कर ऐसा नुक़्ता कहीं नादान समझते होंगे — Ameer Imam
कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी — Ameer Imam

Ghazal

दर्द-ए-दिल है न फ़लसफ़ा मेरे पास दाल रोटी का मसअला मेरे पास पास मेरे भी है तेरी ही दुआ काश होता तेरा ख़ुदा मेरे पास ज़र दिलाती है हम को बेवतनी पर नहीं कोई बैठता मेरे पास आगही आ गई तो आ ही गई रह गया एक रब्बना मेरे पास एक पल एक पल न रोक सका वक़्त मेरा था कब मेरा मेरे पास तुम परीज़ाद हो मैं आदम हूँ ऐसे बेसुध न बैठना मेरे पास मेरा ग़म भी है तेरे ग़म जैसा है इसी ग़म की इंतिहा मेरे पास दर्द जाली हैं अश्क हैं नक़ली अस्ल है नींद की दवा मेरे पास सुस्त रातों में जिस ने छोड़ा था तेज़ बारिश में आ गया मेरे पास वाक़िया ये है तू जो आ न सका तब से मैं भी न आ सका मेरे पास वक़्त था वो सो वक़्त वो न रहा न वो आमिर रहा जो था मेरे पास — Ameer Imam
उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए — Ameer Imam
है कौन किस की ज़ात के अंदर लिखेंगे हम नहर-ए-रवाँ को प्यास का मंज़र लिखेंगे हम ये सारा शहर आला-ए-हिकमत लिखे उसे ख़ंजर अगर है कोई तो ख़ंजर लिखेंगे हम अब तुम सिपास-नामा-ए-शमशीर लिख चुके अब दास्तान-ए-लाशा-ए-बे-सर लिखेंगे हम रक्खी हुई है दोनों की बुनियाद रेत पर सहरा-ए-बे-कराँ को समुंदर लिखेंगे हम इस शहर-ए-बे-चराग़ की आँधी न हो उदास तुझ को हवा-ए-कूचा-ए-दिल-बर लिखेंगे हम क्या हुस्न उन लबों में जो प्यासे नहीं रहे सूखे हुए लबों को गुल-ए-तर लिखेंगे हम हम से गुनाहगार भी उस ने निभा लिए जन्नत से यूँँ ज़मीन को बेहतर लिखेंगे हम — Ameer Imam
गुज़रे हुए वक़्तों का निशाँ था तो कहाँ था हम से जो निहाँ है वो अयाँ था तो कहाँ था बस्ती का तक़ाज़ा है कहीं हैं तो कहाँ हैं मजनूँ का बयाबाँ में मकाँ था तो कहाँ था अब सोचते हैं बैठ के गुलशन की फ़ज़ा में सहरा में हमारा जो मकाँ था तो कहाँ था नश्शा ही नहीं सब का भरम टूट रहा था कहते हैं कोई पीर-ए-मुग़ाँ था तो कहाँ था इस तरह लिपटती है उदासी कि ये सोचें दो पल की ख़ुशी का जो गुमाँ था तो कहाँ था पीरी है बुज़ुर्गी है बुढ़ापा है कि क्या है इस कर्ब में रहना कि जवाँ था तो कहाँ था 'आमिर' को हमीं ढूँड के लाएँ हैं ब-मुश्किल कहते हैं वो पहले से यहाँ था तो कहाँ था — Ameer Imam
मेरे अश'आर सुनाना न सुनाने देना जब मैं दुनिया से चला जाऊँ तो जाने देना साथ इन के है बहुत ख़ाक उड़ाई मैं ने इन हवाओं को मेरी ख़ाक उड़ाने देना मत बताना कि बिखर जाएँ तो क्या होता है नई नस्लों को नए ख़्वाब सजाने देना वक़्त दुनिया को सुनाएगा कहानी मेरी कहे देता हूँ मिरा नाम न आने देना रहूँ ख़ामोश तो ख़ामोश ही रखना मुझ को और अगर शोर मचाऊँ तो मचाने देना अब तो बारिश में भी स्कूल खुला करते हैं वहाँ मत भेजना बच्चों को नहाने देना जान लेना कि नया हाथ बुलाता है तुम्हें गर कोई हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना हाँ वही बात जो मालूम है तुम लोगों को मैं वही बात छुपाऊँगा छुपाने देना मेरे जीने पे हँसे लोग कोई बात नहीं हाँ मिरी मौत का मातम न मनाने देना — Ameer Imam
हर आह-ए-सर्द इश्क़ है हर वाह इश्क़ है होती है जो भी जुरअत-ए-निगाह इश्क़ है दरबान बन के सर को झुकाए खड़ी है अक़्ल दरबार-ए-दिल कि जिस का शहंशाह इश्क़ है सुन ऐ ग़ुरूर-ए-हुस्न तिरा तज़्किरा है क्या असरार-ए-काएनात से आगाह इश्क़ है जब्बार भी रहीम भी क़हहार भी वही सारे उसी के नाम हैं अल्लाह इश्क़ है मेहनत का फल है सदक़ा-ओ-ख़ैरात क्यूँँ कहें जीने की हम जो पाते हैं तनख़्वाह इश्क़ है चेहरे फ़क़त पड़ाव हैं मंज़िल नहीं तिरी ऐ कारवान-ए-इ'श्क़ तिरी राह इश्क़ है ऐसे हैं हम तो कोई हमारी ख़ता नहीं लिल्लाह इश्क़ है हमें वल्लाह इश्क़ है हों वो 'अमीर-इमाम' कि फ़रहाद-ओ-क़ैस हों आओ कि हर शहीद की दरगाह इश्क़ है — Ameer Imam
आग के साथ मैं बहता हुआ पानी सुनना रात-भर अपने अनासिर की सुनानी सुनना देखना रोज़ अँधेरों में शुआ'ओं की नुमू पत्थरों में किसी दरिया की रवानी सुनना वो सुनाएँगी कभी मेरी कहानी तुम को तुम हवाओं से कभी मेरी कहानी सुनना मेरी ख़ामोशी मिरी मश्क़ है इस मश्क़ में तुम मार कर तीर मिरी तिश्ना-दहानी सुनना उम्र ना-काफ़ी है इस हिज्रत-ए-अव्वल के लिए फिर जनम लूँ तो मिरी हिजरत-ए-सानी सुनना कम-सिनी पर है अजब हाल तुम्हारा यारो सुन लो आसान नहीं उस की जवानी सुनना गीत मेरे जो पसंद आते हैं इतने तुम को इन्हीं गीतों की कभी मर्सिया-ख़्वानी सुनना क्या नया तुम को सुनाऊँ कि नया कुछ भी नहीं नए लफ़्ज़ों में वही बात पुरानी सुनना — Ameer Imam
रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें उस दिल के रास्ते में कई ख़म मिले हमें लब्बैक पहले हम ने कहा था रसूल-ए-हुस्न हो कार-ज़ार-ए-इश्क़ तो परचम मिले हमें आए इक ऐसा ज़ख़्म जो भरना न हो कभी या'नी हर एक ज़ख़्म का मरहम मिले हमें दिन में जहाँ सराब मिले थे हमें वहाँ आई जो रात क़तरा-ए-शबनम मिले हमें तुम जैसे और लोग भी होंगे जहान में ये बात और है कि बहुत कम मिले हमें जब साथ थे तो मिल के भी मिलना न हो सका जब से बिछड़ गए हो तो पैहम मिले हमें और फिर हमें भी ख़ुद पे बहुत प्यार आ गया उस की तरफ़ खड़े हुए जब हम मिले हमें जो उम्र-भर का साथ निभाता न मिल सका वैसे तो ज़िंदगी में बहुत ग़म मिले हमें — Ameer Imam

Nazm

"अभी ये सिर्फ़ लड़के हैं" अभी ये सिर्फ़ लड़के हैं अभी दुनिया इन्हें आसान लगती है इन्हें आवारगी इक मर्द की पहचान लगती है अभी ये चाहते हैं भीड़ से इन को जुदा मानें कोई अच्छा कहे इन को इन्हें अच्छा नहीं लगता ये सिगरेट पी रहे हैं यूँ कि सब इन को बुरा जानें अभी ये जागती रातें कहाँ इन को थकन से चूर करती हैं अभी रुसवाइयाँ इन को बहुत मसरूर करती हैं अभी इन को ये लगता है कि इक ठोकर से पत्थर तोड़ सकते हैं अभी इक फ़िल्म की ख़ातिर ये पेपर छोड़ सकते हैं हो कोई सानेहा लेकिन ये आँखें नम नहीं करते ये लड़के फ़ेल हो जाएँ तो बिल्कुल ग़म नहीं करते इन्हें ये ख़ुश-गुमानी है कि इन के शोर-ओ-गुल से सोए इंसाँ जाग जाएँगे ये ख़ालिस इश्क़ करते हैं बिना सोचे हुए हालात क्या हैं उन के वो क्या हैं इन्हें शादी की सब बारीकियाँ बेकार लगती हैं ये लड़के सोचते हैं अगर शादी न कर पाए तो महबूबा को ले कर भाग जाएँगे अभी कब इल्म है इन को कि हर छोड़ा हुआ पेपर जब इन की उम्र बन कर सामने आएगा क्या होगा अभी कब इल्म है इन को कि तब कैसा लगेगा कि जब ये लड़कियाँ इक दिन किसी की बीवी हो कर मिलने आएँगी मुहब्बत और हिक़ारत से इन्हें बुज़दिल बताएँगी ख़याल आएगा इन को काश हम अब जितने बुज़दिल हैं अगर उस वक़्त भी होते तो बेहतर था वो रातें जाग कर काटा गया जिन को कभी सड़कों कभी चाय के ढाबों पर अगर उन सारी रातों में किसी कमरे में पड़ कर शाम से सोते तो बेहतर था — Ameer Imam