कितना भी दर्द पिला दे ख़ुदा पी सकता हूँज़िन्दगी हिज्र से भर दे मिरी जी सकता हूँहर दफ़ा दिल पे ही खा के हुई है आदत येबंद आँखों से भी हर ज़ख़्म को सी सकता हूँ— Faiz Ahmad