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Hindustan Shayari

Hindustan Shayari in Hindi and Urdu with HD shayari images ready to download. Here is a curated collection of Hindustan shayari in Hindi. You can download HD images of all the Hindustan shayari on this page. These Hindustan Shayari images can also be used as Instagram posts and whatsapp statuses. Start reading now and enjoy.

दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला
बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला
शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में
बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में
जीते-जी इसका मान रखें
मर कर मर्यादा याद रहे
हम रहें कभी ना रहें मगर
इसकी सज-धज आबाद रहे
जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें
हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें
परवरदिगार,मैं तेरे द्वार
पर ले पुकार ये आया हूं
चाहे अज़ान ना सुनें कान
पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें
जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
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Kumar Vishwas
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया
नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया
तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया
जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था
सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था
मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था
तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से
फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से
वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से
मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना
नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना
रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना
जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
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Allama Iqbal
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मेरी परछाइयां गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है
सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है

अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियां घमसान बाक़ी है
अभी इस जिस्मे-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है

इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से
मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है

तुम्हारा झूट चेहरे से आयां हो जाएगा इक दिन
तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है

गुज़ारी उम्र जिसकी बंदगी में वो है ला-हासिल
अजब सरमायाकारी है नफ़ा-नुक़सान बाक़ी है

अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िंदगी बनकर
फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है

ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार जिंदा हैं
हमारी तरबीयत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
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Abbas Qamar

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