Mohit Subran

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Mohit Subran shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mohit Subran's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(157)
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Sher

दुनिया ने दी सदा मुझे दुनिया का हो गया दुनिया मिरी पुकार पे मेरी नहीं हुई — Mohit Subran
सहर से शाम तक के शोर से जब ऊब जाती है ये दुनिया रात की ख़ामोशियों में डूब जाती है — Mohit Subran
सर पे साया न माँ-बाप का हो अगर ज़िन्दगी हादसे में बदल जाती है — Mohit Subran
जिरह जब-जब हुई इतिहास को ले कर बदल तब-तब गया भूगोल दुनिया का — Mohit Subran
आँखों के कोनों से फिसली और पलकों से छूट गई नींद भी इक धागे जैसी है टूट गई तो टूट गई — Mohit Subran
ये जो अवाम है इस को तू ना-तवाँ न समझ इसी अवाम ने इक सल्तनत ढहा डाली — Mohit Subran
यक-ब-यक उट्ठा ज़ेहन से पर्दा और सब कुछ दिखाई देने लगा — Mohit Subran
ज़ीस्त हमारी रौशन कर के इस दुनिया से जाने वाले भूल भले जाएँ हम ख़ुद को लेकिन तुझ को याद रखेंगे — Mohit Subran
लगा लो अपने कलेजे से तुम इन्हें मोहित ये लोग फिर न तुम्हें दस्तियाब हों शायद — Mohit Subran
जब जानता था मौत ही है अपनी हम-सफ़र फिर क्यूँ मैं ज़िन्दगी तिरे धोके में आ गया — Mohit Subran
है मौत ही तो आख़िरी वो एक हादसा जिस हादसे के बाद कोई हादसा नहीं — Mohit Subran
तुम्हें तो यार मुयस्सर है बस ख़ुशी ही ख़ुशी तुम्हारा क्या जिसे चाहो उसे उदास करो — Mohit Subran
जो ख़ाली पेट हैं उन की मुराद है रोटी वो जिन के पेट भरे हैं जहान चाहते हैं — Mohit Subran
साँस मेरे सीने से इक-इक उखड़ जाएगी तब भी देखना दिल में मचलती एक बेचैनी मिलेगी — Mohit Subran
साँस लेती है रौशनी ज्यूँँ ही तीरगी थरथराने लगती है — Mohit Subran
जिसे मैं जानता हूँ पहले से उस से नहीं जुड़ना नए रस्ते का तालिब हूँ पुराने पे नहीं मुड़ना — Mohit Subran
जब कि तय है कि सब फिसलना है फिर भला क्यूँ ये जोड़-जाड़ करूँँ — Mohit Subran
ये बात भूलें न नेता कि आम लोगों ने जभी है चाही जो सरकार वो गिरा डाली — Mohit Subran
कोख से जन्में हम अँधेरों की सो हमें रौशनी लुभाती है — Mohit Subran

Ghazal

वक़्त ने कर दिया धोके के हवाले मुझ को चाबियाँ ग़ैरों को दीं और दिए ताले मुझ को सब हैं मसरूफ़ यहाँ अपनी किसी जन्नत में किस को पर्वा कि जहन्नम से निकाले मुझ को दोस्त वो ग़म है जो इतनी से नहीं जाएगा आधे ख़ाली नहीं भर के दे पियाले मुझ को अब तो रातों के अँधेरों से है निस्बत ऐसी कि बहुत चुभते हैं दिन के ये उजाले मुझ को जो कि दरिया को निगल जाए मैं वो सहरा हूँ फिर भला कैसे कोई अपना बना ले मुझ को ये इरादा तो नहीं फिर भी कभी रस्सी पे जो गला फिसले तो कोई न सँभाले मुझ को राख का ढेर हूँ अब मुझ में नहीं चिंगारी ऐ हवा अब तू जहाँ चाहे उड़ा ले मुझ को ज़ीस्त है एक भँवर फँस गया हूँ मैं जिस में मौत तू हाथ बढ़ा कर के बचा ले मुझ को अब तो बस एक ही ख़्वाहिश रही है दिल को मिरे एक दिन यूँ हो कोई हादसा खा ले मुझ को — Mohit Subran
जो ज़िन्दगी ने सताया तो हाए रोने लगे बहुत दबाव बनाया तो हाए रोने लगे हैं अंदरून से नाज़ुक-मिज़ाज हम इतने कि दिल किसी ने दुखाया तो हाए रोने लगे यही हुआ है कि जब भी दबा के दिल की बात बहुत दिमाग़ लगाया तो हाए रोने लगे किसी के बच्चे हों लेकिन जवान बच्चों के सरों से उठ गया साया तो हाए रोने लगे हमारे चेहरे पे बिखरे पड़े ग़मों को देख किसी ने यार हँसाया तो हाए रोने लगे तमाम शिकवे थे तुम से मगर हवाओं ने तुम्हारा हाल सुनाया तो हाए रोने लगे रवाँ हैं दिल में कई रंज सो किसी ने जब हमें गले से लगाया तो हाए रोने लगे जड़ें उदासी की सीने में इतनी गहरी हैं कि दिन ख़ुशी का भी आया तो हाए रोने लगे — Mohit Subran
तेरा चेहरा देख लिया मैं ने धोका देख लिया चेहरे की तह में मौजूद इक और चेहरा देख लिया झूट कपट मक्कारी का लम्बा अर्सा देख लिया सात बरस और नौ मह को कर के ज़ाया' देख लिया क्या रक्खा है पास तिरे ये भी लहजा देख लिया दरिया के घर में रह के ख़ुद को प्यासा देख लिया छोड़ दिया मिलना सब से ख़ाली कमरा देख लिया तन्हाई भी ख़ूँ रो दे ऐसा तन्हा देख लिया चल ख़ुश रह तेरी ख़ातिर तेरा चूड़ा देख लिया रोती क्यूँ है तू ने तो चख के पैसा देख लिया सब हासिल कब होता है वक़्त का काँटा देख लिया वाक़िफ़ हूँ हालत से तिरी तुझ को सहता देख लिया उस ने ऐसी गत की है फिर भी हँसता देख लिया सह लेती हैं दुख भी गर हो जो पैसा देख लिया दौलत का जादू-टोना आख़िर चलता देख लिया कारण उस इक शख़्स के हाए हम ने क्या-क्या देख लिया — Mohit Subran

Nazm

बर्बाद होती दुनिया हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला हर दिशा में एक सी आवाज़ का ही ज़ोर है मार डालो काट डालो बस यही इक शोर है जिस तरफ़ भी देखो तुम नफ़रत की अंधी भीड़ है ख़ूँ ही सर पे ख़ूँ ही लब पे ख़ूँ की प्यासी भीड़ है क्या हुआ इस को अचानक इस ने बदला रंग क्यूँ और आख़िर हो गई जल्लाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला युद्ध हो तो फिर निपटना चाहती है ढंग से अब नहीं डरती ये दंगे या किसी भी जंग से अब तो खुल के फूँकती है जंग का ही शंख ये अम्न की जो बात की तो नोच लेगी पंख ये सख़्त-दिल ज़ालिम सितम-गर जंगली क्यूँ हो गई हो गई है इन दिनों सय्याद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला मारने में काटने में ज़ुल्म में मसरूफ़ है जो भरा है ज़ेहन में उस ज़हर का ये रूप है आएगी जब होश में होगी ख़बर जब क्या किया रोएगी पछताएगी अपने किए पर देखना नफ़रतें हैवानियत ज़ुल्म-ओ-सितम की बेड़ियाँ तोड़ कर होती नहीं आज़ाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला है अभी भी वक़्त चाहे तो सँभल सकती है ये जो भरी नफ़रत है उल्फ़त में बदल सकती है ये थूक सकती है ये विष लेकिन उगलती क्यूँ नहीं चल रही जिस राह पे उस को बदलती क्यूँ नहीं रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम अश्कों का दामन छोड़ कर आख़िरश होती नहीं पुर-शाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला — Mohit Subran
"रोओ लड़को" रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा गुल के जैसे नाज़ुक मन को चुभता नश्तर कर डालेगा मर्द नहीं रोते हैं आँसू रोना काम औरतों का है इस में तुम न फँसना लड़को कि ये काम लड़कियों का है रोने पे क्या मर्द या औरत हूक किसी को उठ सकती है तुम भी खुल के रो सकते हो रोना काम राहतों का है पलकों को बोझल कर देगा आँखें बंजर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा बैठा है जो दिल की तह में उस ग़म को ऊपर लाओ तुम पलकों के कोनों से उस का फिर क़तरा-क़तरा बहाओ तुम सोचो न कोई क्या सोचेगा रोओ गर आता है रोना ख़ाली कर दो आँखें अपनी अब और न अश्क दबाओ तुम दिल ज़िंदा कर देगा मुर्दा हँसना दूभर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा कोई देता नहीं सहारा कोई गले लगाता नहीं गर तो दीवार को काँधा समझो तो दीवार पे ही रख के सर झर-झर अश्क बहाओ लड़को तुम को बेहद चैन मिलेगा चेहरे पे इक हँसी खिलेगी मन भी थोड़ा होगा बेहतर एक उदासी से भर देगा हालत बदतर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा — Mohit Subran