उदासियों ने लबों पर निगाह क्या डाली
जो एक फूल सी मुस्कान थी बुझा डाली
नहीं है हाथ किसी ग़ैर का मिटाने में
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी ख़ुद मैं ने ही मिटा डाली
सहेजी पर्स में तस्वीर इक बहुत दिन तक
फिर एक रात वो तस्वीर भी जला डाली
बहुत ग़ुरूर था जिस दोस्त पे मुझे अपने
उसी ने हाए कि औक़ात फिर दिखा डाली
जगह मिली ही नहीं मेरे दिल को उस दिल में
न मैं ने कौन सी तरकीब आज़मा डाली
— Mohit Subran















