है ख़ुद-कुशी की राह पे क़ुर्बान आदमी
इतना दुखी उदास परेशान आदमी
उड़ने को आसमान है चलने को है ज़मीन
फिर भी पड़ा है दुख में यूँ बे-जान आदमी
वहशी दरिंदा भेड़िया ये आज ही नहीं
जब से वजूद तब से है हैवान आदमी
दुनिया का हाए देखिए क्या हाल कर दिया
दुनिया की इस दशा का है उनवान आदमी
आया जहाॅं में आदमी जब आदमी ही था
अब हो गया है हिन्दू मुसलमान आदमी
पैहम है इस गुमाँ में कि सब जानता है वो
है जब कि ख़ुदस भी अभी अनजान आदमी
करता रहेगा यूँ ही फ़लक राज़ फ़ाश और
होता रहेगा ऐसे ही हैरान आदमी
— Mohit Subran















