Kaifi Azmi

Kaifi Azmi

@kaifi-azmi

Mumbai· India

Kaifi Azmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kaifi Azmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

99

Content

90

Likes

1220

Shayari
Audios
  • Sher(23)
  • Ghazal(31)
  • Nazm(36)

Sher

रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं — Kaifi Azmi
कोई कहता था समुंदर हूँ मैं और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं — Kaifi Azmi
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँँ यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता — Kaifi Azmi
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े — Kaifi Azmi
गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ — Kaifi Azmi
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क यूँँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े — Kaifi Azmi
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले उस इंक़िलाब का जो आज तक उधार सा है — Kaifi Azmi
मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े — Kaifi Azmi
बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए — Kaifi Azmi
एक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जाती दार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ को — Kaifi Azmi
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ — Kaifi Azmi
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने — Kaifi Azmi
ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बा'द — Kaifi Azmi
बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले — Kaifi Azmi
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं — Kaifi Azmi
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा — Kaifi Azmi
मेरा बचपन भी साथ ले आया गाँव से जब भी आ गया कोई — Kaifi Azmi
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई — Kaifi Azmi
इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा'द — Kaifi Azmi

Ghazal

Nazm

ये साँप आज जो फन उठाए मिरे रास्ते में खड़ा है पड़ा था क़दम चाँद पर मेरा जिस दिन उसी दिन इसे मार डाला था मैं ने उखाड़े थे सब दाँत कुचला था सर भी मरोड़ी थी दुम तोड़ दी थी कमर भी मगर चाँद से झुक के देखा जो मैं ने तो दुम इस की हिलने लगी थी ये कुछ रेंगने भी लगा था ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआ पुराने शिवाले की जानिब चला जहाँ दूध इस को पिलाया गया पढ़े पंडितों ने कई मंतर ऐसे ये कम-बख़्त फिर से जिलाया गया शिवाले से निकला वो फुंकारता रग-ए-अर्ज़ पर डंक सा मारता बढ़ा मैं कि इक बार फिर सर कुचल दूँ इसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँ क़रीब एक वीरान मस्जिद थी, मस्जिद में ये जा छुपा जहाँ इस को पेट्रोल से ग़ुस्ल दे कर हसीन एक तावीज़ गर्दन में डाला गया हुआ जितना सदियों में इंसाँ बुलंद ये कुछ उस से ऊँचा उछाला गया उछल के ये गिरजा की दहलीज़ पर जा गिरा जहाँ इस को सोने की केचुल पहनाई गई सलीब एक चाँदी की सीने पे उस के सजाई गई दिया जिस ने दुनिया को पैग़ाम-ए-अम्न उसी के हयात-आफ़रीं नाम पर उसे जंग-बाज़ी सिखाई गई बमों का गुलू-बंद गर्दन में डाला और इस धज से मैदाँ में उस को निकाला पड़ा उस का धरती पे साया तो धरती की रफ़्तार रुकने लगी अँधेरा अँधेरा ज़मीं से फ़लक तक अँधेरा जबीं चाँद तारों की झुकने लगी हुई जब से साइंस ज़र की मुतीअ जो था अलम का ए'तिबार उठ गया और इस साँप को ज़िंदगी मिल गई इसे हम ने ज़ह्हाक के भारी काँधे पे देखा था इक दिन ये हिन्दू नहीं है मुसलमाँ नहीं ये दोनों का मग़्ज़ और ख़ूँ चाटता है बने जब ये हिन्दू मुसलमान इंसाँ उसी दिन ये कम-बख़्त मर जाएगा — Kaifi Azmi
नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना — Kaifi Azmi
अज़ीज़ माँ मिरी हँसमुख मिरी बहादुर माँ तमाम जौहर-ए-फ़ितरत जगा दिए तू ने मोहब्बत अपने चमन से गुलों से ख़ारों से मोहब्बतों के ख़ज़ाने लुटा दिए तू ने बना बना के मिटाए गए नुक़ूश-ए-अमल तिरे बग़ैर मुकम्मल न हो सकी तस्वीर वो ख़्वाब झांसी की रानी को जिस ने चौंकाया तिरा जिहाद-ए-मुसलसल उसी की है ता'बीर उसे हयात का सोला सिंगार कहते हैं तिरी जबीं पे हैं कुछ सिलवटें भी टीका भी नज़र में जज़्ब-ए-यक़ीं दिल में सोज़-ए-आज़ादी दहकता फूल भी है तू महकता शो'ला भी ज़रा ज़मीन को मेहवर पे घूम लेने दे समाज तुझ से तिरा सोज़-ओ-साज़ मांगेगी जमाल सीखेगा ख़ुद-ए'तिमादियाँ तुझ से हयात-ए-नौ तिरे दिल का गुदाज़ मांगेगी — Kaifi Azmi
वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैं रंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं तेज़ी से जंगलों में उड़ी जा रही थी रेल ख़्वाबीदा काएनात को चौंका रही थी रेल मुड़ती उछलती काँपती चिंघाड़ती हुई कोहरे की वो दबीज़ रिदा फ़ाड़ती हुई पहियों की गर्दिशों में मचलती थी रागनी आहन से आग बन के निकलती थी रागनी पहुँची जिधर ज़मीं का कलेजा हिला दिया दामन में तीरगी के गरेबाँ बना दिया झोंके हवा के बर्फ़ बिछाते थे राह में जल्वे समा रहे थे लरज़ कर निगाह में धोके से छू गईं जो कहीं सर्द उँगलियाँ बिच्छू सा डंक मारने लगती थीं खिड़कियाँ पिछले पहर का नर्म धुँदलका था पुर-फ़िशाँ मायूसियों में जैसे उमीदों का कारवाँ बे-नूर हो के डूबने वाला था माहताब कोहरे में खुप गई थी सितारों की आब-ओ-ताब क़ब्ज़े से तीरगी के सहर छूटने को थी मशरिक़ के हाशिए में किरन फूटने को थी कोहरे में था ढके हुए बाग़ों का ये समाँ जिस तरह ज़ेर-ए-आब झलकती हों बस्तियाँ भीगी हुई ज़मीं थी नमी सी फ़ज़ा में थी इक किश्त-ए-बर्फ़ थी कि मुअल्लक़ हवा में थी जादू के फ़र्श सेहर के सब सक़्फ़-ओ-बाम थे दोश-ए-हवा पे परियों के सीमीं ख़ियाम थे थी ठंडे ठंडे नूर में खोई हुई निगाह ढल कर फ़ज़ा में आई थी हूरों की ख़्वाब-गाह बन बन के फेन सू-ए-फ़लक देखता हुआ दरिया चला था छोड़ के दामन ज़मीन का इस शबनमी धुँदलके में बगुले थे यूँँ रवाँ मौजों पे मस्त हो के चलें जैसे मछलियाँ डाला कभी फ़ज़ाओं में ख़त खो गए कभी झलके कभी उफ़ुक़ में निहाँ हो गए कभी इंजन से उड़ के काँपता फिरता था यूँँ धुआँ लेता था लहर खेत में कोहरे के आसमाँ उस वक़्त क्या था रूह पे सदमा न पूछिए याद आ रहा था किस से बिछड़ना न पूछिए दिल में कुछ ऐसे घाव थे तीर-ए-मलाल के रो रो दिया था खिड़की से गर्दन निकाल के — Kaifi Azmi
तबीअत जब्रिया तस्कीन से घबराई जाती है हँसूँ कैसे हँसी कम-बख़्त तू मुरझाई जाती है बहुत चमका रहा हूँ ख़ाल-ओ-ख़त को सई-ए-रंगीं से मगर पज़मुर्दगी सी ख़ाल-ओ-ख़त पर छाई जाती है उमीदों की तजल्ली ख़ूब बरसी शीशा-ए-दिल पर मगर जो गर्द थी तह में वो अब तक पाई जाती है जवानी छेड़ती है लाख ख़्वाबीदा तमन्ना को तमन्ना है कि उस को नींद ही सी आई जाती है मोहब्बत की निगूँ-सारी से दिल डूबा सा रहता है मोहब्बत दिल की इज़्मेहलाल से शरमाई जाती है फ़ज़ा का सोग उतरा आ रहा है ज़र्फ़-ए-हस्ती में निगाह-ए-शौक़ रूह-ए-आरज़ू कजलाई जाती है ये रंग-ए-मय नहीं साक़ी झलक है ख़ूँ-शूदा दिल की जो इक धुँदली सी सुर्ख़ी अँखड़ियों में पाई जाती है मिरे मुतरिब न दे लिल्लाह मुझ को दावत-ए-नग़्मा कहीं साज़-ए-ग़ुलामी पर ग़ज़ल भी गाई जाती है — Kaifi Azmi
ये बरसात ये मौसम-ए-शादमानी ख़स-ओ-ख़ार पर फट पड़ी है जवानी भड़कता है रह रह के सोज़-ए-मोहब्बत झमाझम बरसता है पुर-शोर पानी फ़ज़ा झूमती है घटा झूमती है दरख़्तों को ज़ौ बर्क़ की चूमती है थिरकते हुए अब्र का जज़्ब तौबा कि दामन उठाए ज़मीं घूमती है कड़कती है बिजली चमकती हैं बूँदें लपकता है कौंदा दमकती हैं बूँदें रग-ए-जाँ पे रह रह के लगती हैं चोटें छमा-छम ख़ला में खनकती हैं बूँदें फ़लक गा रहा है ज़मीं गा रही है कलेजे में हर लय चुभी जा रही है मुझे पा के इस मस्त शब में अकेला ये रंगीं घटा तीर बरसा रही है चमकता है बुझता है थर्रा रहा है भटकने की जुगनू सज़ा पा रहा है अभी ज़ेहन में था ये रौशन तख़य्युल फ़ज़ा में जो उड़ता चला जा रहा है लचक कर सँभलते हैं जब अब्र-पारे बरसते हैं दामन से दुम-दार तारे मचलती है रह रह के बालों में बिजली गुलाबी हुए जा रहे हैं किनारे फ़ज़ा झूम कर रंग बरसा रही है हर इक साँस शो'ला बनी जा रही है कभी इस तरह याद आती नहीं थी वो जिस तरह इस वक़्त याद आ रही है भला लुत्फ़ क्या मंज़र-ए-पुर-असर दे कि अश्कों ने आँखों पे डाले हैं पर्दे कहीं और जा कर बरस मस्त बादल ख़ुदा तेरा दामन जवाहिर से भर दे — Kaifi Azmi
ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे — Kaifi Azmi
तुम परेशान न हो, बाब-ए-करम वा न करो और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा उसी कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं शब-ए-तारीक गुज़ारूँगा, चला जाऊँगा रास्ता भूल गया, या यही मंज़िल है मिरी कोई लाया है कि ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं मैं भी कुछ लाया हूँ, क्या लाया हूँ मालूम नहीं यूँँ तो जो कुछ था मिरे पास मैं सब बेच आया कहीं इन'आम मिला, और कहीं क़ीमत भी नहीं कुछ तुम्हारे लिए आँखों में छुपा रक्खा है देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं एक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है मुस्कुरा देती हो रस्मन भी अगर महफ़िल में इक धनक टूट के सीनों में बिखर जाती है गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर जिस की इक आँच से हर रूह पिघल जाती है मैं ने सोचा है कि सब सोचते होंगे शायद प्यास इस तरह भी क्या साँचे में ढल जाती है क्या कमी है जो करोगी मिरा नज़राना क़ुबूल चाहने वाले बहुत, चाह के अफ़्साने बहुत एक ही रात सही गर्मी-ए-हंगामा-ए-इश्क़ एक ही रात में जल मरते हैं परवाने बहुत फिर भी इक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं काश तुम को कभी तंहाई का एहसास न हो काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुम को और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो आज की रात जो मेरी ही तरह तन्हा है मैं किसी तरह गुज़ारूँगा चला जाऊँगा तुम परेशान न हो, बाब-ए-करम वा न करो और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा — Kaifi Azmi
एक दो ही नहीं छब्बीस दिए एक इक कर के जलाए मैं ने एक दिया नाम का आज़ादी के उस ने जलते हुए होंटों से कहा चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो हाथ फैलाने की आज़ादी है इक दिया नाम का ख़ुश-हाली के उस के जलते ही ये मालूम हुआ कितनी बद-हाली है पेट ख़ाली है मिरा जेब मिरी ख़ाली है इक दिया नाम का यक-जेहती के रौशनी उस की जहाँ तक पहुँची क़ौम को लड़ते झगड़ते देखा माँ के आँचल में हैं जितने पैवंद सब को इक साथ उधड़ते देखा दूर से बीवी ने झल्ला के कहा तेल महँगा भी है मिलता भी नहीं क्यूँँ दिए इतने जला रक्खे हैं अपने घर में न झरोका न मुंडेर ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं आया ग़ुस्से का इक ऐसा झोंका बुझ गए सारे दिए हाँ मगर एक दिया नाम है जिस का उम्मीद झिलमिलाता ही चला जाता है — Kaifi Azmi
ज़बाँ को तर्जुमान-ए-ग़म बनाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' मैं बर्ग-ए-गुल से अंगारे उठाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' समझ में किस की आए राज़ मेरे हिचकिचाने का अँधेरे में चला करता है हर नावक ज़माने का निगाह-ए-मस्त की अल्लाह-रे मासूम ताकीदें मुझे है हुक्म साज़-ए-मुफ़्लिसी पर गुनगुनाने का मैं साज़-ए-मुफ़्लिसी पर गुनगुनाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' हँसी भी मेरी नौहा है मिरा नग़्मा भी मातम है जुनूँ भी मुझ से बरहम है ख़िरद भी मुझ से बरहम है सुलगता शौक़ पिघलते वलवले जलती तमन्नाएँ ज़मीं मेरी जहन्नम है फ़लक मेरा जहन्नम है ख़याली जन्नतों में बैठ जाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' ये तौक़-ए-बंदगी वो फूल सी गर्दन मआज़-अल्लाह वो शहद-आलूद लब और तलख़ी-ए-शेवन मआज़-अल्लाह कमाल-ए-हुस्न और ये इंकिसार-ए-इश्क़ अरे तौबा वो नाज़ुक हाथ मेरा गोशा-ए-दामन मआज़-अल्लाह झटक कर गोशा-ए-दामन छुड़ाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' नवेद-ए-सुब्ह सुनता ही नहीं रंगीन ख़्वाब उस का घिरा जाता है ज़ुल्मत-रेज़ किरनों में शबाब उस का मुझे फ़ुर्सत नहीं रंगीनियों में डूब जाने की उसे देता ये धोका ए'तिबार-ए-इंतिख़ाब उस का हक़ीक़त मस्त आँखों को दिखाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' फ़ना में हुज़्न-दीदा ज़िंदगी ज़म होती जाती है थकी नब्ज़ों की ख़स्ता ज़र्ब मद्धम होती जाती है ये अरमानों का मौसम ये मिरी गिरती हुई सेह्हत अँधेरी रात और लौ शम्अ' की कम होती जाती है शबिस्तान-ए-वफ़ा को जगमगाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' निराली जस्त करना है नए रस्ते पे चलना है नए शोलों में तपना है नए साँचे में ढलना है यही दो चार साँसें जो अभी मुझ को सँभाले हैं इन्हीं दो चार साँसों में ज़माने को बदलना है इन्हें भी सर्द गीतों में गँवाऊँ किस तरह 'कैफ़ी' परेशाँ क़ाफ़िले ने अब निशाँ मंज़िल का पाया है धुँदलकों के उधर इक सुर्ख़ तारा झिलमिलाया है चले हैं हाँपते इंसाँ नई दुनिया बसाने को बहुत ऐसे हैं इन में जिन को ख़ुद मैं ने बढ़ाया है मैं ख़ुद ही रास्ते से लौट आऊँ किस तरह 'कैफ़ी' — Kaifi Azmi
लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन लो जाम-ए-महरस वो छलकने लगी किरन खिचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन गूँजे तराने सुब्ह का इक शोर हो गया आलम मय-ए-बक़ा में शराबोर हो गया फूली शफ़क़ फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई इक मौज-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई कुल चाँदनी सिमट के गुलों में समा गई ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के मचली जबीन-ए-शर्क़ पे इस तरह मौज-ए-नूर लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क़-ए-तूर उड़ने लगी शमीम छलकने लगा सुरूर खिलने लगे शगूफ़े चहकने लगे तुयूर झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे थम थम के ज़ौ-फ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़्ताब छिड़का हवा ने सब्ज़ा-ए-ख़्वाबीदा पर गुलाब मुरझाई पत्तियों में मचलने लगा शबाब लर्ज़िश हुई गुलों को बरसने लगी शराब रिंदान-ए-मस्त और भी सरमस्त हो गए थर्रा के होंट जाम में पैवस्त हो गए दोशीज़ा एक ख़ुश-क़द ओ ख़ुश-रंग-ओ-ख़ूब-रू मालन की नूर-दीदा गुलिस्ताँ की आबरू महका रही है फूलों से दामान-ए-आरज़ू तिफ़्ली लिए है गोद में तूफ़ान-ए-रंग-ओ-बू रंगीनियों में खेली गुलों में पली हुई नौरस कली में क़ौस-ए-क़ुज़ह है ढली हुई मस्ती में रुख़ पे बाल परेशाँ किए हुए बादल में शम-ए-तूर फ़रोज़ाँ किए हुए हर सम्त नक़्श-ए-पास चराग़ाँ किए हुए आँचल को बार-ए-गुल से गुलिस्ताँ किए हुए लहरा रही है बाद-ए-सहर पाँव चूम के फिरती है तीतरी सी ग़ज़ब झूम झूम के ज़ुल्फ़ों में ताब-ए-सुम्बुल-ए-पेचाँ लिए हुए आरिज़ में शोख़ रंग-ए-गुलिस्ताँ लिए हुए आँखों में रूह-ए-बादा-ए-इरफ़ाँ लिए हुए होंटों में आब-ए-लाल-ए-बदख़्शाँ लिए हुए फ़ितरत ने तोल तोल के चश्म-ए-क़ुबूल में सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में ऐ हूर-ए-बाग़ इतनी ख़ुदी से न काम ले उड़ कर शमीम-ए-गुल कहीं आँचल न थाम ले कलियों का ले पयाम सहर का सलाम ले 'कैफ़ी' से हुस्न-ए-दोस्त का ताज़ा कलाम ले शाएर का दिल है मुफ़्त में क्यूँँ दर्द-मंद हो इक गुल इधर भी नज़्म अगर ये पसंद हो — Kaifi Azmi
ये सेहहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती है उड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही के पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे शफ़क़ की चादरें रंगीं फ़ज़ा में थरथराती हैं उड़ाए लाल झंडा इश्तिराकी अंजुमन जैसे चली आती है शरमाई लजाई हूर-ए-बेदारी भरे घर में क़दम थम थम के रखती है दुल्हन जैसे फ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों से सुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसे हवा की नर्म लहरें गुदगुदाती हैं उमंगों को जवाँ जज़्बात से करता हो चुहलें बाँकपन जैसे ये सादा सादा गर्दूं पे तबस्सुम-आफ़रीं सूरज पै-दर-पै कामयाबी से हो स्तालिन मगन जैसे सहर के आइने में देखता हूँ हुस्न-ए-मुस्तक़बिल उतर आई है चश्म-ए-शौक़ में 'कैफ़ी' किरन जैसे — Kaifi Azmi
मेरे काँधे पे बैठा कोई पढ़ता रहता है इंजील ओ क़ुरआन ओ वेद मक्खियाँ कान में भिनभिनाती हैं ज़ख़्मी हैं कान अपनी आवाज़ कैसे सुनूँ राणा हिन्दू था अकबर मुसलमान था संजय वो पहला इंसान था हस्‍तिनापुर में जिस ने क़ब्ल-ए-मसीह टेलीविज़न बनाया और घर बैठे इक अंधे राजा को युद्ध का तमाशा दिखाया आदमी चाँद पर आज उतरा तो क्या ये तरक़्क़ी नहीं अब से पहले, बहुत पहले जब ज़र्रा टूटा न था चश्मा जौहर का फूटा न था फ़र्श से अर्श तक जा चुका है कोई ये और ऐसी बहुत सी जहालत की बातें मेरे काँधे पे होती हैं काँधे झुके जा रहे हैं क़द मिरा रात दिन घट रहा है सर कहीं पाँव से मिल न जाए — Kaifi Azmi
कितनी रंगीं है फ़ज़ा कितनी हसीं है दुनिया कितना सरशार है ज़ौक़-ए-चमन-आराई आज इस सलीक़े से सजाई गई बज़्म-ए-गीती तू भी दीवार-ए-अजंता से उतर आई आज रू-नुमाई की ये साअत ये तही-दस्ती-ए-शौक़ न चुरा सकता हूँ आँखें न मिला सकता हूँ प्यार सौग़ात, वफ़ा नज़्र, मोहब्बत तोहफ़ा यही दौलत तिरे क़दमों पे लुटा सकता हूँ कब से तख़्ईल में लर्ज़ां था ये नाज़ुक पैकर कब से ख़्वाबों में मचलती थी जवानी तेरी मेरे अफ़्साने का उनवान बनी जाती है ढल के साँचे में हक़ीक़त के कहानी तेरी मरहले झेल के निखरा है मज़ाक़-ए-तख़्लीक़ सई-ए-पैहम ने दिए हैं ये ख़द-ओ-ख़ाल तुझे ज़िंदगी चलती रही काँटों पे, अंगारों पर जब मिली इतनी हसीं, इतनी सुबुक चाल तुझे तेरे क़ामत में है इंसाँ की बुलंदी का वक़ार दुख़्तर-ए-शहर है, तहज़ीब का शहकार है तू अब न झपकेगी पलक, अब न हटेंगी नज़रें हुस्न का मेरे लिए आख़िरी मेआर है तू ये तिरा पैकर-ए-सीमीं, ये गुलाबी सारी दस्त-ए-मेहनत ने शफ़क़ बन के उढ़ा दी तुझ को जिस से महरूम है फ़ितरत का जमाल-ए-रंगीं तर्बियत ने वो लताफ़त भी सिखा दी तुझ को आगही ने तिरी बातों में खिलाईं कलियाँ इल्म ने शक्करीं लहजे में निचोड़े अंगूर दिलरुबाई का ये अंदाज़ किसे आता था तू है जिस साँस में नज़दीक उसी साँस में दूर ये लताफ़त, ये नज़ाकत, ये हया, ये शोख़ी सौ दिए जुलते हैं उमडी हुई ज़ुल्मत के ख़िलाफ़ लब-ए-शादाब पे छलकी हुई गुलनार हँसी इक बग़ावत है ये आईन-ए-जराहत के ख़िलाफ़ हौसले जाग उठे सोज़-ए-यक़ीं जाग उठा निगह-ए-नाज़ के बे-नाम इशारों को सलाम तू जहाँ रहती है उस अर्ज़-ए-हसीं पर सज्दा जिन में तू मिलती है उन राह-गुज़ारों को सलाम आ क़रीब आ कि ये जूड़ा मैं परेशाँ कर दूँ तिश्ना-कामी को घटाओं का पयाम आ जाए जिस के माथे से उभरती हैं हज़ारों सुब्हें मिरी दुनिया में भी ऐसी कोई शाम आ जाए — Kaifi Azmi
राम बन-बास से जब लौट के घर में आए याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ प्यार की काहकशाँ लेती थी अँगड़ाई जहाँ मोड़ नफ़रत के उसी राह-गुज़र में आए धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे छे दिसम्बर को मिला दूसरा बन-बास मुझे — Kaifi Azmi
मुद्दतों मैं इक अंधे कुएँ में असीर सर पटकता रहा गिड़गिड़ाता रहा रौशनी चाहिए، चाँदनी चाहिए، ज़िंदगी चाहिए रौशनी प्यार की, चाँदनी यार की, ज़िंदगी दार की अपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिन धीरे धीरे यक़ीं दिल को आता रहा सूने संसार में बे-वफ़ा यार में दामन-ए-दार में रौशनी भी नहीं चाँदनी भी नहीं ज़िंदगी भी नहीं ज़िंदगी एक रात वाहिमा काएनात आदमी बे-बिसात लोग कोताह-क़द शहर शहर-ए-हसद गाँव इन से भी बद इन अँधेरों ने जब पीस डाला मुझे फिर अचानक कुएँ ने उछाला मुझे अपने सीने से बाहर निकाला मुझे सैकड़ों मिस्र थे सामने सैकड़ों उस के बाज़ार थे एक बूढ़ी ज़ुलेख़ा नहीं जाने कितने ख़रीदार थे बढ़ता जाता था यूसुफ़ का मोल लोग बिकने को तय्यार थे खुल गए मह-जबीनों के सर रेशमी चादरें हट गईं पलकें झपकीं न नज़रें झुकीं मरमरीं उँगलियाँ कट गईं हाथ दामन तक आया कोई धज्जियाँ दूर तक बट गईं मैं ने डर के लगा दी कुएँ में छलांग सर पटकने लगा फिर इसी कर्ब से फिर इसी दर्द से गिड़गिड़ाने लगा रौशनी चाहिए चाँदनी चाहिए ज़िंदगी चाहिए — Kaifi Azmi
रूह बेचैन है इक दिल की अज़िय्यत क्या है दिल ही शो'ला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है वो मुझे भूल गई इस की शिकायत क्या है रंज तो ये है कि रो रो के भुलाया होगा वो कहाँ और कहाँ काहिश-ए-ग़म, सोज़िश-ए-जाँ उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमाँ उस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमाँ त'अना-ज़न एक ज़माना नज़र आया होगा झुक गई होगी जवाँ-साल उमंगों की जबीं मिट गई होगी ललक, डूब गया होगा यक़ीं छा गया होगा धुआँ, घूम गई होगी ज़मीं अपने पहले ही घरौंदे को जो ढाया होगा दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़्साने सुनाए होंगे अश्क आँखों ने पिए और न बहाए होंगे बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा उस ने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी मिट के इक नक़्श ने सौ शक्ल दिखाई होगी मेज़ से जब मिरी तस्वीर हटाई होगी हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा बे-महल छेड़ पे जज़्बात उबल आए होंगे ग़म पशेमान-ए-तबस्सुम में ढल आए होंगे नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो हटाई होगी रूठे जल्वों पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी बर्क़ अश़्वों ने कई दिन न गिराई होगी रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा — Kaifi Azmi