Kaifi Azmi

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    सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
    सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने

    यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो
    हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने

    मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग
    सुना है बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने

    जहाँ से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा
    वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने

    बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
    मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

    हुआ है हुक्म कि 'कैफ़ी' को संगसार करो
    मसीह बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने

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    औरत

    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज
    हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज
    आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज
    हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज
    जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार
    तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार
    तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार
    ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार
    कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है
    तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है
    पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है
    बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है
    ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं
    नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं
    उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं
    जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
    उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
    फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
    क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
    ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
    रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
    तुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं
    तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
    तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
    अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल
    ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
    नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल
    क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल
    राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़
    तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़
    तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़
    तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़
    बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
    तू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवीं
    तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं
    हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं
    मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
    लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

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    ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
    कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
    ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू
    शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू
    नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू
    तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
    हज़ारों जादू जगा रही हो
    ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

    गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत
    निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त
    धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत
    हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत
    लचक लचक गुनगुना रही हो
    ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

    तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी
    जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी
    भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी
    घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी
    कि आज तक आज़मा रही हो
    ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

    नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी
    वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी
    मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी
    जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी
    क़रीब बढ़ती ही आ रही हो
    ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

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    तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
    क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

    आँखों में नमी हँसी लबों पर
    क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

    बन जाएँगे ज़हर पीते पीते
    ये अश्क जो पीते जा रहे हो

    जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
    तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो

    रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
    रेखाओं से मात खा रहे हो

    Kaifi Azmi
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    झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
    दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

    तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
    मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

    वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है
    उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं

    तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
    तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं

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    रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
    तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

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    इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
    दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

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    रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
    तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
    डरता हूं कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर
    राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

    इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
    यूं मौत को सीने से लगाता नहीं कोई
    माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे
    बे-रात ढले शमा बुझाता नहीं कोई

    साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा
    अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई
    हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना
    क्यूं आज दिवाने को जगाता नहीं कोई
    अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के
    नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

    Kaifi Azmi
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    सुना करो मिरी जां इन से उन से अफ़्साने
    सब अजनबी हैं यहां कौन किस को पहचाने

    यहां से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो
    हैं मेरी प्यास के फूंके हुए ये वीराने

    मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग
    सुना है बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने

    जहां से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा
    वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने

    बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
    मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

    हुआ है हुक्म कि 'कैफ़ी' को संगसार करो
    मसीह बैठे हैं छुप के कहां ख़ुदा जाने

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    इतना तो ज़िन्दगी में किसी के ख़लल पड़े
    हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

    जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
    यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

    Kaifi Azmi
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