bahaar aaye to mera salaam kah dena | बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

  - Kaifi Azmi

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

  - Kaifi Azmi

Gulshan Shayari

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    कैसी बिपता पाल रखी है क़ुर्बत की और दूरी की
    ख़ुशबू मार रही है मुझ को अपनी ही कस्तूरी की
    Naeem Sarmad
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    हर ख़ुशी मुस्कुरा के कहती है
    दर्द बनकर छुपे हुए हो तुम

    आज आब-ओ-हवा में ख़ुश्बू है
    लग रहा है घुले हुए हो तुम
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    Ritesh Rajwada
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    सो देख कर तेरे रुख़्सार-ओ-लब यक़ीं आया
    कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी
    Ahmad Faraz
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    बिखर के फूल फ़ज़ाओं में बास छोड़ गया
    तमाम रंग यहीं आस-पास छोड़ गया
    Aanis Moin
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    पहले उसकी खुशबू मैंने खुद पर तारी की
    फिर मैंने उस फूल से मिलने की तैयारी की

    इतना दुख था मुझको तेरे लौट के जाने का
    मैंने घर के दरवाजों से भी मुंह मारी की
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    Tehzeeb Hafi
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    फूल से लेकर ये धनिया लाने तक के इस सफ़र को
    मुझको तेरे साथ ही तय करने की ख़्वाहिश है पगली
    Harsh saxena
    हर कोई फूल-सा है लेकिन वो
    फूल में फूल है गुलाब का फूल
    Ramnath Shodharthi
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    हम उनके निकाले हुए लोगों में हैं शामिल
    हर हाल में जीने का सलीका हमें मालूम

    वो फूल जो तोड़े गए इज़हार की ख़ातिर
    आते हुए किस किस ने है रौंदा हमें मालूम
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    Amrendra Vishwakarma
    साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की
    हर सू बहार पेश-ए-नज़र है बसंत की
    Ufuq Lakhnavi
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    तुम्हारे बाद के बोसों में जानाँ
    तुम्हारी सांस की ख़ुशबू नहीं थी
    Vikas Rana
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As you were reading Shayari by Kaifi Azmi

    जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
    यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता
    Kaifi Azmi
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    मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
    नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

    नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
    नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

    वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा
    किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

    वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
    कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

    जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
    यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

    खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
    तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
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    Kaifi Azmi
    हाथ आ कर लगा गया कोई
    मेरा छप्पर उठा गया कोई

    लग गया इक मशीन में मैं भी
    शहर में ले के आ गया कोई

    मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
    इश्तिहार इक लगा गया कोई

    ये सदी धूप को तरसती है
    जैसे सूरज को खा गया कोई

    ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी
    बेच के अपना खा गया कोई

    अब वो अरमान हैं न वो सपने
    सब कबूतर उड़ा गया कोई

    वो गए जब से ऐसा लगता है
    छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई

    मेरा बचपन भी साथ ले आया
    गाँव से जब भी आ गया कोई
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    Kaifi Azmi
    क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं
    इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं

    दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार
    कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं

    अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
    वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं

    पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे
    ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं

    पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहे
    इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं
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    Kaifi Azmi
    झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
    दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
    Kaifi Azmi
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