Ahmad Mushtaq

Ahmad Mushtaq

@ahmad-mushtaq

Ahmad Mushtaq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Mushtaq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में क्यूँँ तेरी याद का बादल मेरे सर पर आया — Ahmad Mushtaq
ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है इसे देखें कि इस में डूब जाएँ — Ahmad Mushtaq
हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़' हमारे साथ है साया हमारा — Ahmad Mushtaq
रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है — Ahmad Mushtaq
नए दीवानों को देखें तो ख़ुशी होती है हम भी ऐसे ही थे जब आए थे वीराने में — Ahmad Mushtaq
यार सब जम्अ' हुए रात की ख़ामोशी में कोई रो कर तो कोई बाल बना कर आया — Ahmad Mushtaq

Ghazal

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी बाहर ख़िज़ाँ का ज़ोर था अंदर अँधेरी रात थी ऐसे परेशाँ तो न थे टूटे हुए सन्नाहटे जब इश्क़ की तेरे मिरे ग़म पर बसर-औक़ात थी कुछ तुम कहो तुम ने कहाँ कैसे गुज़ारे रोज़-ओ-शब अपने न मिलने का सबब तो गर्दिश-ए-हालात थी इक ख़ामुशी थी तर-ब-तर दीवार-ए-मिज़्गाँ से उधर पहुँचा हुआ पैग़ाम था बरसी हुई बरसात थी सब फूल दरवाज़ों में थे सब रंग आवाज़ों में थे इक शहर देखा था कभी उस शहर की क्या बात थी ये हैं नए लोगों के घर सच है अब उन को क्या ख़बर दिल भी किसी का नाम था ग़म भी किसी की ज़ात थी — Ahmad Mushtaq
ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पर लकीरें खींचता रहता हूँ मैं आज से मुझ पर मुकम्मल हो गया दीन-ए-फ़िराक़ हाँ तसव्वुर में भी अब तुझ से जुदा रहता हूँ मैं तू दयार-ए-हुस्न है ऊँची रहे तेरी फ़सील मैं हूँ दरवाज़ा मोहब्बत का, खुला रहता हूँ मैं शाम तक खींचे लिए फिरते हैं इस दुनिया के काम सुब्ह तक फ़र्श-ए-नदामत पर पड़ा रहता हूँ मैं हाँ कभी मुझ पर भी हो जाता है मौसम का असर हाँ किसी दिन शाकी-ए-आब-ओ-हवा रहता हूँ मैं अहल-ए-दुनिया से तअ'ल्लुक़ क़त्अ होता ही नहीं भूल जाने पर भी सूरत-आश्ना रहता हूँ मैं — Ahmad Mushtaq
ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं हवा-ए-ग़म के लिए खिड़कियाँ बनाते हैं उन्हें भी देख कभी ऐ निगार-ए-शाम-ए-बहार जो एक रंग से तस्वीर-ए-जाँ बनाते हैं निगाह-ए-नाज़ कुछ उन की भी है ख़बर तुझ को जो धूप में हैं मगर बदलियाँ बनाते हैं हमारा क्या है जो होता है जी उदास बहुत तो गुल तराशते हैं तितलियाँ बनाते हैं किसी तरह नहीं जाती फ़सुर्दगी दिल की तो ज़र्द रंग का इक आसमाँ बनाते हैं दिल-ए-सितम-ज़दा क्या है लहू की बूँद तो है इस एक बूँद को हम बे-कराँ बनाते हैं बला की धूप थी दिन भर तो साए बुनते थे अँधेरी रात है चिंगारियाँ बनाते हैं हुनर की बात जो पूछो तो मुख़्तसर ये है कशीद करते हैं आग और धुआँ बनाते हैं — Ahmad Mushtaq