Afzal Ali Afzal

Afzal Ali Afzal

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Afzal Ali Afzal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Afzal Ali Afzal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुम्हें देखा नहीं है मुद्दतों से मेरे चश्में का नंबर बढ़ गया है — Afzal Ali Afzal
सुन ओ कहानीकार कोई ऐसा रोल दे ऐसे अदा करूँं मेरी इज़्ज़त बनी रहे — Afzal Ali Afzal
न जाने हमारा भी क्या ही बनेगा बहुत देर से चाक पर घूमते हैं — Afzal Ali Afzal
इन दिनों दोस्त मेरे सारे ही रूठे हुए हैं मेरे दुश्मन यही मौक़ा है हरा दे मुझ को — Afzal Ali Afzal
बादलों में से छनता हुआ नूर देख ऐसी रौशन जबीं है मेरे यार की — Afzal Ali Afzal
बैठा हूँ अभी सामने और सोच रहा हूँ इज़हार पे मेरे भला क्या मेरा बनेगा — Afzal Ali Afzal
कहाँ कहाँ पे उसे ढूँढ़ते हैं हम यारों किसी के लम्स से होता था जो सुकूँ दिल को — Afzal Ali Afzal
तेरी यादें लिपट जाती हैं मुझ से घर पहुँचते ही कि जैसे बाप से आ कर कोई बच्ची लिपटती है — Afzal Ali Afzal
काट पाऊँगा मैं कैसे ज़िंदगी तेरे बग़ैर तीन दिन का हिज्र मुझ को लग रहा है तीन साल — Afzal Ali Afzal
ये जो दौलत कमानी पड़ रही है बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है — Afzal Ali Afzal
दूजों का दुख समझने को बे हद ज़रूरी है थोड़ी सही प दिल में अज़ीयत बनी रहे — Afzal Ali Afzal
आओ मिल कर के सभी बैर मिटाएं यारो आओ हम आज की ये ईद मुबारक कर लें — Afzal Ali Afzal
मैं हूँ सदियों से भटकता हुआ प्यासा दरिया ऐ ख़ुदा कुछ तो समुंदर के सिवा दे मुझ को — Afzal Ali Afzal
वक़्त ए इफ़्तार ख़ुद रब था मेरे क़रीब तुझ से बढ़ कर मगर कुछ न माँगा गया — Afzal Ali Afzal
कल रात मैं बहुत ही अलग सा लगा मुझे उस की नज़र ने यूँँ मेरी सूरत खंगाली दोस्त — Afzal Ali Afzal
यूँँ तो वो इत्रदान था लेकिन ये क्या हुआ टूटा तो एक सम्त भी ख़ुशबू नहीं गई — Afzal Ali Afzal
चूमा था एक दिन किसी गुल की जबीन को लहजे से आज तक मेरे ख़ुश्बू नहीं गई — Afzal Ali Afzal
कुछ तो करें कि दिल ये कहीं और जा लगे कुछ देर के लिए सही आँखों को चैन हो — Afzal Ali Afzal

Ghazal

कैसे कटते होंगे उन के रात दिन मेरे बग़ैर क्या सुहाती होंगी हाथों को शगुन की चूड़ियाँ जिन को पहना दी गई हों पगड़ियों के नाम पर जाके उन सेे पूछिये हैं कितनी भारी चूड़ियाँ देख हाथों में सखी के मुझ से यूँँ कहने लगी मुझ को भी ला कर के दो ना बाबा ऐसी चूड़ियाँ कितने कुनबे टूटे हैं सरहद बचाने के लिए और टूटी हैं न जाने कितनी सारी चूड़ियाँ नैन अचानक ही छलक उट्ठे जूँ ही उस ने सुना तुम पे ये अच्छी लगेंगी ले लो बीबी चूड़ियाँ किरचियाँ आँखों में चुभती होंगी उन की टूट कर किस क़दर उन को रुलाती होंगी उन की चूड़ियाँ तर्जमानी थी कभी अफ़ज़ल हमारे इश्क़ की हो गईं हैं क्यूँँ भला अब बे मआ'नी चूड़ियाँ — Afzal Ali Afzal
दिल को मेरे बस यही मलाल है हिज्र अपने दरमियाँ बहाल है दिल ये बूढ़ा ग़म से क्यूँँ निढाल है क्या मोहब्बतों का ये ज़वाल है पगड़ियों से हैं बंधे हुए क़दम और पगड़ियों का ही ख़याल है ऐसे घाव दे दिए हैं इश्क़ ने रूह तक भी ख़ून-ए-दिल से लाल है ग़म की धुन पे रक़्स करती ज़िन्दगी धड़कनों का शोर देता ताल है हाए रुख़ पे माहताब सा है नूर और उस पे ज़ेर-ए-लब जो ख़ाल है पी के जाम शेख़ जी बता रहे क्या है शिर्क और क्या हलाल है पहले इश्क़ देता है सुकून फिर लाख तोहमतों का एक जाल है जान देता है तो दे कोई मगर किस को यां किसी का अब ख़याल है ये किधर से आ रहा है माहताब उस का घर तो जानिब-ए-शुमाल है — Afzal Ali Afzal
जूँ ही देखा तेरी रौशन जबीं का नूर ख़लवत में है मेहव-ए-रश्क़ कोह-ए-क़ाफ़ की वो हूर ख़लवत में तेरी यादों ने कर डाला हमें मजबूर ख़लवत में छलक उठ्ठा है पलकों से ग़म-ए-मस्तूर ख़लवत में मेरी साँसें महकती हैं तेरी ख़ुश्बू से अक्सर यूँँ जूँ कोई गुंचा-ए-दिल हो तेरा मज़कूर ख़लवत में अज़ीयतनाक रातों में सिसकती हैं तुम्हारे बिन मेंरे कमरे की दीवारें ग़मों से चूर ख़लवत में शिकम ख़ाली बदन नंगा, है पैरों में थकन पहने लिए बच्चों को रोता है कोई मज़दूर ख़लवत में शब-ए-हिज्राँ की तन्हाई, तेरी फ़ुरक़त का ग़म उस पर शिकस्ता दिल है यूँँ भी ज़ब्त से मामूर ख़लवत में लिए पलकों पे मोती ग़म के दर आईना इक लड़की तका करती है अपनी माँग का सिंदूर ख़लवत में वबा फैली है आलम में, जिधर देखो उधर अफ़ज़ल मुनासिब है कि रहिए अब सभी से दूर ख़लवत में — Afzal Ali Afzal
आप कहते हैं कि बेकार लहू रोते हैं हम तो समझे थे समझदार लहू रोते हैं हर दफ़ा तुम भी तसव्वुर में चले आते हो हम भी फिर टूट के हर बार लहू रोते हैं इस से पहले कि निगल जाए मुझे बैचेनी आ कहीं बैठ के ग़मख़्वार लहू रोते हैं सुर्ख़ आँखों का सबब क्या है बताएं तुम को दर्द होता है बहुत, यार लहू रोते हैं इस कहानी का नया मोड़ है मेरा मरना क्यूँ कहानी के ये किरदार लहू रोते हैं दाद देते हैं जिन्हें आप ख़ुशी से उठकर फ़न के परदे में ये फ़नकार लहू रोते हैं ये भी कैसा ही अजब सीन है जिस में मिल कर सारे के सारे अदाकार लहू रोते हैं — Afzal Ali Afzal

Nazm

नज़्म - होली तुम हमारे थे बस इक हमारे कभी याद आता है हम को ज़माना वही दरमियाँ थी हमारे भी चाहत बहुत साथ बीते कितने हसीं पल सनम खिलखिलाने की हम को थी आदत मगर हो गए कितने तन्हा तेरे बा'द हम बिन तुम्हारे न दिल ये हमारा लगे क्या ही रक्खा है दुनिया में हम सेे कहे सारे जग से हम अब रूठे रूठे से हैं हम को मतलब किसी से रहा ही नहीं बस जिए जा रहे हैं तुम्हारे बिना जैसे कुछ ज़िन्दगी में बचा ही नहीं, हम को जानाँ तुम्हारी यूँ आदत हुई देख लो बिन तुम्हारे जो हालत हुई रंग बे-रंग हैं सब तुम्हारे बिना रंग कोई भी अब हम पे फबता नहीं इस लिए सब से हम, दूर बैठे रहे रंग हम को किसी ने लगाया नहीं घर मिठाई जो आई थी खाई नहीं अब के होली भी हम ने मनाई नहीं.... — Afzal Ali Afzal